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“आर्यसमाज विश्व की प्रथम संस्था है जो संगठित वेदप्रचार से विश्व में शान्ति स्थापित होना स्वीकार करती है”

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17 Mar 20
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“आर्यसमाज विश्व की प्रथम संस्था है जो संगठित वेदप्रचार से विश्व में शान्ति स्थापित होना स्वीकार करती है”

आर्यसमाज वेदों के मर्मज्ञ विद्वान ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा दिनांक 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में स्थापित वह संस्था है जो आज प्रायः पूरे विश्व में जानी पहचानी होने सहित सक्रियरूप से कार्यरत है। आर्यसमाज की स्थापना से पूर्व ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने देश के अनेक भागों में जाकर वेद की शिक्षाओं का प्रचार किया। ऋषि दयानन्द के समय में वेद प्रायः विलुप्त हो चुके थे। ऋषि दयानन्द ने मथुरा अध्ययन पूरा करने के बाद निकटवर्ती स्थान आगरा में वेदों की एक प्रति प्राप्त करने का प्रयास किया था। वहां वेद प्राप्त न होने के कारण वह निकटवर्ती ग्वालियर, भरतपुर, कैरोली आदि स्थानों पर गये थे। अनुमान है कि भरतपुर या आसपास से उन्हें वेद प्राप्त हुए थे। वेदों को प्राप्त कर उन्होंने कई महीनों तक वेदों की परीक्षा की थी। वह वेद व्याकरण के भी मर्मज्ञ विद्वान थे। ऋषि दयानन्द समाधि को सिद्ध किये हुए सच्चे योगी थे। समाधि को सिद्ध करने वाले योगी को ईश्वर व आत्म साक्षात्कार हो चुका होता है। इस योग्यता वाला वेद व्याकरण में निष्णात विद्वान यदि वेदों की परीक्षा करे तो वह वेदों के यथार्थ तात्पर्य व अभिप्राय को जान सकता है।

 

                ऋषि दयानन्द द्वारा वेदों की परीक्षा करने पर पाया कि वेद सृष्टि की आदि में ईश्वर से उत्पन्न हैं तथा यह सब सत्य विद्याओं की पुस्तकें हैं। यह मान्यता पहले से पचलित थी परन्तु इसके पक्ष में तर्क व युक्तियों का अभाव था। ऋषि दयानन्द ने अपनी इस मान्यता को तर्क व युक्तियों सहित वेद के प्रमाणों से प्रतिष्ठित किया। ऋषि दयानन्द के समय में लोग वेद की सत्य शिक्षाओं को भूल चुके थे। इस कारण समाज में सर्वत्र अज्ञान, अन्धविश्वास, वेद विरुद्ध मिथ्या परम्परायें, कुरीतियां, परस्पर राग द्वेष, बाल विवाह, बेमेल विवाह, बाल विधवाओं को अत्यधिक दुर्दशा, विवाह का जन्मना जाति में सिमट जाना, कन्या व वर को पूर्ण युवावस्था में गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार अपनी पसन्द के अनुसार विवाह की अनुमति न होना, छुआछूत, समाज में नाना प्रकार के भेदभाव, निर्धन व दुर्बलों का शोषण एवं उन पर अत्याचार, उनके साथ अमानवीय व्यवहार, देश में शिक्षा की दुव्र्यवस्था, स्त्री व शूद्रों को वेद के अध्ययन से वंचित करना, ब्राह्मणों का स्वयं वेद न पढ़ना और दूसरों को भी न पढ़ाना, मिथ्या अविश्वसनीय एवं काल्पिनिक कथाओं के ग्रन्थों पुराणों का प्रचार था। ऋषि दयानन्द ने सभी आध्यात्मिक एवं सामाजिक रोगों का उपचार वेदाध्ययन, वेदप्रचार तथा वेदाचरण को बताया। इसके समर्थन में उन्होंने न केवल मौखिक प्रचार ही किया अपितु अनेक ग्रन्थ लिखने के साथ विपक्षी विद्वानों से वार्तालाप सहित शास्त्रार्थ भी किये। उन्होंने बताया कि सृष्टि के आरम्भ से महाभारत युद्ध के समय तक के 1.96 अरब वर्षों तक देश विदेश का शासन वैदिक सिद्धान्तों व विचारधारा के आधार पर चला है। उनके अनुसार सृष्टि के आरम्भ से महाभारत तक वेद अनुयायी आर्यों का पूरे विश्व पर चक्रवर्ती राज्य था। इस बात के उल्लेख वा प्रमाण भी उन्होंने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत किये हैं जिसमें अनेक चक्रवर्ती राजाओं के नामों का भी उल्लेख है।

 

                महाभारत के बाद देश विदेश में कहीं पर भी संगठित रूप से वेद प्रचार होता दृष्टिगोचर नहीं होता। महाभारत के बाद तो वेदाध्ययन प्रायः बन्द ही हो गया था। महाभारत के बाद स्वामी शंकराचार्य जी हुए हैं जो कुछ-कुछ वैदिक परम्परा में थे। वह वेदान्त के प्रचारक थे और उनका वेदान्त भी वैदिक त्रैतवाद के सिद्धान्तों पर आधारित न होकर एक विशेष प्रकार के सिद्धान्त ‘ब्रह्म ही सत्य है तथा यह संसार मिथ्या है’ पर आधारित था। स्वामी शंकराचार्य जी संसार में ब्रह्म के अतिरिक्त जीव व प्रकृति की सत्ता नहीं मानते थे। वह इस सृष्टि को स्वप्नवत् मानते थे। इसी का प्रचार उन्होंने किया। उन्होंने वेदान्त, श्रीमद् भगवद्गीता एवं उपनिषदों की व्याख्या तक ही अपने आप को सीमित रखा। स्वामी शंकाराचार्य जी ने वेदों का प्रचार, वेदव्याख्या, वेद ही मनुष्य जाति का प्रमुख धर्मग्रन्थ है, वेदानुकूल ही ग्राह्य और वेदविपरीत व वेदविरुद्ध अग्राह्य व त्याज्य है, इस बात को देश की जनता के सम्मुख प्रस्तुत नहीं किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने जैन व बौद्ध मत द्वारा उत्पन्न की गई नास्तिकता को दूर किया और देश की चार दिशाओं में धर्म प्रचार के लिए चार मठों की स्थापना की। उनका मत वर्तमान में संसार में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। उसका वैसा प्रचार भी नहीं है जैसा कि आर्यसमाज व अन्य अनेक हिन्दू शाखाओं का होता है। इसके विपरीत ऋषि दयानन्द का आर्यसमाज वेद ही मनुष्य, अर्थात् संसार के सभी मनुष्यों का परमधर्म है, इस सिद्धान्त को लेकर कार्य कर रहा है। आर्यसमाज दूसरे मत के विद्वानों से शान्तिपूर्ण वार्तालाप व शास्त्रार्थ के लिये भी सदैव उद्यत रहता है। पहले अन्य मतों के विद्वान आर्यसमाज के विद्वानों से अनेक विषयों पर चर्चा वा शास्त्रार्थ करते थे परन्तु अब बन्द कर दिये हैं। वेद का महत्व सभी मतों के आचार्य जानते हैं परन्तु मानने को तत्पर नहीं। इसका कारण यही प्रतीत होता है कि उनके मत में सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने व छुड़वाने का नियम व सिद्धान्त नहीं है।

 

                मत-मतान्तरों के विपरीत वेदों की सभी शिक्षायें केवल हिन्दू या आर्यों तक सीमित न होकर मनुष्यमात्र के लिये हैं। वेद का अध्ययन करने व आचरण करने से जितना उपकार व लाभ भारत के किसी मनुष्य का होता है उतना ही यूरोप व अन्य देशों के लोगों का भी होता है। वेदों में मनुष्यों को हिंसा की प्रवृत्ति का त्याग करने की शिक्षा मिलती है। इसके साथ ही वेद सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग सहित अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि की सद्शिक्षा भी देते हैं। वेद पूरे विश्व को एक परिवार मानता है। सबको पक्षपात रहित होकर सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार तथा यथायोग्य व्यवहार व आचरण करने की शिक्षा वेद देता है। वेदों से हमें ईश्वर, जीवात्मा और सृष्टि का सत्यस्वरूप प्राप्त होता है। वेद के अनुसार ईश्वर की उपासना करने से मनुष्य समाधि को प्राप्त होकर ईश्वर और आत्मा का साक्षात्कार करने में भी सफल होता है। वेद के अनुसार जीवन व्यतीत करने पर मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। जीवन यशस्वी बनता है। मनुष्य गोदुग्ध एवं शुद्ध शाकाहारी भोजन कर तथा प्रातः ब्राह्म-मुहुर्त में जाग कर तथा रात्रि 10.00 बजे शयन कर स्वस्थ एवं दीर्घायु भी होता है। ईश्वर के ज्ञान व उपासना से मनुष्य की आत्मा तनावों से मुक्त तथा परोपकार, समाज कल्याण, समाज सुधार, अन्धविश्वास निवारण, कुरीतियों व मिथ्या परम्पराओं को छुड़वाने में प्रवृत्त व कार्यरत रहती है। वैदिक जीवन से अनेक लाभ होते हैं जो अन्य मत-मतान्तरों की जीवन शैली अपनाकर प्राप्त नहीं होते। वैदिक जीवन से हमारा वर्तमान जीवन तो सुखद होता ही है, मृत्यु के बाद भी आत्मा की उन्नति होकर उसे श्रेष्ठ योनियों व उत्तम परिवेश में जन्म मिलता है। ऐसे अनेक लाभ मनुष्य को होते हैं जो अन्य मतों को ग्रहण करने व अन्य किसी प्रकार से नहीं होते। यही कारण था कि हमारे देश में सृष्टि के आरम्भ काल से ही ऋषि परम्परा थी जो ज्ञान प्राप्ति को महत्व देते हुए त्याग व तप से पूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। लोग उन्हें सम्मानार्थ ऋषि व योगी कहते थे और उनके आश्रमों में जाकर उनकी अर्थ व उपयोग की सामग्री प्रदान कर सेवा करते थे। उनके उपदेशों को अपने जीवन में धारण व पालन करते थे। वह युग आज के वातावरण से अनेक अर्थों में निश्चय ही सुखद एवं कल्याण प्रदान करने वाला था।

 

                ऋषि दयानन्द ने वेदों के वैश्विक दृष्टि से महत्व एवं मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति में समर्थ व सक्षम होने के कारण ही इसका विश्व में प्रचार करने का निर्णय लिया था। वेदों की तुलना में मत-मतान्तर अप्रासंगिक प्रतीत होते हैं। वेद मत-मतान्तरों के आचार्यों की तरह दूसरे मतों के लोगों का धर्मान्तरण करने की शिक्षा नहीं देता अपितु उन्हें श्रेष्ठ गुण, कर्म व स्वभाव से युक्त करने की प्रेरणा करता है। वेद मनुष्य को मनुष्य से देव व देवता बनाता है। वह वेदाध्ययन और साधना कर योगी व ज्ञानी बन सकते हैं। वेदाध्ययन द्वारा तथा वेदों के प्रति समर्पित होकर कोई भी मनुष्य वेद प्रचारक, वैदिक विद्वान तथा अत्यन्त उच्च स्थिति को प्राप्त कर ऋषि भी बन सकते हैं। दूसरे मतों में किसी मनुष्य को यह स्थितियां कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। हमारे आर्यसमाज में जंगल व गांवों में भेड़ बकरी चराने वाले विधर्मी मनुष्य भी गुरुकुलों में अध्ययन कर वेद प्रचारक, वेदिक विद्वान, योगी एवं ऋषि तुल्य बन जाते हैं। मनुष्य व आत्मा की यह उन्नति आर्यसमाज में ही देखी जाती है। अन्य मतों के विद्वान तो अपने मत के प्रचार की योजना बनाते हुए उसमें छल, लोभ व बल आदि का समावेश करते हैं जो किसी भी दृष्टि से मानवीय नहीं है।

 

                वेद की सभी शिक्षायें मनुष्य को शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करने की प्रेरणा देती हैं। हमारे देश में अतीत में हनुमान तथा भीम जैसे अतुल बलशाली वीर उत्पन्न हुए हैं। इनका बल इनकी वैदिक जीवन शैली, शाकाहारी भोजन सहित ब्रह्मचर्य के पालन करने के कारण था। विदेशी तथा विधर्मी तो ब्रह्मचर्य के नाम से ही अपरिचित हैं। वहां तो इसके विरुद्ध ही आचरण देखने को मिलता है। संयम होना सभी अच्छा मानते हैं लेकिन उच्च स्तर का संयम केवल वैदिक धर्मियों में ही देखने को मिलता है। वैदिक धर्म में भीष्म पितामह का आदर्श है जो अपने पिता की इच्छापूर्ति व सुख के लिये पिता के कहे बिना ही आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का निर्णय लेते हैं व करते हैं। वेद ऐसे ग्रन्थ हैं जहां राजनीति विषयक प्रेरणायें एवं शिक्षायें भी विद्यमान हैं। वेदों के आधार पर ही हमारे प्राचीन आचार्यों ने राजनीति विषयक अपने ग्रन्थों में अच्छा प्रभाव डाला है। चाणक्य नीति ऐसा ही ग्रन्थ है। मनुस्मृति एवं विदुरनीति सहित सम्पूर्ण रामायण एवं महाभारत से भी राजनीति सबंधी अनेक सिद्धान्तों व नियमों को प्राप्त किया जा सकता है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के छठे समुल्लास में राजधर्म का एक पृथक अध्याय लिखा है। इन सब शिक्षाओं का संकलन कर किसी देश का शासन वैदिक विधानों के आधार पर चलाया जा सकता है। महर्षि दयानन्द के सम्पूर्ण ग्रन्थों, वेदभाष्य एवं जीवन चरित आदि के आधार पर डा. लाल साहब सिंह जी का शोध प्रबन्ध ‘महर्षि दयानन्द का राजनीतिक दर्शन’ भी अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। वेदों पर आधारित डा. रामकृष्ण आर्य, कोटा का “ऋषि दयानन्द के आर्थिक विचार” विषयक शोध प्रबन्ध भी पठनीय है जिसका लाभ हमारे देश की राजनीति से जुड़े कर्णधार उठा सकते हैं।

 

                लेख को और विस्तार न देकर हम इतना ही निवेदन करना चाहते हैं कि वेद ईश्वर का दिया हुआ ज्ञान है जो सृष्टि के प्रत्येक मनुष्य के लिये है। सभी को इसको पढ़ना चाहिये और इसके अनुसार आचरण करना चाहिये। ऐसा करने से ही अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों का पराभव होकर विश्व में सुख शान्ति आ सकती है और समय समय पर होने वाले भीषण युद्धों से बचा जा सकता है। हम वेदों के प्रचार व प्रसार के लिए आर्यसमाज की स्थापना करने तथा इसी कार्य को समाज का मुख्य कर्तव्य बनाने के लिये हम ऋषि दयानन्द सरस्वती जी को नमन करने सहित उन्हें अपनी श्रद्धांजलि भेंट करते हैं। ओ३म् शम्।

 -मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

फोनः 9412985121


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