“निराकार ईश्वर की उपासना, अवैदिक मूर्तिपूजा और काशी शास्त्रार्थ”

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Published on : 11 Oct, 19 08:10

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“निराकार ईश्वर की उपासना, अवैदिक मूर्तिपूजा और काशी शास्त्रार्थ”

वेद सृष्टि की आदि में ईश्वर द्वारा चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा को दिया गया ज्ञान है जो सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। संसार में वेदों से प्राचीन कोई ज्ञान, ग्रन्थ और वेदों की भाषा संस्कृत से प्राचीन कोई भाषा नहीं है। वेदों का ज्ञान भी पूर्ण है और सत्य सिद्धान्तों से युक्त है। संस्कृत भाषा विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। वेदों में ईश्वर, जीवात्मा तथा जगत के कारण प्रकृति का यथार्थ स्वरूप उपलब्ध होता है। ईश्वर का सत्यस्वरूप ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों सहित आर्यसमाज के दूसरे नियम में भी प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना योग्य है।’ ईश्वर सभी जीवों वा प्राणियों के सभी कर्मों का साक्षी होता है तथा उनके कर्मों का यथावत् फल उन्हें जन्म-जन्मान्तरों में प्रदान करता है। ईश्वर की न्याय व्यवस्था सभी दोषों से रहित हैं और पूरी तरह से आदर्श है। ईश्वर की न्याय व्यवस्था वा कर्म-फल सिद्धान्त का उद्देश्य अज्ञान, अन्धकार तथा असद्कर्मों में फंसे जीवों का सुधार कर उन्हें सद्कर्मों में प्रेरित करना और उन्हें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की उपलब्धि कराना है। अनादि काल से यह सृष्टि चक्र चल रहा है जिसमें जगत की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय होती आ रही है। प्रथम सृष्टि कब हुई व अन्तिम कब होगी इसका उत्तर अनादि, अनन्त, नित्य शब्दों में निहित है। सृष्टि-चक्र का न कभी आरम्भ है और न कभी अन्त होगा। यह सृष्टि सदा से चली आ रही है और सदा चलती रहेगी। जीव की यात्रा भी अनन्त की यात्रा है। मोक्ष प्राप्ति तक सभी जीवों का अपने-अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भिन्न योनियों में परमात्मा के द्वारा जन्म-मरण होता रहेगा। मोक्ष प्राप्त करने पर भी मोक्ष की अवधि पूरी हो जाने पर जन्म होता है। मोक्ष की अवधि 31 नील 10 खरब 40 अरब होती है। यह मोक्ष की अवधि सभी जीवों को असद्कर्मों से हटाकर सद्कर्मों अर्थात् धर्माचार कर मोक्ष प्राप्ति की प्रेरणा करने व उसे प्राप्त करने में सहायक हो सकती है।

 

                ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में देश अज्ञान, अन्धविश्वासों तथा कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। सभी अन्धविश्वासों का कारण व आधार मुख्यतः अज्ञान, सद्गुरुओं की अनुपलब्धि, वेदों का अप्रचार सहित मनुष्य की आत्मा की दुर्बलतायें यथा अपने प्रयोजन की सिद्धि अर्थात् स्वार्थ, हठ, दुराग्रह एवं अविद्यादि दोष हुआ करते हैं। महाभारत युद्ध के बाद लोगों के आलस्य व प्रमाद से इन अन्धविश्वासों में इन कारणों से निरन्तर वृद्धि होती गई। इसका परिणाम देश में ईश्वर की यथार्थ स्तुति, प्रार्थना, उपासना का लोप तथा मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष आदि अन्धविश्वासों का उत्पन्न होना हुआ। इन अन्धविश्वासों के कारण ही जन्मना जातिवाद की मिथ्या व हानिकारक प्रथा का आरम्भ होना हुआ। समाज में जो अनेकानेक विकृतियां उत्पन्न हुई उसका कारण भी वेद ज्ञान का लोप व अन्धविश्वासों का उदय होना था। ऋषि दयानन्द ने मथुरा में गुरु विरजानन्द जी से वेदांगों मुख्यतः शिक्षा व व्याकरण आदि की शिक्षा प्राप्त की थी। गुरु विरजानन्द से उन्हें देश की सभी समस्याओं के प्रमुख कारण अविद्या का ज्ञान व इसके दूर करने के उपाय वेदप्रचार का अमोघ अस्त्र भी वा ज्ञान मिला था। गुरु की प्रेरणा से ही उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य देश व संसार से अविद्या को दूर करना निश्चित किया था। अविद्या को दूर करने के लिये ही उन्हें अज्ञान, अन्धविश्वासों तथा मिथ्या परम्पराओं का खण्डन करना पड़ा था। वह वैदिक सत्य ज्ञान व उस पर आधारित कर्मकाण्डों व क्रियाकलापों का समर्थन व प्रचार करते थे। अविद्या को दूर करने तथा मानवता को घोर अज्ञान के अन्धकार के कूप से बाहर निकालने के लिये उन्हें ईश्वर की पूजा के नाम पर प्रचलित प्रबल व मुख्य अन्धविश्वास मूर्तिपूजा का भी खण्डन करना पड़ा था। उन्होंने केवल एकतरफा खण्डन किया हो ऐसी बात नहीं थी। प्रतिपक्ष को भी वह अपनी मान्यताओं, सिद्धान्तों व मूर्तिपूजा आदि का समर्थन करने का अवसर देते हैं और इसके लिये व्यक्तिगत रूप से चर्चा, शंका समाधान सहित शास्त्रार्थ आदि के लिये भी उद्यत रहते थे। देश भर के सभी पण्डितों वा विद्वानों को उन्होंने मूर्तिपूजा को वेद व तर्क के आधार पर सत्य सिद्ध करने की चुनौती दी थी। देश का कोई विद्वान या पण्डित मूर्तिपूजा का न तो वेद प्रमाण दे सका था और न ही मूर्तिपूजा को तर्क व युक्तियों से ही सिद्ध कर पाया था। ईश्वर निराकार, सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, अनादि, अनन्त एवं नित्य सत्ता है। उसकी मूर्ति बन ही नहीं सकती। मूर्ति का धर्म जड़ता होता है जबकि ईश्वर जड़ता से सर्वथा रहित पूर्ण चेतन सत्ता है। चेतन में ही ज्ञान होता है। जड़ मूर्ति न सुन सकती है, न देख सकती है अतः उसकी पूजा व उपासना से कोई लाभ नहीं होता। यह महर्षि दयानन्द जी का वेदाध्ययन से युक्त तर्कपूर्ण दृष्टिकोण है।

 

                ऋषि दयानन्द ने देखा व जाना था कि मूर्तिपूजा कुछ लोगों के लिये आजीविका का साधन बन गई है। इसी कारण अज्ञानता से युक्त कुछ विद्वान उसकी असत्यता को जानकर तथा उससे जुड़े अपने स्वार्थों के कारण उसे छोड़ नहीं पाते थे। ऋषि दयानन्द ने अपनी विवेक बुद्धि से यह भी अनुभव किया था कि देश की अवनति, पतन, मनुष्यों के बीच ऊंच-नीच की खाई, छुआ-छूत, देश की पराधीनता आदि सभी बुराईयों में मूर्तिपूजा तथा अन्धविश्वासों का प्रमुख योगदान है। अतः देश की उन्नति के लिये अन्धविश्वासों से जुड़े सभी कामों को समाप्त करना तथा वेदों से समर्थित एवं ज्ञान-विज्ञान पर आधारित प्रथाओं व पद्धतियों को प्रवृत्त करना आवश्यक था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये ही ऋषि ने मूर्तिपूजा का खण्डन तथा वेदों व उसके सिद्धान्तों का मण्डन करते हुए काशी के पण्डितों को मूर्तिपूजा को वेदसम्मत सिद्ध करने के लिये शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। काशी के पण्डितों को अपने पक्ष की निर्बलता का ज्ञान था। इस कारण वह शास्त्रार्थ से दूर भागते थे। बार-बार की चुनौतियों व काशी के राजा ईश्वरीनारायण सिंह के पण्डितों को निर्देश के बाद शास्त्रार्थ किया जाना निश्चित हुआ था। दिनांक 16 नवम्बर, सन् 1869 को काशी के आनन्द बाग में लगभग पचास हजार लोगों की उपस्थिति में मूर्तिपूजा को वेदसम्मत सिद्ध करने पर शास्त्रार्थ हुआ था।

 

                मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ में ऋषि दयानन्द वेदों का पक्ष रखने वाले अकेले विद्वान थे जबकि काशी के दिग्गज तीस से अधिक विद्वान उनका विरोध करने व उनसे प्रश्नोत्तर करने के लिये मंच पर उनके सम्मुख उपस्थित थे। काशी के पण्डितों को अपने पक्ष की निर्बलता का ज्ञान था। उनके पास मूर्तिपूजा के समर्थन में वेदों का कोई प्रमाण नहीं था। ऋषि दयानन्द के पास वेदों के अनेक प्रमाण थे जिनसे मूर्तिपूजा का खण्डन होता था। ऐसी स्थिति में शास्त्रार्थ में पण्डितों ने मूर्तिपूजा का विषय छोड़कर ऋषि दयानन्द को विषयान्तर में ले गये। ऋषि दयानन्द द्वारा विरोध करने पर भी उन्होंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। ऋषि दयानन्द अकेले थे और शास्त्रार्थ के अध्यक्ष महोदय काशी नरेश श्री ईश्वरीनारायण सिंह भी पौराणिकों के समर्थक थे। उन्हीं के अनुदान से काशी के पण्डितों को धन व सम्मान मिलता था। शास्त्रार्थ में काशी के सभी पण्डित न तो वेदों से मूर्तिपूजा का समर्थक कोई प्रमाण दे पाये और विषयान्तर जाने पर भी ऋषि दयानन्द द्वारा पूछे गये मनुस्मृति में कहे धर्म और अधर्म के लक्षण ही बता पाये। शास्त्रार्थ चल ही रहा था तभी अचानक काशी के शीर्ष पण्डित वा विद्वान स्वामी विशुद्धानन्द जी ने शास्त्रार्थ के समाप्त होने की घोषणा कर दी। उन्होंने अपनी विजय स्वयं ही घोषित कर दी। ऐसा करना उनका पूर्वनियोजित विचार व निर्णय था। शास्त्रार्थ और सत्य के निर्णय में काशी के पण्डितों को आरम्भ से ही रुचि नहीं थी। यद्यपि शास्त्रार्थ में ऋषि दयानन्द की विजय हुई थी परन्तु काशी के पण्डितों ने अपनी विजय का स्वयं ही निनाद कर दिया। पं0 विशुद्धानन्द जी के लिए ऐसा करना उचित नहीं था और न निर्णायक महोदय का इस पर मौन रहना ही उचित था। उनको व्यवस्था बनाये रखनी थी और शास्त्रार्थ को किसी निर्णय तक पहुंचाना था। काशी की शास्त्रार्थ कर रही पण्डित मण्डली के इशारे पर ही उनके अनुयायी विद्यार्थियों ने स्वामी जी पर पत्थर मिट्टी फेंक कर उनके प्राणहरण के प्रयास किये परन्तु वहां नियुक्त पुलिस अधिकारी श्री रघुनाथ प्रसाद जी की बुद्धिमत्ता व रक्षात्मक व्यवस्था से ऋषि दयानन्द के जीवन की रक्षा हो सकी थी।

 

                काशी शास्त्रार्थ में ऋषि दयानन्द का मूर्तिपूजा विषयक वैदिक सिद्धान्त ‘मूर्तिपूजा वेदविरुद्ध है’ अखण्डित रहा। ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में मूर्तिपूजा का न केवल मौखिक खण्डन ही किया अपितु सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों में मूर्तिपूजा के वेदविरोधी होने सहित अनेक तर्क एवं युक्तियों के आधार पर भी लेख द्वारा खण्डन किया है। उनके सभी प्रमाण, तर्क एवं युक्तियां आज भी सत्य सिद्ध हो रहे हैं। प्रतिपक्षी आज तक मूर्तिपूजा को वेद सम्मत सिद्ध नहीं कर सके। अवतारवाद की कल्पना ही मूर्तिपूजा की जड़ में है। उन दिनों राम, कृष्ण, शिव आदि की मूर्तियों की पूजा की जाती थी। इन पूज्य ऐतिहासिक पुरुषों को विष्णु आदि का अवतार माना जाता था। रामायण व महाभारत का अध्ययन करने से राम एवं कृष्ण जी ऐतिहासिक महापुरुष, वेदानुयायी तथा ईश्वरोपासक सिद्ध होते हैं परन्तु ईश्वर का अवतार सिद्ध नहीं होते। सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान ईश्वर का न तो अवतार हो सकता है और न ईश्वर को अवतार लेने की आवश्यकता है। ईश्वर निराकार स्वरूप से अपने सभी कार्यों को कर सकता है। अतः अज्ञान पर आधारित मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष सहित मृतक श्राद्ध एवं जन्मना-जातिवाद की सभी मान्यतायें खण्डनीय एवं त्यागने योग्य हैं। इन सभी मान्यताओं का वेदों के ज्ञान के अनुरूप होना असिद्ध है। तर्क एवं युक्तियों से भी मूर्तिपूजा आदि मान्यतायें सत्य सिद्ध नहीं की जा सकती। इन अन्धविश्वासों से देश की अवनति व पतन हुआ है। देश में गुलामी आयी थी। देश के विभाजन व हिन्दुओं की जनसंख्या में ह्रास का कारण भी सभी अन्धविश्वासों को माना जा सकता है। हम जितना अन्धविश्वासों वा अज्ञानता से दूर रहेंगे और सत्य के निकट रहेंगे उतना ही हमारा जीवन सुखी, उन्नत व कल्याणप्रद होगा।

 

                काशी शास्त्रार्थ 16 नवम्बर, सन् 1869 को काशी में हुआ था। इसे 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली तथा आर्य प्रतिनिधि सभा, उत्तर प्रदेश संयुक्त रूप से काशी में ‘‘वैदिक धर्म आर्य महासम्मेलन” आयोजित कर रही हैं। यह तीन दिवसीय आयोजन दिनांक 11 अक्टूबर, 2019 को आरम्भ हो रहा है। हम इस अवसर पर आयोजनकर्ताओं सहित सभी ऋषि भक्तों को अपनी शुभकामनायें एवं बधाई देते हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह इस आयोजन को सफलता प्रदान करें। हमारे प्यारे भारत देश का उदय हो। हमारा देश विश्वगुरु के अपने गौरवमय स्थान को प्राप्त करे। हम यह भी कहेंगे कि भारत वेद, ऋषियों के दर्शन एवं उपनिषद ग्रन्थों तथा ऋषि दयानन्द की विचारधारा को अपनाकर ही विश्वगुरु का पद प्राप्त कर सकता है अन्यथा नहीं। पौराणिक मान्यताओं एवं रीति-रिवाजों से विश्वगुरु बनना सम्भव नहीं है। यदि कोई ऐसा मानता है तो इसे मृग-मरीचिका-वत विचार ही कह सकते हैं। वैदिक धर्म की जय, भारत माता की जय, गो माता की रक्षा व पालन हो, वेदों की ज्योति जलती रहे। ऋषि दयानन्द की जय हो। ऋषि दयानन्द अमर रहें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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