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पहचान खोकर फिर से हासिल करने के संघर्ष की कहानी है ‘छपाक’

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12 Jan 20
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 पहचान खोकर फिर से हासिल करने के संघर्ष की कहानी है ‘छपाक’

फिल्म ‘छपाक’ रिलीज होने से पहले ही काफी चर्चित हो गयी, अपनी वजह से नहीं बल्कि अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी जाकर घायल छात्रों से मिलने के कारण। चूंकि दीपिका की ये फिल्म (जिसकी वो प्रोड्यूसर भी हैं) एक सोशल कॉज पर केन्द्रित है, तो उनका यूनिवर्सिटी जाकर छात्रों से मिलना स्वाभाविक था, खासकर इसलिए भी कि उन्होंने वहां किसी के पक्ष या विपक्ष में कोई बात नहीं की। बहरहाल, इसे लेकर रिलीज से पहले ही फिल्म की चर्चा तो शुरू हो ही गयी।

अब आते हैं फिल्म पर। अगर इस तथ्य को दरकिनार कर दें कि फिल्म की कहानी एसिड हमले की शिकार लक्ष्मी अग्रवाल की आपबीती पर आधारित है, तो भी फिल्म का कथानक बहुत सशक्त और संवेदनशील है। निर्देशक मेघना गुलजार ने ऐसे नाज़ुक और जटिल कथानकों को परदे पर उतारने के लिए अपनी एक खास पहचान बनाई है और इस फिल्म के साथ ही वो अपने हुनर को कई कदम आगे भी ले गई हैं।

एसिड हमले की शिकार स्त्री सबसे पहले खुद अपनी पहचान से एक नए सिरे से परिचित होने के लिए मशक्कत करती है। जरा सोचें कि अचानक आपका चेहरा बिलकुल अलग दिखने लगे तो आप खुद के लिए अजनबी नहीं हो जाएंगे? फिल्म का एक डायलाग है, जो बगैर किसी मेलोड्रामा के इस पीड़ा को उभारता है- “ना नाक है, ना कान, झुमके कहां लटकाऊंगी?”

इसके बाद एसिड अटैक पीड़िता को अपनी सामाजिक पहचान के लिए संघर्ष करना होता है। और फिर तीसरा स्तर आता है न्याय के लिए लड़ना जो हमारे जैसे देश में न सिर्फ मुश्किल है, बल्कि घोर पीड़ाजनक भी। ये एक बहुत बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी होती है, जिसे एसिड अटैक पीड़िता ही झेलती है।

इन तीनों स्तरों पर फिल्म कहानी को कुशलता से कहती है। नायिका मालती का संघर्ष और भी कठिन हो जाता है, जब वो तेजाब की खुलेआम बिक्री को रोकने की लड़ाई लड़ती है। किस तरह एक आम आदमी अपने निजी संघर्ष से परे जाकर समाज के लिए ‘हीरो’ हो जाता है और अपनी निजी त्रासदी को जीत कर एक वृहद स्तर पर वृहद् उद्देश्य के लिए काम करता है- छपाक सफलतापूर्वक दर्शाती है और यही इस फिल्म को खास और खूबसूरत बनाता है।

मेघना इंसानी रिश्तों की गहनता और जटिलता दोनों को बहुत कम कहकर ज्यादा समझा जाती हैं। बेशक दीपिका एक अच्छी अदाकारा हैं, लेकिन उनके अच्छे अभिनय का श्रेय जाता है निर्देशक मेघना गुलजार को। ये एक ऐसा विषय था, जिसमें दुश्मन को पहचान बदला लेना और हिंसा को आसानी से हाईलाइट किया जा सकता था, लेकिन ये पूरी फिल्म इंसानी ऊष्मा से भरी है। शायद महिला निर्देशक होने का ही ये नतीजा है कि फिल्म बहुत सूक्ष्म आयामों को भी बगैर होहल्ला किये उभार जाती है।

फिल्म में शंकर-एहसान-लॉय का संगीत रीमिक्स के बयाबान में सुकून की ठंडी हवा की तरह है। फिल्म में गुलजार के लिखे भाव प्रवण गीत तो हैं ही। वहीं दीपिका के अभिनय की तारीफ क्या की जाए। फिल्म में उनका किरदार स्ट्रॉंग है। निर्देशक कुशल हो तो दीपिका जैसी संवेदनशील एक्ट्रेस अच्छा अभिनय तो करेगी ही। यहां प्रशंसा विक्रांत मैसी की होनी चाहिए जिन्होंने एक एनजीओ संचालक के तौर पर शानदार भूमिका निभाई है, जो एसिड अटैक पाड़ितों के पक्ष में मुहम चलाते हुए उससे प्यार करने लगता है। मुश्किल हालात में प्यार और मदद के जज्बात ही मनुष्य की उम्मीद बंधाए रखते हैं और संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं।


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