आध्यत्म और प्राकृतिक सौंदर्य का सम्मोहन कभी न भूल पाएंगे उत्तराखंड की यात्रा

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Published on : 14 Sep, 19 04:09

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

आध्यत्म और प्राकृतिक सौंदर्य का सम्मोहन कभी न भूल पाएंगे उत्तराखंड की यात्रा

देवभूमि (देवताओं की भूमि) के नाम से विख्यात उत्तराखण्ड धर्म एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का संगम लिए देश का महत्वपूर्ण पर्यटन क्षेत्र है। हरी-भरी प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित एवं हिमखण्डों से ध्वल आभा बिखेरती पर्वतों की ऊँची-ऊँची चोटियां, हिम खण्डों के पिघलने से इठलाती-बलखाती-कलछल करती गंगा एवं यमुना जैसी आराध्य नदियां और झिलमिलाते ऊँचाई से गितरते जलप्रपात, हिल स्टेशन, वन्यजीवों की अठखेलियां तथा मनोरंजन के लिए वाटर स्पोर्ट्स यहां की अपनी ही विशेषताएं हैं। 

        बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री की चारधाम यात्रा, पर्यावरण एवं पेड़ां को बचाने के लिए सत्तर के दशक का चिपको आन्दोलन, हरिद्वार का कुम्भ, ऋषिकेश की प्राकृतिक खूबसूरती के मध्य देश का प्रमुख योग केन्द्र भी उत्तराखण्ड को रेखांकित करने वाली विशिष्ठताएं हैं।

             भारत के 27 वें राज्य के रूप में इसकी स्थापना 9 नवम्बर 2000 को की गई। वर्ष 2006 में स्थानीय लोगों की भावना के अनुरूप इसका नाम बदलकर उत्तराखण्ड किया गया। पूर्व में यह उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था। राज्य की सीमाएं उत्तर में तिब्बत, पूर्व में नेपाल, पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और पूर्व में उत्तर प्रदेश से लगी हैं। 

             हिन्दू धर्म की पवित्र और भारत की सबसे बड़ी नदी गंगा और यमुना का यह उद्गम गंगोत्री और यमुनोत्री से हुआ। नदियों के तटों पर कई वैदिक संस्कृति कालीन महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं। गंगा, अलकनन्दा, भागीरथी, रामगंगा, कोसी, गोमती आदि प्रमुख नदियां हैं। उत्तराखण्ड की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में पर्यटन का महत्वपूर्ण योगदान है।                    यहां बासमती चावल, गेहूँ, सोयाबीन, मूंगफली, दाल एवं तिलहन प्रमुख विकसित फसलें हैं। यहीं पर खाद्य प्रसंस्करण के लिए सेव, लीची, आडू, नारंगी एवं प्लम जैसे फलों का उत्पादन बड़े पैमाने पर किया जाता है।उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा नगर देहरादून राज्य की राजधानी है। राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में स्थित है। राज्य का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 53,483 वर्ग किमी है, जिसमें से अधिकांश भाग करीब (80 प्रतिशत) 43,035 वर्ग किमी पर्वतीय क्षेत्र है तथा 65 प्रतिशत 34 हजार वर्ग किमी भू-भाग वनाच्छादित एवं 7.44 वर्ग किमी क्षेत्र मैदानी है। 

             राज्य में उत्तरी भाग वृहत हिमालय की ऊँची चोटियों की श्रृंखला से आच्छादित है और हिमखण्डों (ग्लेशियरों) से ढका है। पहाड़ों की तहलटी में सघन वनों का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। गंगोत्री, दूनगिरी, बन्दरपूंछ, केदार, चौखम्भा, कामेट, सतोपंथ, नीलकंठ, नन्दादेवी, गौरी पर्वत, हाथी पर्वत, मृगथनी, गुनी, माना एवं यूंगटागट महत्वपूर्ण हिमशिखरों में आते हैं। हिमालय के विशिष्ट पारिस्थितिकीय तंत्र के अन्तर्गत पशु-पक्षी, पौधे एवं जड़ी-बूटियां वनों की विशेषताएं हैं। नैनीताल, भीमताल, नौकुचियाताल प्रमुख झीलें हैं।                  जनगणना के अनुसार राज्य में एक करोड़ से अधिक जनसंख्या निवास करती है। राज्य में दो संभाग एवं 13 जिले हैं और साक्षरता दर 78.82 प्रतिशत हैं। उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान एवं  नन्दा देवी राष्ट्रीय उद्यान दोनों मिलकर यूनेस्को की विश्वधरोहर सूची में मान बढ़ाते हैं। राज्य में भारत का पुराना राष्ट्रीय उद्यान जिम कार्बेट (बंगाल टाइगर), नैनीताल के रामनगर में उत्तरकाशी में गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान महत्वपूर्ण हैं।

            विद्युत उत्पादन की दृष्टि से टिहरी पन बिजलीघर महत्वपूर्ण विद्युत उत्पादन परियोजना है। यमुना, भागीरथी, अलकनन्दा, मन्दाकिनी, कोसी तथा काली आदि नदियां पर पन बिजलीघर बनाये गये हैं। राज्य में उद्योग लगाने के लिए भी उद्यमी आगे आने लगे हैं। राज्य में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, बंगाली, नेपाली एवं स्थानीय गढ़वाली व पहाड़ी भाषाएं बोली जाती हैं।

              कला-संस्कृति एवं पर्यटन की दृष्टि से उत्तराखण्ड अत्यन्त समृद्धशाली राज्य हैं। हरिद्वार एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है जहां हर बारह वर्ष में कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में देशी एवं विदेशी सैलानी भाग लेते हैं। नैनीताल, अलमोड़ा, कोसानी, भीमताल, रानीखेत, मसूरी एवं ऋषिकेश राज्य के प्रमुख पर्वतीय पर्यटक स्थल हैं। हिन्दू धर्म में चार धामों की यात्रा को प्राचीन समय से ही पुण्यकारी एवं मोक्षदायीनी माना गया है। दीपावली, होली एवं दशहरा पर्वो के साथ-साथ स्थानीय पर्व चम्पावत में देवधुरी मेला, बागेश्वर में उत्तरायणी मेला, अलमोड़ा में नन्दादेवी मेला, कुमाऊँ में हरेला, चमोली में गोचर मेला, उत्तर काशी में माघ मेला आदि मुख्य रूप से मानाये जाते हैं। त्यौहारों एवं विशेष सामाजिक अवसरों पर आंगन को माण्डनों आदि से सजाने की परम्परा है। भगवान के प्रति डिकारे बनाये जाते हैं तथा दरवाजों के चौखट देवी-देवताओं, हाथी, शेर, मोर आदि के चित्रों से सजाये जाते हैं, जो पहाड़ी चित्रकला का एक रूप है।

           यहां की लोक धुनें अन्य राज्यों से भिन्न हैं तथा नगाड़ा, ढोल, भेरी, बीन, कुरूली एवं अलगोजा प्रमुख वाद्य यंत्र हैं। लोकगीतों में बेडू पाको लोकप्रिय है जिसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। साथ ही फाग, छपेली, बैर, न्यूयोली आदि प्रमुख हैं। समाज में लोक कथाओं एवं लोक विश्वासों का प्रचलन भी देखने को मिलता है। यहां छोलिया नृत्य विशेष रूप से लोकप्रिय है। यह नृत्य ऐतिहासिक युद्ध जैसा प्रतीत होता है। कुमाऊँ एवं गढ़वाल में महिलाएं एवं पुरूष बड़े गोल घेरे में झोड़ा नृत्य करती हैं।

          दर्शनीय स्थलपर्वतीय स्थलउत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की चोटियां पर स्थित है अनेक खूबसूरत पर्वतीय स्थल। जिन्हें पर्वतों की सुन्दरता, प्राकृतिक छंटा और हिमालय के नयाभिराम दृश्य देखने की रूचि है उन्हें अवश्य ही उत्तराखण्ड के पर्यटन पर आने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। प्रकृति प्रेमियों के लिए उत्तराखण्ड में मसूरी, नैनिताल, अल्मोडा, धनौल्टी, लैंसडाउन, वैली ऑफ फ्लावर, चमौली तथा देहरादून हिल स्टेशन के दृश्य अत्यन्त लुभावने होते हैं। पर्वतों से जब बादलों का मिलन होता है, चोटियां बर्फ से ढ़क जाती हैं तथा रंग-बिरंगे निराले फूलों की छंटा खिलती है तो ये दृश्य जीवनभर के लिए यादगार बन जाते हैं। ये पर्वत जहां अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य से अविभूत करते हैं वहीं ट्रेकिंग, क्लाइबिंग तथा वाटर राफ्टिंग जैसे साहसिक जल क्रीड़ाओं के लिए निमंत्रण भी देते हैं। पर्वतों की हरी-भरी चोटियां, टेडे-मेडे रास्ते और वन्यजीवन के साथ-साथ इस राज्य में अनेक खूबसूरत झीलें सैलानियों को आकर्षित करने का एक जादुई सम्मोहन लिये हुए हैं।


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