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“श्रद्धा व अश्रद्धा सहित लज्जा व डर से भी दान देना चाहियेः आचार्या डा. नन्दिता शास्त्री, वाराणसी”

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11 May, 18 12:38
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“श्रद्धा व अश्रद्धा सहित लज्जा व डर से भी दान देना  चाहियेः आचार्या डा. नन्दिता शास्त्री, वाराणसी” वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून का ग्रीष्मोत्सव आज आरम्भ हो गया। प्रातः ऋग्वेद पारायण यज्ञ हुआ। यज्ञ की ब्रह्मा पाणिनी कन्या महाविद्यालय, वाराणसी की आचार्या डा. नन्दिता शास्त्री जी थी। उनकी 6 ब्रह्मचारिणियों ने यज्ञ में मन्त्र पाठ किया। यज्ञ के बाद आश्रम के नव निर्मित भव्य सभागार में दान की दार्शनिकता पर दो मुख्य प्रवचन एवं सुविख्यात आर्य भजनोपदेशक पं. सत्यपाल पथिक जी, अमृतसर के भजन हुए। प्रवचन के आरम्भ डा. नन्दिता शास्त्री जी ने अपने गुरूकुल पाणिनी कन्या महाविद्यालय, वाराणसी का परिचय देते हुए बताया कि यह ऋषि दयानन्द प्रदर्शित आर्ष पद्धति के अनुसार चलता है। पद वाक्य प्रमाणज्ञ पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी की प्रमुख शिष्या आचार्या डा. प्रज्ञादेवी एवं आचार्या मेधादेवी जी ने इस गुरूकुल की स्थापना सन् 1971 में की थी। उन्होंने बताया कि वह इस महाविद्यालय की प्रथम स्नातिका हैं। मैंने अपना जीवन गुरुकुल व वैदिक धर्म की सेवा के लिए अर्पित किया है। उन्होंने बताया कि जब वह 8 वर्ष की थी तो आचार्या डा. प्रज्ञादेवी जी के व्यक्तित्व व कार्यों से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि वह अपनी मृत्यु से पूर्व 100 आर्यसमाजें खोलेंगी, 100. लोगों को यज्ञोपवीत प्रदान करेंगी और आचार्या जी की तरह यज्ञ करायेंगी। उन्होंने यह भी बताया कि जिस स्थान पर पाणिनी कन्या महाविद्यालय बना है, उसे भूतों का बसेरा कहा जाता था। लोग वहां आने जाने में डरा करते थे। उन्होंने कहा कि गुरुकुल की छात्राओं को भी जब कहीं आना जाना होता था तो वह लाठी लेकर आती जाती थीं। उन्होंने बताया कि आर्यसमाज के दानियों से गुरुकुल चलता है। उन्होंने कहा कि जो समर्थ आर्यसमाज के भक्त अपने बच्चों को गुरुकुल नहीं भेज सकते, उन्हें गुरुकुल के विद्यार्थियों के शुल्क व गुरुकुल की आवश्यकताओं को दान देकर पूरा करना चाहिये।

आचार्या नन्दिता शास्त्री जी ने कहा कि दान धर्म का स्कन्ध है। धर्म के तीन स्कन्ध उन्होंने बताये यज्ञ, अध्ययन और दान। उन्होंने कहा कि यह तीन स्कन्ध धर्म की नींव व स्तम्भ हैं। आर्यो के सब कार्य यज्ञ से ही आरम्भ होते हैं। उन्होंने कहा कि यज्ञ का लाभ तब होगा जब हम नित्य स्वाध्याय करेंगे। मनन, चिन्तन व निदिध्यासन से उन्होंने पूरा लाभ उठाने को कहा। आचार्या जी ने कहा कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम गृहस्थ आश्रम के सहारे चलते हैं। गृहस्थी समाज के कार्यों के लिए जो दान देते हैं उनसे समाज के कार्य सम्पादित होते हैं। आचार्या जी ने समावर्तन संस्कार की चर्चा भी की। उन्होंने कहा कि समावर्तन संस्कार के उपदेशों को हमें गृहस्थ जीवन में स्मरण रखना है। उन्होंने कहा कि गुरुकल के आचार्य का अन्तिम उपदेश होता है सत्यं वद धर्मम् चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। उन्होंने कहा कि शास्त्र वा वेद का प्रतिदिन स्वाध्याय अवश्य करना है। हमने गुरुकुल में जो शिक्षा प्राप्त की होती है उसे गृहस्थ आश्रम में क्रियात्मक रूप देना होता है। हमारे हृदय में श्रद्धा होनी चाहिये। श्रद्धा से दान देना चाहिये। अश्रद्धा से भी दान देना चाहिये। इसका आपको अवश्य फल मिलेगा। दूसरों को दान देते हुए देख कर लज्जा से भी दान देना चाहिये। अनिष्ट के डर से भी दान देना चाहिये। हमें भगवान से डरना चाहिये। तीन आश्रमों का पालन करना गृहस्थ आश्रम में रहने वाले मनुष्यों का कर्तव्य है। दान देना हमारा दायित्व है।

ऋग्वेद के दान सूक्त की प्रशंसा कर आचार्या जी ने कहा कि इस सूक्त में अन्न व धन दान करने वालों की प्रशंसा है। उन्होंने कहा कि अन्यों की तरह से धनवान भी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। दान देने वाले का धन कभी नाश को प्राप्त नहीं होता है। दान देने वाले का धन कभी क्षय को प्राप्त नहीं होता। मेरे कर्मों के खाते में जमा हो जाता है। बैंक में रखे धन की चोरी हो सकती है परन्तु दान देने से वह धन चोरी न होकर परमात्मा के बैंक में जमा रहता है व हमें सुख व उन्नति के रूप में प्राप्त होता है। आचार्या जी ने कहा कि यदि आप परलोक के बैंक बैलेंस को बढ़ाना चाहते हो तो नित्य दान करो। वेद में प्रश्न आया है कि हम किसको दान दें? अन्न के भूखे को अन्न का दान करें। आचार्या जी ने कहा कि कुछ लोगों को दो समय की रोटी नहीं मिलती। उनको आप दान दो। उनको दिया हुआ दान फलीभूत होगा। जहां पहले से धन व साधन भरे हुए हैं वहां दान देने की जरूरत नहीं है। यदि आप जीवन में सुख चाहते हैं तो दान देकर सुख की प्राप्ति सुनिश्चित कर सकते हैं। जो धन व साधन होने पर भी दान नहीं देता वह ईश्वर को व सुख को प्राप्त नहीं कर सकता। जो व्यक्ति हाथ फैला कर दान मांगता है उसको दान देना ही चाहिये। सोचिए उस मांगने वाले ने हमें कुछ समझा है। हमारे भीतर देने की भावना होनी चाहिये।

आचार्या डा. नन्दिता शास्त्री ने कहा कि दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं होता। वह हमारे खाते में जमा होता है। यह दार्शनिक तथ्य है। उन्होंने कहा कि जो दान देने वाले हैं वह अमृत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। देने वाले सदा ऊपर की ओर बैठते हैं। उन्होंने कहा कि सूर्य हमें स्वास्थ्य व ऊर्जा आदि देता है। देने के इस गुण के कारण सूर्य ऊपर रहता है। आचार्या जी ने कहा कि देने वाले ऊपर तथा लेने वाले नीचे बैठते हैं। हम दान में प्रायः धन का दान करते हैं। आचार्या जी ने कहा कि दान के कई प्रकार हैं। उन्होंने कहा कि विद्वान, आचार्य, वानप्रस्थी, सन्यासी तथा ब्रह्मचारी आदि भी विद्या का दान करते हैं। धन का अर्थ केवल पैसा ही नहीं होता है। विद्या दान को ब्रह्म दान कहा गया है। विद्या दान सभी प्रकार के दानों में सबसे बड़ा दान है। आचार्या जी ने कहा कि भगवान आकाश में बादल बनाकर वर्षा करते हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा हमें इतना दे रहा है कि उसे हम अपनी झोली में समा नहीं सकते। हममें ईश्वर से धन प्राप्त करने की पात्रता होनी चाहिये। पात्रता होने से हमें धन प्राप्त होता है।

आचार्या जी ने कहा कि हमें धन व अन्न का दान इनकी कामना करने वाले सुपात्रों को देना है। विदुषी आचार्या ने कहा कि शुचि, सौम्य, सरल बुद्धि, मेधावान, ब्रह्मचारियों, व कुशाग्र बच्चों को विद्या दान दें। आचार्या जी ने अपने वैदुष्यपूर्ण व्याख्यान में स्वर्ण व वस्त्र आदि का दान देने की चर्चा भी की। आचार्या जी ने यह भी बताया कि सत्व, रज व तम गुणों के अनुसार ज्ञान की भी तीन श्रेणियां होती है। सात्विक दान की चर्चा कर उन्होंने कहा कि यदि हमारे पास एक रोटी है तो हम उसके टुकड़े करके कुछ दूसरों को खिला कर शेष स्वयं खा सकते हैं। सात्विक लोग धन का सदुपयोग दान करने के द्वारा करते हैं। राजसिक दान की चर्चा कर उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति के लोग दान भी करते हैं व बचे हुए का भोग भी करते हैं। आचार्या जी ने कहा कि तामसिक प्रवृत्ति के लोग न दान करते हैं और न स्वयं ही अपने धन का भोग करते हैं। वह धन को किंचित घटाना नही ंचाहते। वह चाहते हैं कि धन बढ़ता रहना चाहिये। ऐसे लोगों के धन का नाश होता है। उन्होंने कहा कि धन के दो उपयोग भोग व दान है। आचार्य जी ने एक साधू व उसके शिष्य की कथा भी सुनाई। शिष्य जब अपना धन दान कर देता है तो साधू व सभी शिष्य नहर पार कर सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाते हैं जिससे उन सबकी रक्षा हो पाती है। आचार्या जी ने इस कथा के आधार पर कहा कि हमें जीवन में त्याग के महत्व को जानना होगा। मृत्यु आने पर हमारा समस्त धन यहीं पर छूट जायेगा। हमें मृत्यु से पूर्व अपना सब धन सुपात्रों में दान कर देना चाहिये। आचार्या जी ने कहा कि अच्छे कार्यों में दान देने से हमें दिये गये दान का हजारो गुणा सुफल मिलता है। आचार्या जी ने यह कह कर कि सौ हाथों से कमाओं और हजारों हाथों से दान करो, अपने व्याख्यान को विराम दिया।

आज प्रातः यज्ञ एवं व्याख्यान के मध्य प्रातः 9.00 बजे ध्वजारोहण भी हुआ। पाणिनी कन्या गुरूकुल महाविद्यालय की छात्राओं ने ध्वज गीत गाया। स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती ने इस अवसर पर प्रेरणादायक उदबोधन दिया। ध्वजारोहण के अवसर मंच पर कार्यक्रम के सुयोग्य संचालक आचार्य शैलेश मुनि सहित स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, आचार्य आशीष जी, आश्रम के मंत्री श्री प्रेम प्रकाश शर्मा, पं. सत्यपाल पथिक जी, श्री रूहेल सिंह जी, श्री आजाद सिंह जी, देहदानी श्री सुशील भाटिया जी चण्डीगढ़, डा. वेदप्रकाश गुप्ता, श्री मनजीत सिंह जी, श्री सुखदेव सिंह वर्मा, श्री गोविन्द सिंह भण्डारी जी, कन्या गुरूकुल की ब्रह्मचारिणियां व उनकी विदुषी आचार्या उपस्थित थीं। इस अवसर पर डा. वेदप्रकाश गुप्ता जी ने अपनी एक स्वरचित कविता भी सुनाई। श्रोताओं में देश के अनेक भागों से आये श्रद्धालु ऋषि भक्त एवं तपोवन विद्या निकेतन के सभी बच्चे एवं उनकी आचार्यायें भी उपस्थित थी। इस अवसर पर सम्पन्न अन्य कार्यक्रमों को हम पृथक से प्रस्तुत करने का प्रयत्न करेंगे। ओ३म् शम्।

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