वेद और युक्ति प्रमाणों से युक्त सत्यार्थप्रकाश के कारण आर्यसमाज

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Published on : 07 Dec, 17 17:12

विश्व की सर्वोत्तम धार्मिक एवं सामाजिक संस्था है”

धार्मिक संस्था उसे कहते हैं जिससे मनुष्य के सभी कर्तव्यों का ज्ञान हो व वह उसका युक्ति तर्क व प्रमाण पूर्वक प्रचार करती हो। मनुष्यों के कर्तव्यों का जैसा विधान सृष्टि के सबसे प्राचीन ग्रन्थ वेदों में है वैसा अन्यत्र किसी ग्रन्थ में नहीं है। हम समझते हैं कि यदि कोई मत अपने को वैदिक धर्म से अच्छा व श्रेष्ठ समझता है तो वह आर्यसमाज के विद्वानों से इस विषय में शास्त्रार्थ व गोष्ठी आदि के द्वारा चर्चा कर सकता है। आर्यसमाज वेद को ईश्वरीय ज्ञान केवल मानता ही नहीं है अपितु युक्ति व प्रमाणों से उसका ईश्वर प्रदत्त होना सिद्ध भी करता है। वेद से पूर्व संसार में न तो कहीं ज्ञान था और न कोई ज्ञान की पुस्तक ही थी। वेद प्रथम ज्ञान वा ज्ञान की पुस्तक हं। ज्ञान के दो ही प्रमुख स्रोत हैं मनुष्य व ईश्वर। मनुष्य सुनकर, पढ़कर व चिन्तन व मनन आदि करके ज्ञानी बनता है। प्रायः उसकी शिक्षा माता के गर्भ व जन्म लेने के बाद माता के उपदेश व वचनों को सुनकर आरम्भ होती है। सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अमैथुनी सृष्टि की थी। उस समय उत्पन्न सभी स्त्री व पुरुष युवा अवस्था में थे। आरम्भ में उनके न तो माता-पिता थे और न ही किसी की सन्तान थी। उनको उस समय ज्ञान यदि मिल सकता था तो केवल ज्ञानस्वरूप सर्वज्ञ सच्चिदानन्द परमात्मा से ही मिल सकता था। प्रश्न केवल इतना ही है कि क्या निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता ईश्वर मनुष्यों को उस समय ज्ञान दे सकता था वा नहीं? ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में इस विषय की चर्चा की है और अपना निर्णायक विचार व सिद्धान्त लिखा है कि ईश्वर मनुष्यों को बिना बोले व बिना पुस्तक के ज्ञान दे सकता है। ईश्वर मनुष्य की जीवात्मा के भीतर भी विद्यमान है इसीलिए उसे सर्वान्तर्यामी कहते हैं। सर्वान्तर्यामी चेतन व ज्ञानस्वरूप सत्ता मनुष्य की जीवात्मा को प्रेरणा कर सकती है और उनकी आत्मा में आवश्यकतानुसार ज्ञान उत्पन्न व संचरित कर सकती है। इसके लिए सत्यार्थप्रकाश का संबंधित प्रकरण पढ़ना आवश्यक है। उसे पढ़कर पाठक पूर्ण सन्तोष अनुभव करता है। आर्यसमाज वेद को ईश्वर प्रदत्त धर्मग्रन्थ मानता है और उसी के प्रचार करने को मनुष्य का परम धर्म बताता है। वेद परमधर्म इसलिये है कि वेद में मनुष्य के लिए आवश्यक सभी विषयों का ज्ञान है। वेदों में सभी विद्याओं का ज्ञान बीज रूप में है जिसे पढ़कर व जानकर मनुष्य उस विषय को व्यक्तिगत व सामूहिक रूप से विस्तृत व सर्वोपयोगी बना सकता है। वेद में ईश्वर, जीव सहित प्रकृति व सृष्टि का भी ज्ञान प्राप्त होता है। सभी विद्यायें वेदों से ही निकली हैं व उनका विस्तार आदिकाल व उसके बाद वैदिक ऋषियों ने किया था तथा आधुनिक काल में उनका विस्तार मनीषियों, चिन्तकों व वैज्ञानिकों आदि के द्वारा हो रहा है। ऋषि दयानन्द ने यजुर्वेद का पूर्ण और ऋग्वेद का आंशिक भाष्य किया है। यदि उनकी 30 अक्तूबर, 1883 ई. को एक विद्वेषी के द्वारा विष दिये जाने के कारण मृत्यु न हुई होती तो वह चारों वेदों का संस्कृत व हिन्दी में पूर्ण भाष्य करते। वर्तमान में वेदों के आधार पर लिखे गये दर्शन, उपनिषद, ज्योतिष, व्याकरण और निरुक्त तथा आयुर्वेद, स्मृति वा धर्मशास्त्र आदि अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं जिनका आधार वेद है। वेदों में मनुष्यों के ईश्वर सहित अपने व अन्यों के प्रति कर्तव्यों का विस्तार से विधान किया गया है। ईश्वर का सच्चा प्रामाणिक स्वरूप केवल वेदों से ही प्राप्त होता है। वेद ईश्वर, जीवात्मा और मूल प्रकृति को नित्य व अनादि बताते हैं। यह बात संसार में वेद से ही प्रकट हुई है अथवा ऋषियों ने अपने ग्रन्थों इसका विस्तार कर उसके प्रस्तुत किया है। ईश्वरोपासना का स्वरूप भी वेदों से ही प्राप्त होता है। वेद मनुष्यों को अग्निहोत्र करने की आज्ञा देते हैं। वेदों में सूत्र रूप में श्रेष्ठ सामाजिक वर्ण व्यवस्था सहित राजधर्म आदि का भी वर्णन है जिसका विस्तार मनुस्मृति ग्रन्थों में भी मिलता है। अतः वेद धर्म का यथार्थ रूप प्रस्तुत करने के साथ श्रेष्ठ समाज कैसा हो, इसका भी चित्र अपनी शिक्षाओं के द्वारा प्रस्तुत करते हैं जिसका उल्लेख ऋषि दयानन्द जी ने अपने अनेक ग्रन्थों में किया है जो सबके लिए पठनीय एवं आचरणीय है। महाभारत युद्ध में हुई तबाही के कुछ वर्षों बाद देश में अव्यवस्थायें उत्पन्न हुई। शिक्षा व्यवस्था पूर्व रूप में जारी न रह सकी। लोग आलसी व प्रमादी हो गये। विद्वानों व ऋषियों की भी कमी थी जिससे वेद ज्ञान विलुप्त होकर उसका स्थान अज्ञान, अंधविश्वासों, पांखण्डों और मिथ्या परम्पराओं आदि ने ले लिया। समय के साथ साथ यह अज्ञान व अन्धविश्वास बढ़ते रहे जिससे अनेक अविद्यायुक्त मत-मतान्तर उत्पन्न हो गये। महाभारत काल के बाद देश में उत्पन्न बौद्ध और जैन मत तो ईश्वर के विषय में यथार्थ ज्ञान रखते नहीं थे अतः उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं किया। अन्य पौराणिक मत ईश्वर को तो मानते थे परन्तु उन्होंने ईश्वर के अविद्यायुक्त सिद्धान्त अवतारवाद को मान्यता दे दी और शिव, विष्णु आदि के रूप में ईश्वर की कल्पना की। उनके अवतारों में राम व कृष्ण को सम्मिलित कर लिया। भारत से बाहर भी ईसाई व इस्लाम मत उत्पन्न हुए। उनका ईश्वर का स्वरूप वेद के अनुरूप और अनुकूल नहीं है। वह ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान रूप में प्रस्तुत नहीं कर सके। विज्ञान ने ब्रह्माण्ड की जो तस्वीर प्रस्तुत की है वह वेद से तो मेल खाती है परन्तु वह मत-मतान्तरों के किसी ग्रन्थ के अनुरूप नहीं है। उनके ग्रन्थों में सर्वत्र अविद्यायुक्त मान्यताओं के दर्शन होते हैं। ऐसे भी धार्मिक ग्रन्थ हैं जो पशु हत्या और मांस भक्षण को अधर्म नहीं मानते अथवा लगता है कि मांस भक्षण की प्रेरणा भी करते हैं। ऐसे सभी ग्रन्थों को मत-मतान्तर व मजहबी ग्रन्थ तो कह सकते हैं परन्तु धर्म ग्रन्थ तो वही हो सकता है कि जो सत्य, अहिंसा व न्याय के सिद्धान्तों पर आधारित हो। वेदों की तुलना में यह सभी ग्रन्थ एकांगी व अपूर्ण है तथा मिथ्या व तर्कहीन मान्यताओं से भरे हैं। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में इन सभी मतों के ग्रन्थों की मिथ्या मान्यताओं का दिग्दर्शन कराया है। इससे यह सभी मत वेद के समान उदात्त व धर्म संबंधी कर्तव्यों का वैसा स्वरूप प्रस्तुत नहीं करते जैसा कि वेदों में वर्णित है। इसलिए वेद संसार के सबसे प्राचीन, सृष्टि के आदिकालीन व सभी विद्याओं से युक्त श्रेष्ठ ग्रन्थ सिद्ध होते हैं। इसी कारण वेद सर्वोतोमहान ग्रन्थ हैं। सत्यार्थप्रकाश वेद की सभी शिक्षाओं को स्वीकार कर उनको जीवन में धारण व आचरण करने की प्रेरणा करता है। सत्यार्थप्रकाश तर्क व युक्ति को महत्व देता है और वेदानुकूल होने पर उन्हें प्रमाण मानता है। वेदों को आर्यसमाज व सत्यार्थप्रकाश सूर्य के समान ज्ञान के प्रकाश से युक्त स्वतः प्रमाण मानते हैं। वेदों में ईश्वर के अनेक गुण, कर्म, स्वभावों के अनुरूप उसके अनेक नामों पर प्रकाश डाला गया है और बताया है कि अनन्त गुणों से युक्त ईश्वर वस्तुतः एक ही सत्ता है। इस ग्रन्थ में बाल शिक्षा व फलित ज्योतिष पर भी उपयोगी विचार प्रस्तुत किये गये हैं जो अन्य ग्रन्थों से प्राप्त नहीं होते। इसके तीसरे समुल्लास में अध्ययनाध्यापन सहित सन्ध्याग्निहोत्र उपदेश, ब्रह्मचर्योपदेश आदि अनेक विषयों का वर्णन है। चतुर्थ समुल्लास में मुख्यतः विवाह, गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था, पंचमहायज्ञ, पाखण्डतिरस्कार, गृहस्थधर्म, पण्डित व मूर्ख के लक्षण आदि अनेक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। पांचवें समुल्लास में वानप्रस्थ व संन्यास आश्रम पर प्रकाश डाला गया है तथा षष्ठ समुल्लास में राजधर्म विषय पर प्रकाश डाला गया है। सातवें समुल्लास में वेद व ईश्वर विषय वर्णित है। अष्टम् समुल्लास मे मुख्यतः सृष्टयुत्पत्तयादि विषय है। नवें समुल्लास में विद्या अविद्या बन्धन तथा मोक्ष विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है जो अन्य धार्मिक ग्रन्थों में इस रूप में उपलब्ध नहीं होता जैसा सत्यार्थप्रकाश में है। दशम समुल्लास में आचार, अनाचार, भक्ष्य तथा अभक्ष्य विषय है। अन्त के चार समुल्लासों में भारतीय मत, नास्तिक मत तथा ईसाई व इस्लाम मत की मान्यताओं की समीक्षा है। यह समीक्षा सत्य व असत्य के निर्णय करने में सहायता प्रदान करने की दृष्टि से की गई है। अतः सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की सहायता से मनुष्यों को सत्य धर्म का निर्णय करने में सहायता मिलती है और मनुष्य जीवन को सफल करने वाले साधनों की पर्याप्त जानकारी भी इससे प्राप्त होती है। अपनी इन सभी विशेषताओं के कारण सत्यार्थप्रकाश धार्मिक साहित्य सर्वोच्च स्थान पर विद्यमान है। जीवन में एक बार सभी को इसका अध्ययन करना चाहिये। जिसने इसका अध्ययन किया वह भाग्यशाली है और जिसने नहीं किया उसका मनुष्य जीवन सत्य ज्ञान से रहित व अपूर्ण ही कहा जा सकता है। आर्यसमाज सत्यार्थप्रकाश को अपना प्रमुख सिद्धान्त ग्रन्थ मानकर धर्म संबंधी व्यवस्थाओं का निर्धारण व प्रचार करता है और उसी के अनुसार समाज, देश व विश्व बनाने के लिए प्रयत्नरत है। ईश्वर का भी यही आदेश है। हम यह अनुभव करते हैं कि यदि सत्यार्थप्रकाश की शिक्षाओं के अनुसार कोई समाज व देश बनता है तो वह संसार का आदर्श देश होगा जिसके लोग स्वस्थ होंगे, ज्ञान विज्ञान में अग्रणीय होंगे, न्यायपूर्वक जीवन व्यतीत करेंगे, शोषण व अत्याचार उनके देश व समाज में नहीं होगा, कोई करेगा तो कठोर दण्ड का भागी होगा तथा साम्प्रदायिकता जैसी चीज उस समाज में नहीं होगी। वह देश व समाज धर्म प्रधान होगा न कि धर्म निरपेक्ष। वेद और सत्यार्थप्रकाश के विचारों के अनुरूप देश व समाज की आज पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। आश्चर्य है कि लोग सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन व मूल्यांकन नहीं करते? ऐसा न करने के कारण ही देश में साम्प्रदायिकता, स्वार्थ व अवसरवादिता का बोलबाला है। राजनीति दूषित है और यहां अन्दरखाने घोटाले होते रहे हैं। मनुष्य का चरित्र का पतन इतना हो चुका है कि जिसका सही मूल्यांकन भी नहीं किया जा सकता। झूठ बोलना व तथ्य को छुपाना आम बात हो गई है। ऐसे समय में सत्यार्थप्रकाश ही आशा की किरण है। हमने सत्यार्थप्रकाश पर चर्चा की है। आर्यसमाज के शीर्ष विद्वान ही अपनी ज्ञानप्रसूता लेखनी से इस विषय में अधिक प्रभावशाली लेख लिख सकते हैं। ओ३म् शम्।

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