‘आर्यसमाज में हम पशुता छोड़ने तथा श्रेष्ठ संस्कार लेने जाते हैं’

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Published on : 04 Feb, 19 05:02

‘आर्यसमाज में हम पशुता छोड़ने तथा श्रेष्ठ संस्कार लेने जाते हैं’

आज दिनांक 3-2-2019 को हमने आर्यसमाज-धामावाला, देहरादून के रविवारीय साप्ताहिक सत्संग में भाग लिया। यहां प्रातः यज्ञशाला में यज्ञ, उसके बाद श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम, देहरादून की कन्याओं द्वारा भजन, पं. विद्यापति शास्त्री जी द्वारा भजन, सामूहिक प्रार्थना, सत्यार्थप्रकाश के चौदहवें समुल्लास के कुछ भाग का पाठ तथा अन्त में हरिद्वार से पधारे आर्य विद्वान डॉ. सरेन्द्र कुमार शर्मा जी का प्रवचन हुआ। डॉ. शर्मा आर्य वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम, ज्वालापुर में निवास करते हैं और उसकी मासिक पत्रिका ‘‘स्वस्ति-पंथा का सम्पादन भी करते हैं।

 

आर्यसमाज के विद्वान पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी द्वारा गाये गये भजन के बोल थे गुरुदेव प्रतिज्ञा है मेरी पूरी करके दिखलाऊंगा, इस वैदिक धर्म की वेदी पर मैं जीवन भेंट चढ़ा दूंगा। इसके बाद की पंक्तियां थीं धन पास नहीं तन मन अपना सिर गुरु चरणों में धरता हूं, गुरु आज्ञा पालन करने की मैं आज प्रतिज्ञा करता हूं। अपना सर्वस्व लुटा कर भी अपना कर्तव्य निभाऊगां, इस वैदिक धर्म की वेदी पर मैं अपना सर्वस्व चढ़ा दूंगां।। इससे पूर्व श्री स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम की तीन छोटी कन्याओं ने एक समूह भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे जीवन के दिन चार पंछी उड़ जाना, कर ले जतन हजार पंछी उड़ जाना। इस भजन की अगली पंक्तियां थी ये पंछी है बड़ा अनोखा एक दिन देगा जरूर धोखा, सोया चादर तान पंछी उड़ जाना। इस पंछी का नही ठिकाना इसने निकल जरूर जाना, रो रो हो हैरान पंछी उड़ जाना। इसके बाद आश्रम की कुछ बड़ी तीन कन्याओं ने जो भजन गाया उसके बोल थे सविता पिता विधाता दूरितों को दूर कर दो सब भद्र भाव अपने जीवन में मेरे भर दो। भजनों के बाद आश्रम की ही एक छोटी बालिका रोशनी ने सामूहिक प्रार्थना कराई। पहले सामूहिक प्रार्थना में एक भजन हे नाथ सब सुखी हों कोई हो दुःखारी की पंक्तियां गाई गई और उसके बाद स्तुति प्रार्थना उपासना के एक मन्त्र ओ३म् प्रजापते त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परि ता बभूव का पाठ किया। इसके बाद हिन्दी भाषा में भी प्रार्थना के शब्द बोले गये। कुछ शब्द इस प्रकार थे। हे ईश्वर! आप सर्वव्यापक हैं और संसार के बनाने वाले हैं। आप कृपया हमारी सारी कामनायें पूर्ण कर दीजिये। योगीजन आपके पवित्र ओ३म् नाम का स्मरण एवं जप करते हैं। हम सब भी मिलकर आपकी महिमा के गीत गायें। हे ईश्वर! जब हमारी मृत्यु हो तो हम इस संसार से पार हो जाये। हमारा जन्म-मरण का चक्र समाप्त होकर हम मुक्ति को प्राप्त हों। इस कार्य में आप हमारी सहायता एवं मार्गदर्शन करें। सामूहिक प्रार्थना के बाद आर्यसमाज के पुरोहित जी ने सत्यार्थप्रकाश के चौदहवें समुल्लास के कुछ भाग का पाठ किया। इस प्रकरण को सुन कर ज्ञात हुआ कि बाइबिल वर्णित परमेश्वर को यह पता नहीं था कि उसे भविष्य में स्वर्ग के बगीचे से आदम हव्वा को ज्ञान देने वाले वृक्ष के फलों को खाने के कारण निकालना पड़ेगा।

 

                सत्संग में आर्य वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रम, ज्वालापुर, हरिद्वार से पधारे विद्वान डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा का प्रवचन हुआ। उन्होंने अपने प्रवचन के आरम्भ में प्रश्न किया कि हमें इस बात पर विचार करना है कि हम इस संसार में क्यों आये हैं? उन्होंने कहा कि बहुत से धनहीन व्यक्ति धन होने के कारण स्वयं को भाग्यहीन मानते हैं। शर्मा जी ने कहा कि सबसे भाग्यहीन वह मनुष्य है जो कि ईश्वर की उपासना नहीं करते। ईश्वर ने हमारे लिए इस सृष्टि इसके सभी पदार्थों को बनाया है। उसने कृपा करके हमें मनुष्य शरीर और इसमें ज्ञान कर्म इन्द्रियों सहित मन, बुद्धि आदि अवयव प्रदान किये हैं। ईश्वर का बनाया ही यह संसार है। यहां हमारा अपना कुछ नहीं है फिर भी हम अनेक दृष्टियों से सम्पन्न एवं समृद्ध होते हैं। हम धन, पत्नी, पुत्र, पुत्री, माता, पिता, घर, वाहन सबको अपना कहते हैं। क्या वस्तुतः यह सब पदार्थ हमारे अपने हैं? यह पदार्थ हमें ईश्वर की कृपा से मिले हैं अतः हमें उसका विधिपूर्वक पूरी तन्मयता एवं भावना से धन्यवाद करना चाहिये।

 

                डॉ. शर्मा ने संन्ध्या में उपस्थान के मन्त्रों की चर्चा की और कहा कि हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि परमात्मा हमाने जीवन में अज्ञान, अविद्या अन्धकार को दूर कर दे। उन्होंने कहा कि ईश्वर से हमारा पिता-पुत्र का सम्बन्ध है। हम जीवित रहते हुए तथा मरने के बाद भी हे ईश्वर! आपको देखते रहें। शर्मा जी ने कहा कि सूर्य, चन्द्र, पृथिवी एवं पृथिवी के सभी पदार्थ ईश्वर के बनाये हुए हैं। यह हमें ईश्वर का स्मरण कराते हैं। आत्मा को मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता है। ईश्वर के दर्शन, ज्ञान, परोपकार तथा दान आदि से रहित जीवन अधूरा व्यर्थ प्रायः है। हमें जीवन में परमात्मा की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील होना है। ईश्वर रसमय वा आनन्दस्वरूप है। सर्वव्यापक ईश्वर हमारे शरीर आत्मा में समाया हुआ है। ईश्वर का आनन्द भी हमारे भीतर है जो उसका ध्यान चिन्तन करने से प्राप्त होता है। शर्मा जी ने कहा कि हमारी आत्मा जन्म मरण के चक्र में फंसी हुई है। बार-बार हमारा पूर्वजन्मों के मनुष्य जीवन में अर्जित पाप पुण्य के अनुसार मनुष्य इतर योनियों में जन्म होता रहता है। शर्मा जी ने माता के गर्भ में बच्चे की अवस्था का वर्णन किया। जन्म होने पर शिशु सबसे पहले अपनी माता के दर्शन करता है और ईश्वर को भूल जाता है संसार में फंस जाता है। शर्मा जी ने कहा कि माता के गर्भ में वह ईश्वर को वहां से शीघ्र बाहर निकालने और बाहर आकर उस ईश्वर की उपासना करने का वचन देकर आता है परन्तु संसार में आकर वह लोभ मोह के बन्धनों में फंस जाता है। वह भूल जाता है कि उसने ईश्वर को उसकी उपासना का वचन दिया था।

 

                आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने कहा कि हम आर्यसमाज में इस लिये जाते हैं कि हमें ईश्वर के स्वरूप उसकी उपासना की विधि का ज्ञान हो सके। हम जीवन के उद्देश्य लक्ष्य को जानकर उनको प्राप्त करने के लिये आवश्यक साधनों का अवलम्बन कर सकें। शर्मा जी ने प्रसिद्ध ग्रन्थ गीता का उल्लेख कर कहा कि जो मनुष्य मृत्यु के समय ओ३म् का उच्चारण करता है उसकी मुक्ति हो जाती है। उस व्यक्ति का जीवन सार्थक हो जाता है। ओ३३म् का जप हम इस लिये करते हैं कि जिससे हमारी आत्मा का अज्ञान नष्ट हो जाये तथा हम असत्य कर्मों से पृथक होकर सत्य कर्मों का अनुष्ठान आचरण किया करें। विद्वान आचार्य ने कहा कि पशु उसे कहते हैं जो देखता है परन्तु सोच नहीं सकता है। धन सुविधाओं का संग्रह और भौतिकवादी जीवन से हम मनुष्य पशुओं के समान हो जाते है। शर्मा जी ने श्रोताओं को विचार करने को कहा कि कहीं आप हम मनुष्यत्व के स्थान पर पशुत्व को तो नही बढ़ा रहे हैं? शर्मा जी ने कहा कि आहार, निद्रा, भय मैथुन में मनुष्य पशुओं में अन्तर नहीं है। मनुष्य में धर्म होता है तथा चरित्र, नैतिकता और भक्ति होती है। इसी से मनुष्य और पशु में भेद होता है। उन्होंने कहा कि पशु सोच नहीं सकता जबकि मनुष्य सोच सकता है। शर्मा जी ने कहा कि यदि हममें धर्म नहीं है तो हम पशु ही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम धर्म अर्थात् वैदिक धर्म का आचरण नहीं करेंगे तो हमें अगला जन्म पशु का ही मिलेगा। पशु-पक्षी आदि प्राणियों को उनका शरीर पूर्वजन्मों के मनुष्य जीवन में धर्म का पालन करने के कारण ही मिला है। विद्वान डॉ. सुरेन्द्र शर्मा जी ने कहा कि आर्यसमाज आने और यज्ञ, भजन प्रवचन सुनने से संस्कार बनते हैं। इससे हमारा भावी जीवन सुधरता है। जो लोग सेच-समझ कर कार्य करते हैं वह सही अर्थों में मनुष्य बनते हैं।

 

                डॉ. शर्मा ने कहा कि वेद मनुष्य को चिन्तनशील बनाते हैं। इससे जीवन धन्य वा लक्ष्य प्राप्त करने वाला होता है। मनुष्य होकर भी विद्या पढ़ना और उसके अनुसार जीवन जीने से जीवन निरर्थक बनता है। जिस मनुष्य के जीवन में तप नहीं होगा उसका जीवन पतन को प्राप्त होगा। शर्मा जी ने ज्ञान, सदाचार तथा दान का महत्व भी बताया। परमात्मा अपने सभी कार्यों से संसार के सभी प्राणियों को दान दे रहा है। उसकी बनाई जड़ वस्तुयें सूर्य, चन्द्र, वायु, जल आदि भी दान कर रहीं हैं। आचार्य शर्मा जी ने कहा कि मृत्यु से पूर्व हमें मोह का त्याग कर देना चाहिये। किसी भी पदार्थ, पत्नी पुत्र, में आसक्ति नहीं होनी चाहिये। हमारा जीवन स्वच्छ पापों से मुक्त होना चाहिये, तभी हमारा कल्याण होगा। डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने कहा कि हम आर्यसमाज में पापों से होने वाली हानियों को जानने उन्हें छोड़ने की प्रेरणा ग्रहण करने आये हैं। हमें जीवन में मनुष्य से देवत्व की ओर बढ़ना है। दिव्य गुणों से युक्त होकर मनुष्य देवता बनता है। हम दानी बनें। जब हमारी मृत्यु होगी तो हमें अपना शरीर मृत्यु को दान करना होगा। इससे शिक्षा लेकर हमें अपनी भौतिक वस्तुओं को दान देने मे ंप्रवृत्त हो जाना चाहिये। शर्मा जी ने एक महत्वपूर्ण बात यह कही कि जितना दुःख मनुष्य को मृत्यु के समय प्राण छोड़ने में होता है उतना ही दुःख उसे जन्म लेने में भी होता है। उन्होंने कहा कि नया शरीर प्राप्त हो जाने पर प्रसन्नता होती है। उन्होंने सूर्य, पृथिवी, वायु आदि जड़ पदार्थों को देवता बताया। उन्होंने कहा कि यह सब पदार्थ दिव्य गुणों से युक्त हैं और उनसे हमें प्रकाश, जीवन, आश्रय, भोजन एवं प्राण आदि सभी आवश्यकता के पदार्थ मिलते हैं। शर्मा जी ने कहा कि सूर्य, पृथिवी वायु आदि सदा-सर्वदा दान करते रहते हैं। यह बहुत बड़े दानी हैं। यह निरन्तर क्रियाशील हैं और अपना सर्वस्व दान कर रहे हैं। इनसे हमें प्रेरणा लेकर हमें भी शुभ गुणों वस्तुओं का दान करना चाहिये।

 

                डॉ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा जी ने कहा कि हमें अपने ज्ञान का दुरुपयोग कर सदुपयोग करना है। हम कभी बुरे काम करें तथा हमारा हर कार्य अच्छा होना चाहिये। हम दान करें और किसी की हिंसा करें। उन्होंने कहा कि कभी भी हमारे प्राण निकल सकते हैं। किसी को पता नहीं कि वह कब तक जीवित रहेगा? कहावत है कि सामान सौ वर्ष का पल की खबर नहीं यह बात वास्तविक है। अतः हमें ईश्वर की उपासना सहित अच्छे कार्यों को ही निरन्तर करना चाहिये। अपने उपदेश को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि जब हमारा जीवन परमार्थ के गुणों से युक्त हो जायेगा तो हमें अपने प्राण छोड़ने में भय नहीं लगेगा। इस अवस्था को प्राप्त करने पर ही हमारा जीवन सार्थक होगा।

 

                आर्यसमाज के प्रधान डॉ. महेश कुमार शर्मा जी ने विद्वान वक्ता की विद्वता की प्रशंसा की और उनका धन्यवाद किया। शर्मा जी प्रत्येक सत्संग में श्रोताओं को एक वेद विचार देते हैं। इस दिन का विचार देते हुए उन्होंने कहा कि ईश्वर दयालु और न्यायकारी है। आगामी सप्ताह जिन सदस्यों के जन्म दिवस हैं, उन सबको प्रधान डॉ. शर्मा जी ने शुभकामनायें दीं। उन्होंने आर्यसमाज को दान देने वाले सदस्यों के नामों तथा प्राप्त धनराशि को भी पढ़कर सुनाया। डॉ. महेश शर्मा जी ने संयुक्त प्रान्त के ककोड़ी के मेले की ऋषि-जीवन की एक घटना भी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि यह मेला 27-10-1868 से 31-10-1868 तक पांच दिनों तक चला था। यहां स्वामी जी का एक विदेशी पादरी से प्रश्नोत्तर हुआ था। एक देशी पादरी ने इस वार्तालाप में दुभाषिये का काम किया था। पादरी का पहला प्रश्न स्वामी के वस्त्र धारण करने पर था। इसका वह उन दिनों मात्र कौपीन धारण करते थे। इसका उत्तर स्वामी जी ने यह दिया था कि कपड़े मैले हो जाते हैं। उन्होंने धोना सुखाना पड़ता है। मैं सुख के अर्थ वस्त्र धारण नहीं करता। स्वामी जी ने अपने शरीर पर मिट्टी का लेपन करने का कारण यह बताया कि इससे मक्खी मच्छर परेशान नहीं करते। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में स्वामी जी के सुखी सन्तुष्ट जीवन के रहस्य का यह उत्तर था कि वह सन्तोष रखते हैं इसलिये वह सुखी रहते हैं। स्वामी जी के भोजन पर भी प्रश्न किया गया तो उन्होंने कहा कि आप मेरे साथ रहकर देख लें, मैं क्या खाता हूं, तो आपको विदित हो जायेगा। सत्संग का संचालन आर्यसमाज के युवा मंत्री श्री नवीन भट्ट जी ने योग्यतापूर्वक किया। वह जब भी किसी वक्ता या व्यक्ति को प्रस्तुति के लिये बुलाते है ंतो उसका परिचय देते हैं और प्रस्तुति के बाद उसकी प्रस्तुति की समीक्षा भी करते हैं। मंत्री जी स्वाध्यायशील हैं एवं ऋषि और आर्यसमाज के प्रति समर्पित हैं। सत्संग की समाप्ति पर संगठन सूक्त हुआ तथा शान्ति पाठ के बाद सत्संग समाप्त हो गया। ओ३म् शम्।


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