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मेवाड़ के विश्व प्रसिद्ध गवरी पर बनी पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म का हुआ वर्ल्ड प्रीमियर।

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27 May 20
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मेवाड़ के विश्व प्रसिद्ध गवरी पर बनी पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म का हुआ वर्ल्ड प्रीमियर।

उदयपुर, आलोक संस्थान के श्री राम मंदिर में श्रीफल वदारकर पहली डीवीडी गवरी भगवान को अर्पित कर डॉ प्रदीप कुमावत की डॉक्यूमेंट्री फिल्म "गवरी "का वर्ल्ड प्रीमियर यूट्यूब पर किया गया।

डॉ कुमावत ने अपने शोध के आधार पर इस फ़िल्म को बनाने में काफी मेहनत की व भारत का सबसे लंबा चलने वाला ये नृत्य कहा जाता है ।

उन्होंने कहा कि शिव पुराण में किरात मेवाड़ के भील की मान्यता है कि भील भगवान भोलेनाथ को मूली चढ्या करता था और उससे प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने दर्शन दिए किंतु भोलेनाथ उदासीन थे, इसका कारण जानने पर पता चला कि पार्वती के चले जाने के कारण भगवान शिव दुखी हैं तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए यह गवरी लोक नृत्य की परंपरा मेवाड़ में प्रारंभ हुई, इसमें श्रेष्ठ अशिष्ट हास्य के साथ-साथ राक्षसों के कर्तव्य तथा नव रसों का समावेश गवरी में होता है।


यह गौरी से अपभ्रंश बन गवरी हुआ इसका एक नाम ओर " राई" भी है। गवरी में एक विशेष पात्र जो हमेशा उल्टा नाचता है रायबुढ़िया कहलाता है रायबुढ़िया कभी भस्मासुर बन जाता है कभी शिव का अवतार धारण कर लेता है कभी वह स्वयं भैरव हो जाता है, मूल गवरी भैरव नृत्य ही है।

 डॉक्टर कुमावत ने बताया कि गवरी के उद्गम स्थल और उसके इतिहास पर शोध करने में उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा रही को लेकिन भारतीय लोक कला मंडल के डॉक्टर महेंद्र भाणावत का योगदान हमेशा याद रहेगा वही उनवास में देवमाल्या तथा बड़लिया हिंदवा तक पहुंचने में उनवास के सरपंच राजेंद्र श्रीमाली का भी योगदान महत्वपूर्ण है। गवरी के एक महत्वपूर्ण प्रसंग जिसमें  मलावन के साथ सतिया खेलना है, तथा खेतों पर उगी फसल पर टूट पड़ने की परंपरा भी मेवाड़ के अंचल में महाराणा प्रताप के समय से स्थापित परंपरा है। 

 24 मिनट की यह डॉक्यूमेंट्री अपने आप में एक दस्तावेज है जो मेवाड़ी नहीं संपूर्ण भारतवर्ष में गवरी के बारे में स्पष्ट और सही जानकारी जन-जन तक पहुंचाएगी।

इसमें काफी मेहनत के साथ फोटोग्राफी मनमोहन भटनागर तथा एडिटिंग निश्चय कुमावत व प्रतीक कुमावत द्वारा की गई।

इस अवसर पर मुख्य रूप से डॉ प्रदीप कुमावत कांता कुमावत, प्रशाशक मनोज कुमावत, निश्चय कुमावत, निहारिका कुमावत, प्रतीक कुमावत, ध्रुव कुमावत  आदि उपस्थित रहे।


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