लाख कीट आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण पर प्रसार परियोजना

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Published on : 08 Feb, 19 03:02

लाख कीट आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण पर प्रसार परियोजना

 महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संघटक राजस्थान कृषि महाविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रेषित दो दिवसीय लाख कीट आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण पर प्रसार परियोजना की छठी समन्वय समिति की बैठक और कार्यशाला का उद्घाटन समारोह अनुसंधान निदेशालय में सुबह सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. के.के. सिंह, सहायक महानिदेशक (फार्म इंजीनियरिंग), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान और शिक्षा तंत्र की यह एक महत्वपूर्ण अनुसंधान परियोजना है। विगत वर्षों में इस परियोजना के अन्तर्गत किये जा रहे अनुसंधान कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है। लाख की परियोजना के अन्तर्गत अधिक से अधिक किसानों को प्रशिक्षण देकर लाख की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा ताकि वो अपनी आमदनी को बढा सके।

कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय प्राकृतिक लाख एवं गोंद परियोजना के निदेशक तथा परियोजना एवं समन्वयक, रांची के डॉ. के.के. शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि ३०-४० वर्षों पूर्व हमारे देश में लाख की खेती पूरे भारतवर्ष में की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे इसके कम उपयोग के कारण इसकी खेती पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया। वर्ष २०१३-१४ में पुनः इसके महत्व एवं उपयोगिता को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा इस परियोजना की शुरूआत की गयी। आज लाख की खेती में भारत प्रथम स्थान पर है और पूरे देश में २० मैट्रिक टन लाख का उत्पादन हो रहा है। इस परियोजना से जुडे सभी अनुसंधान केन्द्र इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि लाख का सर्वाधिक उपयोग राजस्थान में होता है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि एम.पी.यू.ए.टी. के अनुसंधान निदेशक डॉ. अभय कुमार मेहता ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में लाख की धार्मिक महत्ता को बताया और कहा कि आज भी लडकी की शादी में लाख की चूडयों को पहनाना शुभ माना जाता है। किसानों की आर्थिक दशा सुधारने में लाख की खेती अपना अहम योगदान दे सकती है। क्योंकि एक कुसुम पौधे से ५० किलो तथा बेर के पौधे से १० किलो लाख का प्रतिवर्ष उत्पादन होता है।

डॉ. एस.के. शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि लाख की खेती की काफी संभावना है, इसके लिए बेर, पलास, पीपल तथा बरगद के पेड उपयुक्त है, लेकिन इसके लिए कीटों का संरक्षण बहुत ही महत्वपूर्ण है। लाख कीटों की पहचान कर उनका बहुलीकरण करना एक महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्य है। लाख कीट प्रौद्योगिकी के माध्यम से किसान अपनी आय को बढा सकते हैं।

डॉ. अरूणाभ जोशी ने कहा कि लाख का हमारे जीवन में प्राचीन समय से ही काफी महत्व है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में विभिन्न रंगों की लाख पायी जाती है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं लाख की चूडयाँ पहनने का प्रचलन है।

कार्यक्रम सचिव एवं परियोजना प्रभारी डॉ. हेमन्त स्वामी ने बताया कि इस दो दिवसीय कार्यशाला में लाख परियोजना के ८ केन्द्रों गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू, मणिपुर, आसाम, केरल, उत्तराखण्ड, मध्यप्रदेश तथा दादर एवं नागर हवेली के लाख कीट परियोजना से जुडे अनुसंधान के ३५ वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं। डॉ. स्वामी ने बताया कि इस दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान अनुसंधान प्रगति का प्रतिवेदन प्रस्तुत कर विगत वर्षों की प्रगति का विश्लेषण किया जाएगा साथ ही लाख कीट के संवर्धन एवं संरक्षण का विश्लेषण एवं मंथन किया जाएगा।

डॉ. हेमन्त स्वामी ने बताया कि राजस्थान कृषि महाविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के लाख कीट संग्रहालय एवं प्रयोगशाला तथा लाख कीट जीन बैंक का विभिन्न राज्यों के वैज्ञानिकों ने अवलोकन किया एवं सभी वैज्ञानिकों ने महाविद्यालय में स्थापित प्रयोगशाला एवं जीन बैंक की प्रशंसा की। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा डॉ. हेमन्त स्वामी एवं डॉ. लेखा का संकलित तकनीकी पुस्तिक पश्चिमी शुष्क प्रभाग में लाख कीट एवं पोषक वृक्ष की परिस्थिति का विमोचन भी किया गया।

उदयपुर केन्द्र के लाख परियोजना अनुसंधान का प्रतिवेदन सह प्रभारी एवं सहायक प्राध्यापक डॉ. लेखा ने प्रस्तुत किया व संभाग में लाख पालन की सम्भावनाओं एवं लाख कीट के पोषक वृक्षों की जानकारी प्रदान की।

कार्यक्रम का संचालन विद्यावाचस्पति छात्र मोनिका ने किया तथा धन्यवाद की रस्म डॉ. मनोज महला ने की।


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