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बबूल के सायें में आके बैठ गए

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13 May, 18 17:35
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 बबूल के सायें में आके बैठ गए रामकिशोर पंवार रोंढावाला/इस समय बैतूल जिला मुख्यालय का बहुचर्चित पुर्नवास केन्द्र बना पारधी ढाना अपने यहां पर हो रहे संगठित एवं संरक्षित अपराधो की शरण स्थली के रूप में अब झोपडियों की जगह पक्के सीमेंट कांक्रिट के मकानों का रूप लेने लगे है। सभी प्रकार की सुख सुविधाओं यहां तक की पुलिस की आवाजाही की पूरी सीसीटीवी कैमरो में रिकाडिंग अब किसी बड़े अपराध की आशंका को जन्म देने के लिए झटपटा रही है। चौथिया कांड की नफरत की आग से चले पारधियों के पुर्नवास के लिए यूं तो सोनाघाटी एवं चौथिया में सरकारी जमीन पर प्लाट तक काटे जा चुकें है लेकिन अपराधिक प्रवृति के आदी बने पारधी मूल धारा में वापस लौटने के बजाय संगठीत एवं संरक्षित अपराधो का केन्द्र बने हुए है। बात - बात पर गोलियों का चलना पारधी ढाना के लिए आम बात हो गई है। बैतूल जिले की राजनीति एवं प्रशासनिक मुहकमें में पारधियों का जब - जब जिक्र होता चला आया है बार - बार घाट अमरावति का वह खौफनाक दर्दनाक हादसे की यादे डरा जाती है। अमानवीय दुराचार के बाद वीभत्स हत्या के दर्द ने एक दो नही आसपास के आधा दर्जन गांव के सीधे - साधे ग्रामिणो को गांधी जी के अहिंसा के रास्तो से भटका कर हिंसा की राह की ओर मोड़ दिया। यह सब कुछ नहीं होता यदि चौथिया में आकर बसे पड़ौसी राज्य महाराष्ट्र की अपराधिक प्रवृति की धुमुन्तु जनजाति के लोग घाट अमरावति की घटना को अंजाम नहीं देते। बीते दस साल पहले का दर्द बयां करने के लिए अलस्या पारधी ने अपने तथाकथित संगठन के बैनर तले जिला प्रशासन को एक बार नहीं दर्जनो बार न्यायीक कार्रवाई का डर बता कर धमकाने की कोशिस कर चुका है। अभी हाल ही में जिला प्रशासन पारधी ढाने के तथाकथित संरक्षक अलस्या पारधी के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई को चाह कर भी असली जाता नहीं पहना सका है जिसके पीछे का एक मात्र कारण है कि लोगो प्रशासन को ब्लेकमेल करके उस पर दबाव डालने की कोशिस कर रहे है कि यदि प्रशासन ने अलस्या पारधी के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई की तो परिणाम बुरे होगें। सवाल उठता है कि यदि दो - चार सौ की भीड़ लाने से लोगो के खिलाफ जिला बदर करने की कार्रवाई रूक जाती है हर जिला बदर का आरोपी आगे चल इसी राह पर चल पड़ेगा! अलस्या के कंधे पर कौन बंदुक तान कर अपना उल्लू साधना चाहता है आज इस बात की प्रशासन को पड़ताल करने की जरूरत है। पारधियों के साथ यदि बुरा हुआ है तो बुरा उन लोगो के साथ भी होता चला आया है जो कि मुलताई तहसील में बरसो से निवास करते चले आ रहे है। किसी की जान लेना या किसी का सब कुछ लूट लेना एक पक्षीय निर्णय नहीं हो सकता है तब जब दोनो पक्ष न्यायालय की चौखट पर अपनी फरियाद लेकर पहुंचे हो। पारधी कांड में दोषियों पर न्यायालय का फैसला आ चुका है लेकिन दुसरा पक्ष की ओर का फैसला आना बाकी है। ऐसी स्थिति में पुर्नवास को लेकर पारधियों का गुट विभाजन अच्छे और बुरे लोगो की पहचान कराता है। एक गुट ने प्रशासन के कहने मात्र से अपना डेरा चौथिया में बसा लिया पहले विरोध हुआ लेकिन बाद में गांव वाले भी मान गए। आज पारधी समाज के एक गुट की नेत्री श्रीमति रत्ना रमेश पारधी जो कि ग्राम पंचायत चौथिया की वार्ड पंच भी है उसका उस गांव के लोगो से यदि बैर आज भी होता तो क्या वहां पर रह रहे पारधियों के साथ कोई न कोई अप्रिय घटना घट सकती थी लेकिन आज भी खाना बदोश जिदंगी जी रहे पारधियों के दुसरे पक्ष को नजर अदंाज नहीं किया जा सकता। सवाल यह बार - बार उठता है कि हाईकोर्ट तक बार - बार अपने विस्थापन के लिए अलस्या पारधी ही क्यों पहुंचता है! जबकि रत्ना पारधी आज तक हाईकोर्ट अपने विस्थापन एवं पुर्नवास को लेकर क्यों नहीं पहुंच पा रही है। जितनी बार भी जिला स्तर पर धरना - प्रदर्शन हुआ है बैतूल के पारधी कम पड़ौसी राज्यों के पारधियों को जीपो और टैक्सियों में भर - भर कर लाकर अपनी ताकत का अहसास कराने का काम होता चला आ रहा है। सवाल एक बार फिर वहीं पर अटका पड़ा है कि जिला बदर की कार्रवाई को क्या प्रभावित करने की एक सोची समझी साजिश थी बैतूल जिला मुख्यालय पर पारधियों की प्रायोजित रैली और हंगामे की तस्वीर या फिर पर्दे के पीछे की वज़ह कुछ और ही है। जिला प्रशासन की गुप्तचर शाखा और पुलिस की इंटलीजेंट ब्यूरो की रिर्पोट का मिलान किया जाए तो एक तथ्य बार - बार सामने आया है कि जब - जब पुलिस ने अलस्या के विरूद्ध अपराधिक प्रकरण या जुआ एक्ट का मुकदमा दर्ज किया है तब - तब यह बात आरोप सामान्य रूप से लगते रहे है कि जिला प्रशासन - पुलिस प्रशासन पारधियों को प्रताडि़त करता है। इस बात में कोई दो मत नहीं है कि पारधी धुमुन्तु जनजाति है जिसकी संख्या अलस्या पारधी के अनुसार 15 सौ करोड़ है हालाकि अलस्या पारधी ज्यादा पढ़ा - लिखा नहीं उसे जो पढ़ाया जाता है वह वही पढ़ता है। मूलत: जंगली तीतर - बटेर को पकड़ कर उन्हे ढाबो में बेचने वाली इस जनजाति का सरोकार कभी भी रोजगार की मुख्यधारा से नहीं रहा है। अपराध इनकी नस - नस में भरे होने के कारण अकसर पारधियों पर (असली सोना दिखा कर नकली सोने की ग्रिनी ) बेच कर लोगो के संग ठगी करने का भी आरोप लगते रहता है। लोगो को ठगने केे मामले में पारधियों का जवाब नहीं यह बात महाराष्ट्र पुलिस प्रशासन की वार्षिक अपराधी जनजाति के संदर्भ में जारी की गई एक रिर्पोट में वर्णित है। सवाल यह उठता है कि पारधियों के पुर्नवास पर प्रशासन ने ध्यान क्यों नहीं दिया जिसके पीछे पूर्व कलैक्टर ज्ञानेश्वर बी पाटील की जवाबदेही तय होनी चाहिए थी क्योकि उन्होने ने ही सोनाघाटी के समीप विस्थापन की रूप रेखा उनके द्वारा ही स्वीकृत करवाई कार्य योजना को असली जामा नहीं पहनाया। बी ज्ञानेश्वर पाटील पर एक आरोप यह भी सुर्खियों में रहा कि उसके द्वारा मुख्यमंत्री नि:शक्त सामुहिक विवाह कार्यक्रम के लिए अलस्या पारधी से एक मुश्त मोटी रकम दान के रूप में ली गई थी। जिन पारधियों के पास दो वक्त की रोटी नहीं रहती है उनका नेता यदि हजारो में जिला कलैक्टर को चंदा देता है तो उसके पास पैसा आता कहां से है ? इस बात का जवाब स्वंय अलस्या इसके पूर्व अपनी एक रैली में दे चुका है। उसका आरोप था कि पुलिस उसके पारधी ढाने में जुआ के नाम पर दबीश देकर उससे मोटी रकम की मांग करती है और नहीं देने पर उसके खिलाफ झुठी रिर्पोट पर मुकदमे दर्ज करती है। सच कहीं न कहीं करीब से गुजरते ही कंपन महसूस करा देता है लेकिन जहां पर झूठ और पाखण्ड हावी हो वहां पर चोर - चोर मौसरे भाई बन जाते है। बेतूल नगर कोतवाल राजेश साहू को अलस्या पारधी को सार्वजनिक रूप से जीजा एवं संगीता पारधी बड़ी दीदी कहना सामाजिक अपराधो के संगइित अपराधो के बीच ताला - बाना बुनने जैसा काम है। जिले का सबसे बड़ा कामफपूत पारधी ढाना की स्थिति यह है कि यहां पर पूरे साल बैतूल नगर पालिका अपने पानी के टैंकर भेज कर इन लोगो की प्यास बुझाती है लेकिन कड़वा सच यह है कि जुआ जैसे सामाजिक अपराध से होने वाली कमाई ने पारधियों को सिल बंद नामचीन कपंनियों की मीनरल वाटर (शुद्ध जल) की बोटलो शौचालय की ओर जाते देख आपके आंखे फटी की फटी रह जाएगी। आज यही कारण है कि पारधी ढ़ाने का सरगना नगर पालिका प्रशासन के मँुह पर करारा तमाचा मारते हुए बैतूल नगरीय क्षेत्र में स्वंय के नाम का पानी का टैंकर बनवा कर जलसेवा कर रहा है। अपराधी का अपराध मुक्त हो जाना सबसे बड़ी सेवा है लेकिन पारधी समाजसेवियों के मुँख पर ही कालिख पोत कर अपनी समाज सेवा को चंद बिके हुए पत्रकारो से अपनी प्रचार पब्लिीसिटी का धंधा बना रखा है। बैतूल जिला मुख्यालय पर धड़ल्ले से पारधी ढाना पर लाखो का जुआ चलाने से होने वाले अपराधो से चिंतित लोगो ने सीएम हेल्प लाइन से लेकर शिकवा - शिकायतो का मुख्यमंत्री कार्यालय तक अम्बार लगा दिया लेकिन लेकिन सब इसलिए मौन है कि चलों पारधी बैतूल शहर में कोई गंभीर अपराध तो नहीं कर रहे है लेकिन सच यह भी नहीं है। पुलिस का रोजनामचा इस बात का दावा करता है कि एक वर्ष में बारह से अधिक ऐसे मामलो में पारधी जाति के लोग आरोपी बने है। सवा दो सौ लोगो की पारधी ढाने की बसाहट पर पूरे शहर ने कभी ऊंगली नहीं उठाई और न ही शहर में जुआ और शराब को लेकर कोई धरना - प्रदर्शन हुआ। शांत शहर में वैमनस्ता का ज़हर घोलने का काम कुछ लोगो द्वारा किया जा रहा है। अब यह स्थिति है कि पारधियों का पुर्नवास पूृरी तरह से अधर में लटकने की वजह से अब ाअदंाज नहीं किया जा सकता लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कहीं देख - रेख के अभाव में फिर से अपराध की दुनियां में न लौट पाए। चलते - चलते मुझे हिन्दी के एक महान शायर स्वर्गीय दुष्यंत कुमार की कुछ पंक्तियां बरबस याद आ गई।
कहाँ तो तय था चिरा$गाँ हर एक घर के लिए , कहाँ चिरा$ग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दर$खतों के साये में धूप लगती है , चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
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