‘‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा स्पष्ट करे आयोग

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Published on : 12 Feb, 19 06:02

‘‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा स्पष्ट करे आयोग
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से पूछा है कि देश में बहुसंख्यक होने के बावजूद यदि एक समुदाय किसी राज्य में अल्पसंख्यक है तो क्या उसे उस राज्य में माइनरिटी का दर्जा दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट आयोग से कहा कि वह तीन माह के अंदर इस विषय पर अपनी नीति स्पष्ट करे। पूवोत्तर के कई राज्यों के अलावा जम्मू-कश्मीर और पंजाब में अन्य धर्म के मानने वालों की अपेक्षा हिंदुओं की आबादी कम होने की वजह से यह सवाल उठा है।
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय से कहा कि वह अल्पसंख्यक आयोग में फिर से अपना प्रतिवेदन दाखिल करें और आयोग तीन महीने के भीतर इस पर निर्णय लेगा। उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा है कि ‘‘अल्पसंख्यक’ शब्द को नए सिरे से परिभाषित करने और देश में समुदाय की आबादी के आंकड़े की जगह राज्य में एक समुदाय की आबादी के संदर्भ में इस पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। याचिका के अनुसार राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार हिन्दु बहुमत में हैं लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों के साथ ही जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में वह अल्पसंख्यक हैं। इसके बावजूद इन राज्यों में हिन्दु समुदाय के सदस्यों को अल्पसंख्यक श्रेणी के लाभों से वंचित रखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 10 नवम्बर, 2017 को सात राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेश में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया था। अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा था कि उसे इस बारे में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से संपर्क करना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि 2011 की जनगणना के अनुसार लक्षद्वीप, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिन्दू समुदाय अल्पसंख्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को निर्देश दिया है कि राज्य की आबादी के आधार पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक परिभाषित करने के लिए दिशा-निर्देश बनाने संबंधी प्रतिवेदन पर तीन महीने के भीतर निर्णय ले।

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