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विधवा विवाह के समर्थन में दो सनातनधर्मी पक्षों में हुए शास्त्रार्थ

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11 Aug 18
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

विधवा विवाह के समर्थन में दो सनातनधर्मी पक्षों में हुए शास्त्रार्थ सन् 1935 में होशियारपुर, पंजाब में सनातन धर्म के दो पक्षों में विधवाओं के पुनर्विवाह के समर्थन में शास्त्रार्थ होना निश्चित हुआ। सनातन धर्म में विधवा विवाह का निषेध मानने वालों को शास्त्रार्थ के लिए दो विद्वान पं. अखिलानन्द और पं. कालूराम शास्त्री मिल गये पर विधवा विवाह का समर्थन करने वाला कोई सनातनी विद्वान शास्त्रार्थ के लिए नहीं मिला। अतः विधवाओं के पुनर्विवाह के समर्थकों ने आर्यसमाज के विद्वान ठाकुर अमर सिंह जी की सेवायें लीं और शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त की। यह शास्त्रार्थ और इसकी भूमिका ऐतिहासिक होने के साथ रोचक भी है। इस शास्त्रार्थ का विवरण ‘अमर स्वामी अभिनन्दन ग्रन्थ’ में प्रकाशित हुआ है। इस विवरण के लेखक आर्यजगत के सुप्रसिद्ध विद्वान संन्यासी स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी हैं जिनका पूर्व आश्रम में प्रिंसीपल लक्ष्मीदत्त दीक्षित नाम था। ग्रन्थ में यह विवरण ‘‘सनातन धर्मी, शास्त्रार्थ महारथी ठा. अमर सिंह” शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। हमें दो बातों ने इस विवरण को यहां प्रस्तुत करने की प्रेरणा की है। पहला आर्यसमाजी विद्वान ठा0 अमर सिंह जी ने स्वयं को सनातन धर्मी बताया और दूसरा विधवा विवाह के समर्थन में अथर्ववेद का प्रमाण जो हमारे पाठक मित्रों को भी देखना चाहिये। अब स्वामी विद्यानन्द सस्वती लिखित शास्त्रार्थ का विवरण प्रस्तुत है।

सन् 1935 की बात है, होशियारपुर में सनातन धर्मियों में ही कुछ लोग विधवा विवाह के पक्षपाती हो गये। विधवा विवाह के विरोधी कट्टर पन्थियों ने उन्हें शास्त्रार्थ का चैलेंज दे दिया। अपनी ओर से उन्होंने सनातन धर्म के दिग्गज पं0 अखिलानन्द और पं0 कालूराम जी शास्त्री को बुला लिया। विधवा विवाह के पक्षपाती सनातन धर्मियों के पैरों तले की जमीन खिसकने लगी। भला सनातन धर्मियों में विधवा विवाह के पक्ष में शास्त्रार्थ करके अपने पेट पर कौन लात मारे? और शास्त्रार्थ भी सनातन धर्म के सबसे बड़े महारथियों के साथ। वे लोग दौड़े-दौड़े मेरे (पं. लक्ष्मीदत्त दीक्षित के) पिता जी (स्वर्गीय पं0 केदारनाथ जी) के पास आये और किसी आर्य समाजी विद्वान का प्रबन्ध करने के लिए कहा।

पिताजी ने तत्काल टेलीफोन पर लाहौर में महात्मा हंसराज जी से सम्पर्क करके ठाकुर अमर सिंह जी को बुलवा लिया, सनातन धर्म स्कुल के मैदान में, शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। श्री पं0 अखिलानन्द जी ने आपत्ति की कि यह शास्त्रार्थ सनातन धर्मियों के ही दो पक्षों के बीच में है, इस लिए सनातनधर्मी पण्डित ही शास्त्रार्थ कर सकता है। ठा0 अमर सिंह यह घोषणा करें कि वह सनातन धर्मी हैं। ठाकुर अमर सिंह जी ने तत्काल कह दिया कि ‘‘मैं सनातन धर्मी हूं”। पंडित अखिलानन्द ने इसे बड़ी भारी जीत समझा। शास्त्रार्थ की समाप्ति पर ठाकुर जी ने स्पष्ट कर दिया कि वस्तुतः शाश्वत वैदिक धर्म को मानने वाला ही सनातन धर्मी होता है।

श्री पं0 अखिलानन्द जी तो नवीन धर्मी हैं, क्योंकि वह वेदों के बहुत बाद बने पुराणों को मानते हैं। पं0 अखिलानन्द ‘सनातन’ शब्द के यौगिक अर्थ को भूलकर उसके रूढ़ अर्थ के कारण ही भ्रम में पड़ कर अपनी हार को जीत समझ बैठे।

इसी शास्त्रार्थ में ठाकुर जी ने विधवा विवाह के पक्ष में एक वेद मन्त्र उद्धृत किया।

‘‘या पूर्वम् पतिम् वित्त्वा अथान्यम् विन्दते परम्।।” अथर्व वेद।।

इसके अर्थ को सुन कर श्री पं0 कालूराम जी शास्त्री ने कहा, कि आपका यह अर्थ ठीक नहीं है, इस पर ठाकुर जी ने कहा कि यह अर्थ मेरा किया हुआ नहीं है। मैं वही अर्थ बोल रहा हूं जो पं0 अखिलानन्द जी ने अपनी पुस्तक ‘‘वैधव्य विध्वंसन चम्पू” में लिखा है। ठाकुर जी की इस खोज पर सनातन-धर्मी लोग बगले झांकने लगे। पं0 अखिलानन्द जी बोले यह पुस्तक तो मेरा पूर्व पक्ष है। ठाकुर जी ने स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसा तो सब कहीं होता है कि एक ही स्थान पर पहले पूर्वपक्ष की स्थापना करके उत्तर पक्ष के रूप में उसका समाधान किया जाता है, लेकिन एक पूरी पुस्तक को पूर्व पक्ष बता कर 30 वर्ष तक उसके उत्तर पक्ष का न होना, ऐसी बात है, जिस पर कोई विश्वास नहीं कर सकता। वस्तुतः यह पुस्तक पं0 अखिलानन्द जी ने तब लिखी थी जब वह आर्य समाज में उपदेशक थे।

प्रसंगवश ठाकुर जी के पांडित्य की भी एक झलक देखने को मिली। विधवा विवाह के समर्थन में ठाकुर जी ने एक मन्त्र उद्धृत करके बताया कि यहां स्पष्ट लिखा है कि ‘एक पति को प्राप्त कर लेने के बाद उसके मरने पर दूसरा पति बनाया जा सकता है।’ इस मन्त्र में आये ‘वित्त्वा’ शब्द को लेकर पं0 कालूराम जी शास्त्री ने कहा कि ‘वित्त्वा’ का अर्थ है जानकर अर्थात् यदि किसी लड़की के विवाह की बात चल रही हो या रिश्ता तय हो जाने के कारण लड़की को उसकी ‘जानकारी’ हो गयी हो किन्तु विवाह न हुआ हो, तो उसका दूसरा विवाह हो सकता है। श्री ठाकुर जी ने पं0 कालूराम शास्त्री की व्याकरण की अज्ञानता बताते हुए कहा कि ‘विद् ज्ञाने’ का रूप ‘विदित्त्वा’ बनता है, ‘वित्त्वा विद्लृलाभे’ से बनता है। इसलिए ‘वित्त्वा’ का अर्थ ‘जानकर’ नहीं अपितु ‘पाकर’ बनता है। फिर जानने या बातचीत चलने मात्र से किसी की पत्नी संज्ञा नहीं बन जाती। विवाह हो जाने पर ही किसी को पति या पत्नी कहा जा सकता है। श्री कालूराम जी शास्त्री एवं पं0 अखिलानन्द जी को निरूत्तर हो जाना पड़ा। यह आर्य समाज की विजय थी। सनातन धर्म के माध्यम से इसका श्रेय था ठाकुर अमर सिंह जी वर्तमान अमर स्वामी जी महाराज को।
उसके पश्चात श्री ठाकुर जी का बड़ी धूम धाम एवं जोर-शोर से पूरे नगर में जलूस निकाला गया। जलूस के साथ हजारों नर-नारियों एवं बच्चों की भीड़ थी। (यहां पर स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी का विवरण वा लेख समाप्त होता है।)

आर्यसमाज के इतिहास का यह स्वर्णिम पृष्ठ है। इस शास्त्रार्थ में स्वयं सनातन धर्मीं बन्धुओं ने आर्यसमाज की मान्यता का समर्थन करते हुए अपने भी पक्ष के बन्धुओं से आर्यसमाज के विद्वान को अपना प्रतिनिधि बनाकर शास्त्रार्थ कराया और आर्यसमाज की विजय तथा सनातन धर्म की पराजय कराई। आज सनातन धर्म के बन्धु विधवाओं के पुनर्विवाह के निषेध का आग्रह छोड़ चुके हैं। यह वेद और ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज के मन्तव्यों की विजय है। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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