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राग-द्वेष पर विजय तो कभी असफल नहीं :मुनि सुखलाल

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13 Nov 17
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राग-द्वेष पर विजय तो कभी असफल नहीं :मुनि सुखलाल उदयपुर,। शासन श्री मुनि सुखलाल ने कहा कि दुनिया के नामी विद्वान मानते हैं कि अहिंसा और अनुशासन को तेरापंथ ने सही मायनों में समझा है। राग और द्वेष पर जीत प्राप्त कर ली तो जीवन में कभी फेल नही होंगे।वे चातुर्मास सम्पन्नता के बाद विहार के दौरान रविवार को महाप्रज्ञ विहार में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि चातुर्मास में धर्म प्राप्ति का अच्छा मौका होता है और हमें भी साधना का मौका मिलता है। ४ संत तेरापंथ भवन और ४ संत आनंद नगर में थे। अच्छे संत मिले तो अच्छा माहौल बना सके। तेरापंथ सशक्त संघ है। उन्होंने पद्य के माध्यम से यह तेरापंथ हमारा है प्रस्तुति दी।शासन श्री मुनि रवींद्र कुमार ने कहा कि अध्यात्म की यात्रा हर व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य है। ये मंजिल इतनी आसान भी नही है। बाहर की सुरक्षा, शरीर, परिवार, दुकान, देश की सुरक्षा सभी अति आवश्यक है। एक ओर है जिसकी सुरक्षा करनी चाहिए लेकिन ध्यान नही जाता। अपने भीतर आत्मा, चेतना की सुरक्षा करनी चाहिए। जो उसकी सुरक्षा नही करता, वो जन्म मरण को बढाता है। गंगा का पानी पवित्र है।गंगा में स्नान करने से पवित्र हो जाते हैं, चंद्रमा शीतलता देता है। कल्पवृक्ष के द्वारा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। संतों की सन्निधि मिलती है तो लाभ होता है। मुनि मोहजीतकुमार ने कहा कि जीवन एक पहेली है, इसे सुलझाना है। आज का आज और कल का कल। प्रमाद से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। दस संतों का प्रवास एक साथ एक दिन एक जगह अपने आप में बहुत बडी बात है। छह मास के बाद अब आचार्य प्रवर के आदेशानुसार यहां से प्रस्थान करना है। अर्हत पथ पर चलकर महावीर मुझे अब बनना है।तपोमूर्ति मुनि पृथ्वीराज ने कहा कि महावीर ने दो धर्म बताये। साधु और श्रावक दोनों अपने अपने धर्म का पालन कर रहे हैं। जो व्यक्ति चिंतन करे, सुख चाहिए या दुख। सुख की ही आवाज आएगी। दूसरे की निंदा नही करूँगा, अहित की नही सोचूंगा। अध्यात्म की सफलता प्राप्त करना है, तभी वो सुखी बनता है। बहिर्मुखी से अंतर्मुखी होना पडेगा। इसके लिए स्वतः प्रेरणा मिलेगी। आत्मा का साक्षात्कार करना है। धीरे धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढना है। ज्यादा बोलना और कम सुनना तो खुद दुखी होता है। लक्ष्य बनाएं और आगे बढे।मुनि धर्मेशकुमार ने कहा कि अध्यात्म की यात्रा चलती रहती है। यह जीवन का मध्य भाग है। यात्रा करते करते जहां पहुंचना चाहते हैं, वहां पहुंच जाते हैं। इसमें बाहर के साथ अंदर भी चलते रहना है। आत्मानुभूति के साथ जीवन के व्यवहार में लाना है। जाना कहीं भी नही लेकिन अपने में मग्न रहना है। इसी का नाम मोक्ष, शांति है। अपने आप में लौट आना अध्यात्म और सिद्ध अवस्था है। कौन कब कहाँ पहुंचेगा, यह आफ बचे हुए जीवन पर निर्भर करता है। कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और कहां जाना है, इन पर विचार करते रहें।इस अवसर पर यशवंत मुनि, मुनि डॉ. विनोद कुमार, मुनि अतुल कुमार, मुनि भव्य कुमार, जयेश मुनि ने भी विचार व्यक्त किए।तेरापंथी सभा अध्यक्ष सूर्यप्रकाश मेहता ने कहा कि १८ माह से लगातार कोई न कोई साधु साध्वी का प्रवास यहां रहा है। वर्ष २००८ के बाद पहली बार मौका रहा जब एक साथ दस संतों ने आध्यात्मिक प्रवचन की गंगा बहाई। इस रविवार दस और अगले रविवार बस। पहला रविवार होगा जब यहां कोई साधु साध्वी विराजित नही रहेंगे।तयुप मंत्री कमलेश परमार ने बताया कि प्रत्येक माह की १६ तारीख को ३१ युवक मासखमण करेंगे। चलें तप की ओर, हर युवक व हर किशोर अभातेयुप का राष्ट्रीय अभियान है।


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