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“वेदज्ञ महान ऋषि दयानन्द जन्म दिवस एक पावन पर्व”

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13 Feb, 18 08:11
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मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।वेदों के पुनरुद्धारक महर्षि दयानन्द जी का जन्म गुजरात के टंकारा नामक स्थान पर फाल्गुन कृष्णा दशमी के दिन हुआ था। इस वर्ष यह दिवस 10 फरवरी, 2018 को था। महर्षि दयानन्द का जन्म उनसे पूर्व व पश्चात उत्पन्न व जन्में किसी महापुरुष से कम महत्व का नहीं है अपितु हमारी दृष्टि में उनकी योग्यता, उनके द्वारा किये गये कार्यों व उन कार्यों का मनुष्य जीवन की उन्नति व उत्थान में जो योगदान है, उस दृष्टि से सबसे अधिक है। ऋषि दयानन्द जी का महत्व इस कारण है कि वह वेदों के पुनरुद्धारक थे। उनके समय में वेद विलुप्त प्रायः थे। यदि वह कहीं मिलते भी थे तो उनका यथार्थ भाष्य व टीका उपलब्ध नहीं थी। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन के पुरुषार्थ, तप व अपने विद्या गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी की पाणिनी अष्टाध्यायी, महर्षि पतंजलि के महाभाष्य एवं महर्षि यास्क के निरुक्त व निघण्टु आदि ग्रन्थों के अध्ययन सहित अपनी योग की सिद्धियों के आधार पर वेदों के यथार्थ अर्थ जानने में प्रवीणता प्राप्त की थी। महाभारत काल के बाद देश व विश्व में उनके समान वेदों के अर्थ जानने व भाष्य करने वाला महापुरुष दूसरा और कोई नहीं हुआ है। वेदों का पुनरुद्धार एक ऐसा कार्य है जिससे मनुष्य ज्ञानी बनता है और उसमें सत्यासत्य का विवेक करने की पात्रता उत्पन्न होती है। मनुष्य की अविद्या दूर होती है। वह स्वहित, समाजहित व देशहित के कार्यों को करके अपनी उन्नति सहित देश व समाज की उन्नति भी करता है। ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरूप से भी वेद व वैदिक साहित्य के अध्ययन से ही परिचित हुआ जा सकता है। ईश्वर प्राप्ति के साधन व जन्म मरण के दुःखों से मुक्ति व मोक्ष प्राप्ति के साधनों का ज्ञान भी वेदाध्ययन से भलीभांति होता है जो कि अन्य किसी प्रकार से नहीं होता है। ऐसे अनेक लाभ हैं जो वेदाध्ययन से होते हैं। इस वेद ज्ञान व वेदाध्ययन में ऋषि ने मनुष्यों को प्रवृत्त कराया इस कारण हम समझते हैं कि ऋषि दयानन्द जी का मनुष्योन्नति व देशोन्नति में सर्वाधिक महत्व एवं योगदान है। ऋषि दयानन्द भारत और विश्व के प्रथम व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने धर्म के क्षेत्र की अविद्या का समूल नाश कर विद्या को स्थापित किया और उसके प्रचार द्वारा असंख्य लोगों का उपकार किया। ऋषि दयानन्द जी पर यह पंक्तियां सटीक लागू होती हैं ‘मेरे देवता के बराबर जहां में, न कोई देवता है न कहीं और होगा। जमाने में होंगे अनेक लोग पैदा, दयानन्द सा न कोई और होगा।।’

महर्षि दयानन्द जी के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो उनके महनीय कार्यों की ओर ध्यान जाता है। प्रथम तो उन्होंने अत्यन्त विपरीत परिस्थितियों में योग सहित वेद वेदांग की शिक्षा को प्राप्त किया जो कि उस समय उपलब्ध नहीं थी। उनके गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती थे। उन्होंने अपने जीवन में अनेक लोगों को पढ़ाया परन्तु उनका एक भी शिष्य स्वामी दयानन्द जी जैसा नहीं हुआ। स्वामी दयानन्द जी अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी से लगभग 3 वर्ष ही पढ़े, अन्य शिष्य इससे कहीं अधिक समय तक पढ़े होंगे परन्तु ऋषि दयानन्द ने अपने जन्म-जन्मान्तरों की तपस्या व इस जन्म में विद्या के प्रति जो समर्पण का भाव रखा उसके परिणाम से वह विद्या प्राप्ति के मार्ग में आगे बढ़ते रहे। गृह त्याग कर जो साधना व कष्टों का जीवन उन्होंने व्यतीत किया उसने उनके जीवन को कुन्दन से भी अधिक महनीय एवं मूल्यवान बना दिया। उनके जीवन में सबसे मुख्य बात तो यही लगती है कि वह ज्ञान व चरित्र में सर्वोत्तम महापुरुष थे। उन्हें सत्य क्या है और असत्य क्या है, इसका पूरा पूरा यथार्थ ज्ञान था। उनसे पूर्व कोई व्यक्ति मूर्तिपूजा की व्यर्थता को उस प्रकार जान नहीं पाया था जैसा कि ऋषि दयानन्द जी ने जाना व समझा था। ऋषि दयानन्द ने मूर्तिपूजा सहित अनेक अनुभवों को अपने तक ही सीमित न रखकर उसका समाज, देश व सर्वत्र प्रचार किया जिससे बहुत बड़ी संख्या में लोगों को अविद्याजन्य कृत्य से मुक्त कराने में वह सफल हुए।

स्वामी दयानन्द जी ने अकेले ही काशी जाकर वहां पण्डितों की विद्वतमण्डली को शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी और उन्हें इस बात के लिए विवश किया था कि वह वेदों में मूर्तिपूजा का विधान दिखायें। 16 नवम्बर, 1869 को काशी में उनका 30 से अधिक वरिष्ठ विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ हुआ परन्तु वह सब मिलकर भी वेदों से मूर्तिपूजा के समर्थन में एक भी मन्त्र दिखा नहीं पाये। न केवल मूर्तिपूजा के असत्य कृत्य से स्वामी जी ने देश के लोगों को बचाया, वहीं अन्य अन्धविश्वासों अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, जन्मना जातिवाद, सामाजिक असमानता जैसी कुप्रथाओं पर भी प्रहार किया और उसे मिथ्या सिद्ध किया। इसके साथ ही ऋषि दयानन्द ने गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का भी पुनरूद्धार किया। गुरुकुल शिक्षा पद्धति की विशेषता यह है कि यहां शिक्षित बालक विद्या पूरी करने पर वेद आदि संस्कृत ग्रन्थों के संस्कृत वचनों का हिन्दी व अन्य भाषाओं में अर्थ, अनुवाद व भाष्य कर सकता है। वैदिक धर्म व संस्कृति के सभी प्राचीन ग्रन्थ वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत आदि सभी सस्कृत भाषा में हैं। जब तक हम इन्हें जान न सकें इनसे लाभ नहीं लिया जा सकता। इसके लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान अथवा इन ग्रन्थों के हिन्दी व अन्य भाषाओं में भाष्य व टीकायें आवश्यक हैं। गुरुकुल का ब्रह्मचारी विद्या पूरी करने पर भाष्य व टीका का काम कर सकता है। हमें गुरुकुल से योग्य पुरोहित व वेद धर्म प्रचारक भी मिल सकते हैं। हिन्दी, अंग्रेजी व अन्य भाषाओं से संस्कृत भाषा का महत्व अधिक हैं। संस्कृत विश्व की आदि व प्राचीनतम भाषा है। संस्कृत भाषा सीख कर व्यक्ति हिन्दी व अंग्रेजी आदि भाषायें भी सीख सकता है और फिर वह इन भाषाओं के प्रमुख ग्रन्थों का अनुवाद व टीका करके उन भाषाओं के पाठकों को लाभान्वित कर सकता है। हम कई बार यह भी विचार करते हैं कि गुरुकुल के संस्कृतज्ञ स्नातकों को देश भर के पुस्तकालयों की संस्कृत की प्राचीन पाण्डुलिपियों को प्राप्त कर उनका हिन्दी अनुवाद करना चाहिये। ऐसा करके प्राचीन संस्कृत साहित्य से हिन्दी पाठकों को लाभान्वित किया जा सकता है। इस ओर अभी तक बहुत कम कार्य किया गया है। इस ओर भी आर्यसमाज के विद्वानों को ध्यान देने की आवश्यकता है।

ऋषि दयानन्द ने वेदों को जन जन तक पहुंचाने के लिए ठोस कार्य के रूप में अनेक ग्रन्थों की रचना की है। यजुर्वेद एवं ऋग्वेद (आंशिक) वेदभाष्य सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानु, चतुवेदविषयसूची आदि उनके महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। वैदिक धर्म का सत्यस्वरूप इन ग्रन्थों के अध्ययन से जाना जा सकता है व इस कार्य में इन ग्रन्थों से सहायता ली जा सकती है। इन ग्रन्थों के प्रकाश में अन्य मत-मतान्तरों के ग्रन्थों का अध्ययन करने पर उन ग्रन्थों की न्यूनताओं व अविद्यायुक्त मान्यताओं का भी ज्ञान पाठकों को होता है। अन्य सभी मत-मतान्तरों का अध्ययन करने पर वेद व वैदिक धर्म की मान्यतायें ही सत्य सिद्ध होती हैं। ऋषि दयानन्द जी की यह देन कोई कम बड़ी देन नहीं है।

ऋषि दयानन्द जी ने मौखिक प्रचार और सत्यार्थप्रकाश के द्वारा वैदिक वर्णव्यवस्था का सत्यस्वरूप भी प्रस्तुत किया था। वेद व वैदिक धर्म सहित मनुस्मृति भी जन्मना जातिवाद को नहीं मानती। संसार में उत्पन्न सभी मनुष्यों की एक ही जाति है जिसे मनुष्य जाति कहते हैं। इसके दो भाग किये जा सकते हैं प्रथम पुरुष व दूसरी स्त्री जाति। इसके आतिरिक्त जाति मानना वेदों के विरुद्ध है और यह मिथ्या व अविद्या से युक्त मान्यता व परम्परा है। यदि आर्य व हिन्दू वेद की इस एक बात को ही मान लें तो हिन्दू जाति का महान उपकार हो सकता है जो कि वर्तमान में अनेक जन्मना जातियों में बंटा हुआ है जिससे हिन्दू जाति की शक्ति क्षीण हुई है और समाज में अनेक समस्यायें उत्पन्न होने के साथ देश के स्वरूप में सुधार के स्थान पर बिगाड़ होने की सम्भावना है। रामायण एवं महाभारत वैदिक संस्कृति के प्रमुख ग्रन्थ हैं। इनमें हजारों पात्रों के नाम आये हैं परन्तु किसी एक पात्र के नाम के साथ भी जाति सूचक शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। यह भी ज्ञातव्य है कि वैदिक वर्णव्यवस्था गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित है और वैदिक मान्यता के अनुसार सबको शिक्षा का समान अधिकार है। ऋषि दयानन्द ने यह व्यवस्था दी है कि शिक्षा पूर्ण निःशुल्क, पक्षपात व भेदभाव रहित होनी चाहिये। शिक्षा में छोटे बड़े का भेदभाव न होकर सबको समानता का अधिकार दिया जाना चाहिये भले ही बालक व बालिका किसी निर्धन व आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े माता-पिता की सन्तान क्यों न हो।

ऋषि दयानन्द की सबसे बड़ी देनों में से एक देन यह भी है कि उन्होंने ईश्वर व जीवात्मा सहित मूल प्रकृति का सत्य स्वरूप भी हमारे व देश के सामने रखा है। उन्होंने मनुष्यों के प्रमुख कर्तव्य ईश्वरोपासना का भी तर्क व युक्तियों सहित मण्डन व विधान किया है और ईश्वरोपासना अर्थात् सन्ध्या की वेदसम्मत उत्तम विधि हमें दी है जिसका अभ्यास करके मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सहित पूर्णानन्द को प्राप्त हो सकते हैं। यज्ञ का वैज्ञानिक व सर्वहितकारी स्वरूप व उसकी विधि भी ऋषि दयानन्द जी ने प्रदान की है। यह भी उनकी बहुत बड़ी देन है। उनके कारण ही आज यज्ञ, अग्निहोत्र, देवयज्ञ वा हवन आदि एवं पंच महायज्ञ देश व विश्व में प्रसिद्ध व प्रचलित हुए हैं। ऋषि दयानन्द ने समाज व देश को माता, पिता व आचार्य के यथार्थ गौरव से भी परिचित कराया। उन्होंने मनुस्मृति के वचनों को स्मरण कराते हुए बताया कि जहां वैदिक गुणों से युक्त नारियों का सम्मान व पूजा होती हैं, वहां सन्तान के रूप में देवता निवास करते हैं और घर परिवार में सुख व शान्ति रहती है। ऐसा परिवार शारीरिक, सामाजिक व आत्मिक उन्नति में अग्रणीय रहता है। अज्ञान व अन्धकार के युग में ऋषि दयानन्द ने सनातनी वैदिक धर्मियों सहित विश्व के कल्याण के लिए अनेक सिद्धान्त, मान्यतायें एवं विचार प्रस्तुत किये। उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि वेदों पर मानव मात्र का अधिकार है। नारियां व गुण-कर्म-स्वभाव से शूद्र आदि भी वेद पढ़ सकते हैं। नारियां यज्ञों की ब्रह्मा, आचार्या, ऋषि, राजनयिक व जीवन के अनेक क्षेत्रों में पुरुषों के समान भूमिका निभा सकती है। उन्होंने नारियों को शिक्षा, शासन आदि के अधिकार भी दिये और साथ ही बाल विवाह को वेद धर्म के विरुद्ध सिद्ध कियां। बेमेल विवाह का विरोध कर उन्होंने गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर विवाह को उचित बताया। विवाह किसी आयु की कन्या का किस आयु के युवक के साथ होना चाहिये, इस ओर भी ध्यारन आकर्षित किया। आर्यसमाज द्वारा ही हिन्दू समाज में विधवा विवाह प्रचलित हुए। ऋषि दयानन्द भक्त उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी ने स्यात् ऋषि विचारों से प्रेरित होकर ही एक विधवा से विवाह किया था। आज तो यह सामान्य बात हो गई है।

ऋषि दयानन्द संसार के महापुरुषों में सबसे महान दृष्टिगोचर होते हैं। आज उनके जन्म दिवस पर उनका शत शत अभिनन्दन है। ईश्वर कृपा करें कि संसार उनके बतायें मार्ग का अनुसरण करे। ओ३म् शम्।



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