“मत-मतान्तरों की सत्यासत्य मान्यताओं का बिना परीक्षा किये आचरण करना उचित नहीं”

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Published on : 12 Mar, 20 05:03

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“मत-मतान्तरों की सत्यासत्य मान्यताओं का बिना  परीक्षा किये आचरण करना उचित नहीं”

सृष्टि में मनुष्य जाति का आरम्भ वर्तमान समय से 1.96 अरब वर्ष पूर्व ईश्वर द्वारा सृष्टि रचना पूर्ण कर अमैथुनी सृष्टि में मनुष्य आदि सभी प्राणियों को उत्पन्न करने पर हुआ। सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा आदि को एक एक वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। यह चारों वेद ईश्वरीय ज्ञान होने से सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। ऋषि दयानन्द ने अत्यन्त गहन चिन्तन मनन कर नियम दिया है कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है। परमेश्वर इस सृष्टि की रचना में निमित्त कारण, इसका रचयिता, ज्ञान विज्ञान से युक्त सर्वज्ञ सत्ता, सृष्टि की आदि में चार ऋषियों के माध्यम से वेदों का ज्ञान देने वाला, सृष्टि का पालनकर्ता, मनुष्य आदि सभी प्राणियों को जन्म व मृत्यु की व्यवस्था करने वाला, सब जीवों को उनके कर्म वा प्रारब्ध के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म देकर उनको जन्म-मरण से मुक्ति के लिये शुभ कर्मों व ज्ञान प्राप्ति का अवसर देने वाली एक अनादि, नित्य, अविनाशी तथा सच्चिदानन्दस्वरूप सत्ता है। ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, पवित्र तथा जीवों के कर्म फलों की देने वाली सत्ता है जो सृष्टि को उत्पन्न करने सहित इसका पालन करती है और इसकी अवधि पूरी होने पर प्रलय भी करती है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करके परमात्मा को जानें, उसकी उपासना करें, यथाशक्ति परोपकार तथा देशहित के कार्यों को करें तथा अज्ञान का नाश करने के लिये वेद व ज्ञानयुक्त बातों का देश देशान्तर में प्रचार करें। मनुष्य वही है जो मिथ्या मतमतान्तरों के भ्रम जाल में न फंसे क्योंकि इनमें फंसने से मनुष्य का जीवन बर्बाद होता है और वह धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति से वंचित होकर जन्म-जन्मान्तरों में अनेकानेक नीच योनियों में जन्म लेकर दुःखों को भोगता है।

 

                मनुष्य योनि में जीवात्मा को जन्म तब मिलता है जब उसके पूर्वजन्म में पाप व पुण्य कर्म समान व बराबर होते हैं अथवा शुभ व पुण्य कर्म पाप कर्मों से अधिक होते हैं। मनुष्य जन्म आत्मा और परमात्मा सहित इस संसार के यथार्थस्वरूप को जानने के लिये हमें मिलता है। यदि हम ज्ञान प्राप्ति का यह कार्य को करते हैं तो हम सौभाग्यशाली होते हैं अन्यथा अभागे होते हैं। ईश्वर तथा आत्मा सहित संसार को यथार्थरूप में जानने के लिये वेद तथा ऋषियों के दर्शन, उपनिषद, सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थ महत्वपूर्ण हैं। सत्यार्थप्रकाश लोक भाषा हिन्दी में होने तथा वेदों के सर्वथा अनुकूल होने से आज के समय में यह सबसे अधिक सरल व सुबोध ग्रन्थ है। विश्व की अनेक भाषाओं में सत्यार्थप्रकाश के अनुवाद भी उपलब्ध हैं। अतः इस ग्रन्थ की सहायता से देवनागरी अक्षरों से परिचित व हिन्दी भाषा को पढ़ सकने वाला व्यक्ति भी ज्ञानी बन सकता है और सृष्टि के सभी रहस्यों को सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर जान सकता है। सत्पुरुषों का कार्य होता है कि वह सामान्य लोगों की उचित आवश्यकताओं व अपेक्षाओं को जाने व समझे और उनके निराकरण व समाधान के लिये उपदेश व ग्रन्थ आदि की रचना करें। ग्रन्थ रचना केवल अधिकारी विद्वानों को ही करनी चाहिये। यदि कोई अनधिकृत वा अनाधिकारी व्यक्ति धर्म शास्त्र व धर्म ग्रन्थ की रचना करता है तो उससे मानवजाति का उपकार होने की अपेक्षा अपकार होता है। ऐसा ही महाभारत के बाद देखने को मिलता है।

 

                वर्तमान समय में स्थिति ऐसी डरावनी बना दी है कि लोग सत्य को सत्य और असत्य को असत्य कहने में भी भय खाते हैं। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में सच्चे ईश्वर को जानने का संकल्प लेकर उसकी प्राप्ति के लिये अहर्निश पुरुषार्थ व तप किया था। उन्होंने जो तप किया उस पर जब विचार करते हैं तो हमें लगता है कि उनके जैसा तपस्वी इतिहास में दूसरा नहीं हुआ। उन्होंने कितने दिन व रातें बिना भोजन किये अथवा अस्वादिष्ट भोजन कर बिताई थी, हम इसका अनुमान भी नहीं कर सकते। उन्होंने इन बातों का कभी वर्णन नहीं किया। वह घरों में न रहकर आकाश के नीचे वीरान स्थान पर भूमि पर बिना बिस्तर व वस्त्रों के सोते थे। वह अपने ध्येय व साध्य की प्राप्ति में निरन्तर लगे रहे थे। उसी का शुभ परिणाम उन्हें योग विधि से ईश्वर के साक्षात्कार होने के साथ ईश्वर व वेद ज्ञानी प्रज्ञाचक्षु गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की उन्हें प्राप्ति के रूप में हुआ था। उन स्वामी विरजानन्द जी के सान्निध्य में रहकर उन्होंने वेद व्याकरण एवं यथार्थ वेदार्थ प्रक्रिया का सफल अभ्यास किया और वह वेदों के यथार्थ अर्थों को जानने में सफल हुए थे। उनसे पूर्व उनके समान वेदों का विद्वान इतिहास में वर्णित नहीं है। महाभारत काल तक किसी ऋषि का वेदभाष्य उपलब्ध नहीं होता। महाभारत के बाद कुछ लौकिक संस्कृत के विद्वानों सायण एवं महीधर आदि ने वेदों के अर्थ करने के उपक्रम किये परन्तु वह ऋषि और योगी न होने तथा ज्ञान की अल्पता एवं अनाधिकारी होने के कारण वेदों से न्याय नहीं कर सके थे।

 

                ऋषि दयानन्द ऐसे ऋषि थे जिन्होंने अपने पूर्ववर्ती वेदभाष्यकारों के वेदार्थ की सत्य प्रमाणों एवं सिद्धान्तों से समीक्षा कर उनके दोषों को विद्वानों के सम्मुख उपस्थित किया। वैज्ञानिक भी जब कोई अनुसंधान करता है तो वह भी अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों के कार्यों का अध्ययन कर उनकी समीक्षा करता है और अपने अनुसंधान के आधार पर उनके सत्य होने व न होने पर अपने अध्ययन एवं अनुभवों को निःसंकोच भाव से प्रस्तुत करता है। ऐसे वैज्ञानिकों की सराहना की जाती है। इसी कारण विज्ञान ने आज आशातीत उन्नति की है और आगे और भी करेगा। धर्म, मत, मजहब तथा सम्प्रदायों में भी ऐसा होना चाहिये परन्तु वह उसमें अकल की दखल को स्वीकार नहीं करते। इससे बुद्धिमान लोग सरलता से इसके पीछे के कारणों को जान सकते हैं। ऋषि दयानन्द ने वेद हो या अन्य कोई ग्रन्थ, सभी ग्रन्थों की मान्यताओं का वेद के आलोक तथा तर्क, युक्ति, सृष्टिक्रम के अनुकूल होना, प्रत्यक्ष अनुभव आदि के आधार पर समीक्षा कर उनमें आवश्यकतानुसार संशोधन व परिवर्तन करने का कार्य किया जिससे देश व समाज सहित विश्व के मनुष्यों को लाभ हुआ। ऋषि दयानन्द ने धर्म संशोधन की जिस प्रणाली को विकसित कर हमें प्रदान किया था उनका वह वह कार्य अभी अधूरा है। सभी मतों के विद्वानों का कर्तव्य है कि वह ऋषि दयानन्द के इस महद् सत्य एवं मानव हितकारी कार्य को आगे बढ़ायें। ऐसा करने पर ही हम सही अर्थों में आधुनिक व सत्याचरण करने वाले मनुष्य कहे जा सकेंगे। हम ईश्वर से भी प्रार्थना करते हैं कि वह सभी मतों के लोगों को सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने की प्रेरणा करें और उनसे असत्य को छुड़वायें और सत्य को ग्रहण करवायें।  

 

                संसार में जितनी पुस्तकें उपलब्ध हैं वह सब किसी काल विशेष में ज्ञानी वा अल्प ज्ञानी लोगों द्वारा रची गयी हैं। यदि सभी ग्रन्थों में सत्य कथन व ज्ञान होता तो सबमें पूर्ण समानता होती। दो और दो को जोड़ने पर चार आता है और घटाने पर शून्य आता है। यह गणित का ज्ञान सभी मतों में समान है। इसी प्रकार से ईश्वर, जीवात्मा, सृष्टि और सामाजिक परम्पराओं में भी परस्पर किसी प्रकार का विरोध न होकर समानता होती तो यह कह सकते थे कि यह सभी सत्य हैं। मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में जो परस्पर भिन्नता व विरोध है, वह अज्ञानता के कारण से प्रतीत होता है। इनका समाधान ईश्वर के स्वतः प्रमाण ज्ञान वेद के साथ तुलना व मिलान करके किया जा सकता है। इसके साथ सत्य को जानने व परखने के अनेक प्रकार व नियम हैं। कोई भी ज्ञान सृष्टि क्रम के अनुकूल होना चाहिये। यदि कहीं परस्पर विरुद्ध भाव हैं तो उनमें दोनों व सभी सत्य नहीं हो सकतेे। सभी मतों की मान्यतायें ज्ञान व विज्ञान से पोषित व उनके अनुकूल ही होना चाहिये। पृथिवी गोल है तो मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में भी गोल ही लिखी मिलनी चाहिये। ईश्वर अनादि, नित्य, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वानन्द से युक्त है तो यह बात भी सभी मतों के ग्रन्थों में होनी चाहिये। यदि किसी ग्रन्थ में किसी भी कथन का सत्य के विपरीत वर्णन पाया जाता है तो वह ग्रन्थ मिथ्या ज्ञान से युक्त ही माना जायेगा और उसे ईश्वर से प्रेरित व सत्य ज्ञान नहीं माना जा सकता।

 

                अनेक व कुछ ग्रन्थों में निर्दोष मनुष्यों व पशु आदि की हिंसा का विधान यदि मिलता है अथवा किसी मत के लोग ऐसा कहते व करते हैं तो वह ज्ञान व मत ईश्वर से प्रेरित कदापि नहीं हो सकता। यह बात ऋषि दयानन्द ने अपने प्रचार, उपदेशों, सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों के द्वारा हमें समझाई है। मनुष्य जन्म लेना तभी सार्थक होता है जब कि मनुष्य किसी भी ग्रन्थ पर आंखें मूंद पर विश्वास न करे और अपने ज्ञान के नेत्रों से उसकी सभी मान्यताओं की पुष्टि करे। यदि वह पुष्ट हों, किसी प्राणी के लिये अहितकार व हानिकारक न हो, तभी वह मान्य व स्वीकार्य हो सकती हैं। ईश्वर का सत्यस्वरूप वेदों में वर्णित है। उसके अनुकूल व अनुरूप यदि किसी ग्रन्थ या शास्त्र में वर्णन है तो वह माननीय और यदि नहीं है तो वह त्याज्य होता है। जब तक संसार में सब मनुष्यों के व्यवहार में ऐसा नहीं होगा, मनुष्य जाति सुख को प्राप्त नहीं हो सकती और न ही मनुष्य परजन्म में उन्नति को प्राप्त हो सकते हैं। यह बातें वेदज्ञान, तर्क व युक्ति से सिद्ध होती हैं। ग्रन्थों के प्रति अन्धविश्वासपूर्ण आस्था ने मनुष्यजाति की अवर्णनीय हानि की है। महाभारत के बाद वेदज्ञान के लुप्त होने के बाद देश-देशान्तर में ज्ञान-विज्ञान में अत्यन्त वृद्धि हुई है, अतः सर्वत्र सभी पुस्तकों पर शोध कर उनकी सत्य मान्यताओं को अक्षुण रखते हुए असत्य विचारों को पृथक करना चाहिये। ऋषि दयानन्द यही चाहते थे। इसके पीछे उनका मनुष्य जाति की उन्नति, सुख व कल्याण अभिप्रेत था। कृत्रिम उपायों से समस्यायें हल नहीं होती। बीमार होने पर रोग के अनुसार मीठी या कड़वी दवा लेनी पड़ती है। आवश्यकता होने पर शल्य क्रिया भी करानी होती है जिससे मनुष्य स्वस्थ व सुखी होता है। ओ३म् शम्।              

-मनमोहन कुमार आर्य

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