“दीपावली पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन एवं कार्यों से प्रेरणा ग्रहण करने का दिवस”

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28 Oct 19
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“दीपावली पर्व मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन एवं  कार्यों से प्रेरणा ग्रहण करने का दिवस”

दीपावली का पर्व यद्यपि ऋतु परिवर्तन के अवसर पर वृहद यज्ञ करने के साथ आगामी शीत ऋतु में होने वाले रोगों एवं कठिनाईयों से बचने के लिये प्रयत्न करने का पर्व है। इस अवसर पर वर्षा ऋतु से हमारे घरों में नमी आदि आने के कारण कुछ विकृतियां आ जाती हैं, उनको दूर करने का भी अवसर होता है। शरीर रक्षा के लिये उपलब्ध उनी वस्त्रों सहित नये गर्म वस्त्रों की व्यावस्था पर भी विचार किया जाना होता है जिससे शीत ऋतु का सुविधापूर्वक व्यतीत हो सके। इसके साथ ही दीपावली पर्व पर पूजा पाठ भी किया जाता है। ईश्वर उपासना और वैदिक अग्निहोत्र यज्ञ का विकृत रूप ही लक्ष्मी व गणेश पूजा है। लक्ष्मी धन को तथा गणेश ईश्वर को कहते हैं। अतः वैदिक विधि से सन्ध्या उपासना तथा अग्निहोत्र करने से लक्ष्मी एवं गणेश पूजा का समस्त लाभ प्राप्त हो जाता है। पौराणिक रीति से पूजा करने से कहीं अधिक लाभ वैदिक विधि के अनुसार ईश्वर उपासना व अग्निहोत्र यज्ञ से मनुष्य को प्राप्त होता है। प्राचीन आदि काल से महाभारतकाल तक और उसके बाद भी कई शताब्दियों तक वैदिक धर्म, संस्कृति एवं परम्परायें ही विश्व में प्रचलित रहीं। इन सबका वाहक एवं प्रचारक ही वर्तमान समय में ऋषि दयानन्द द्वारा स्थापित ‘‘आर्यसमाज” है। हम यहां आर्यसमाज के प्रथम तीन नियमों का भी उल्लेख कर रहे हैं जिससे हमारे प्रिय पाठक आर्यसमाज के एक सच्चे आध्यात्मिक एवं सामाजिक संगठन के स्वरूप से परिचित हो सकें। पहला नियम है ‘सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उनका आदि मूल परमेश्वर है।’ आर्यसमाज का दूसरा नियम है ‘ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य और पवित्र है। उसी की उपासना करनी योग्य है।’ तीसरा नियम है ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।’ यदि हम इन तीन नियमों को समझ लें तो आर्यसमाज को संसार का प्रमुख व एकमात्र आध्यात्मिक, धार्मिक एवं सामाजिक संगठन सिद्ध किया जा सकता है क्योंकि इन नियमों के पालन से ही हमारा सर्वांगीण विकास व कल्याण होता है। यह तथ्य शास्त्रीय प्रमाणों सहित तर्क, युक्ति एवं विवेचन से भी सिद्ध है।

 

                दीपावली पर्व को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन से भी जोड़ा जाता है। बाल्मीकि रामायण राम का प्रामाणिक जीवन चरित्र है। इसमें प्रक्षेप हुए हैं जो कि मान्य नहीं हैं। रामायण के अनुसार राम के वनवास से आने की तिथि एवं कार्तिक अमावस्या की तिथि की परस्पर संगति नहीं लगती। ऐसा न होने पर भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को तो हम प्रति दिन स्मरण कर सकते हैं। बाल्मीकि रामायण का पाठ कर राम कथा को हम अपने पूरे परिवार को सुना सकते हैं और किसी भी पर्व के साथ जोड़ कर राम के जीवन की प्रेरणादायक घटनाओं को स्मरण कर कुछ संकल्प भी धारण कर सकते हैं। हम सीता हरण आदि कारणों से राम की लंका पर चढ़ाई और रावण पर विजय का उत्सव भी मना सकते हैं। हमारी दृष्टि में रावण विद्वान होकर भी धार्मिक एवं विवेक बुद्धि से युक्त नहीं था। यदि उसमें धार्मिकता और विवेक बुद्धि होती तो वह रामचन्द्र जी से शत्रुता न कर मित्रता व संधि करता जैसे की सुग्रीव व विभीषण ने की थी। इससे रावण न केवल अपयश से बचता अपितु अपने परिवार व जनता को भी कष्टों से बचाता। रामचन्द्र जी ने रावण को सन्धि के प्रस्ताव किये जिसे ठुकरा कर उसने अपने सर्वनाश को आमंत्रण दिया था। ऐसा ही कुछ-कुछ हमारा पड़ोसी देश भी विगत 72 वर्षों से कर रहा है। कभी तो इसे ब्याज-सूद सहित इसका भुगतान करना ही होगा। दुःख एक ही बात का है कि हिन्दू जाति अपने शत्रुओं को पहचानती नहीं और शत्रु के साथ यथायोग्य व्यवहार करना इसको आता नहीं है। मोदी जी को इसका कुछ ज्ञान है परन्तु उनकी अनेक विवशतायें हैं। आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम अपने जातीय शत्रुओं को पहचाने और उनसे यथायोग्य व्ययवहार करते हुए उनके पापी बल को धूल में मिला दें। हमारे सम्मुख अनेक समस्यायें भी हैं। हमारे धर्म व जाति के विद्वान अपने अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं पर ध्यान नहीं देते। इसी से हमारा ह्रास व पतन हुआ था। यदि इनको दूर नहीं किया तो हिन्दू और आर्य शब्द आने वाले वर्षों में इतिहास में ही सिमट कर रह जायेंगे, ऐसा भी अनुमान हमारे विश्लेशक व विवेचक करते हैं। सरकारों द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ईश्वर ही हिन्दू व आर्य जाति की रक्षा करे और इनके नेताओं व धर्माचार्यों को सद्बुद्धि प्रदान करें जिससे कि यह अपने अन्धविश्वासों एवं हानिकारक परम्पराओं यथा जातिवाद, मृतक श्राद्ध एवं फलित ज्योतिष आदि का त्याग कर जाति को सबल व शक्तिशाली बना सकें। हमें सदैव ‘लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई’ के सिद्धान्त को याद रखना चाहिये। हमें यह बात मनुस्मृति के मान्यता ‘धर्मो एवं हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः’ के अनुरूप् लगती है।

 

                श्री राम चन्द्र जी के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो हमें उनके जीवन में दुष्टों का संहार करना और निर्बलों की रक्षा करने का नियम व प्रतिज्ञा दृष्टिगोचर होती है। रामचन्द्र जी ने वनों में जाकर वहां तपस्या एवं देश हित के कार्य करने वाले ऋषि, मुनियों व साधु स्वभाव के लोगों की राक्षसों व हिंसा करने वाले दुष्टों से रक्षा की थी। उन्होंने तो दुष्टों से पूरी पृथिवी को मुक्त करने की प्रतिज्ञा भी कर ली थी। इसी कारण राम एक सामान्य मानव न होकर महामानव व भगवान बने। सीता जी राम की धर्मपत्नी थी। उनकी रक्षा का दायित्व उन पर था। उन्होंने सुग्रीव की अपने बड़े भाई बाली के अन्याय व अत्याचारों से उनकी रक्षा की और उसकी सहायता से रावण के अहंकार व दम्भ का नाश कर उस पर विजय पायी। उन्होंने बन्दी सीता जी को रावण के कारावास से मुक्त कराया था। एक पति के कर्तव्यों को पूरा कर राम ने भावी पीढ़ी को सन्देश दिया कि एक पति का क्या कर्तव्य होता है और उसे कैसे पूरा किया जाता है।

 

                राम का निजी जीवन वैदिक मर्यादाओं का पालन करते हुए व्यतीत हुआ। उन्होंने अपने गुरुओं व विद्वानों के प्रति श्रद्धा रखते हुए उनको पूर्ण सुरक्षा प्रदान की। वेद और वेदानुयायी ऋषि कहते हैं कि मनुष्य को धर्म की रक्षा करनी चाहिये। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है। जो धर्म की रक्षा व पालन नहीं करता धर्म भी उसकी रक्षा व उसको सुरक्षा नहीं देता। धर्म कर्तव्य को कहते हैं। वेदानुकूल शिक्षाओं का पालन करना ही मनुष्य का कर्तव्य व धर्म दोनों है। जिस देश व समाज में ऐसा होता है वह देश आदर्श देश होता है। रामराज्य की यही विशेषता थी कि वहां वेद की शिक्षाओं का पालन किया जाता था। राजा भी वेद की अवज्ञा नहीं कर सकते थे। जो करता था वह दण्डित होता था। राम तथा भरत आदि का जीवन इसका प्रमाण है। वह वेद के पालक और उनके सत्य सिद्धान्तों के रक्षक थे। राम की माता-पिता की भक्ति तथा अपने भाईयों के प्रति स्नेह वेद की शिक्षाओं के अनुकूल तथा आदर्श रूप था जिसके समान उदाहरण विश्व के इतिहास में नहीं मिलते। राम न केवल हिन्दू व आर्यों अथवा भारत के लिये आदर्श व अनुकरणीय हैं अपितु वह विश्व के प्रत्येक मनुष्य भले ही वह किसी मत के अनुयायी हों, सबके लिये सिद्धान्त व व्यवहार के आधार पर आदर्श व मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। राम ने रामायण में अपनी पितृभक्ति का प्रमाण देते हुए वन गमन के प्रसंग में पिता दशरथ को अपनी प्रतिज्ञा से अवगत कराते हुए कहा था कि यदि आप मुझे जलती हुई चिता में कूदने की आज्ञा करेंगे तो मैं बिना विचार किये ही आपकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करुगां। आपने क्या कहा है, वह करणीय है या नहीं, इस पर किचित भी विचार नहीं करूंगा। क्या ऐसा उदाहरण कोई हमें विश्व के इतिहास में दिखा सकता है? हम राम, भरत व दयानन्द जी के जीवन का जितना अनुकरण करेंगे उतना ही हमें लाभ होगा। हमारा परिवार व समाज उन्नति व सुखों को प्राप्त होगा।

 

                दीपावली के दिन सन् 1883 में ऋषि दयानन्द का बलिदान हुआ था। वह किसी विरोधी विचारों के व्यक्ति द्वारा ईष्या, राग व द्वेष के कारण विष दिये जाने से मृत्यु को प्राप्त हुए थे। उनकी मृत्यु से समाज व देश सहित विश्व की बड़ी हानि हुई। उन्होंने वेदों का पुनरुद्धार किया। समाज से अज्ञान व अन्धविश्वासों सहित समाज को कमजोर करने वाली जातिवाद तथा स्त्री-पुरुषों में भेद करने वाले विचारों पर प्रहार कर उन्होंने वैदिक सत्य, अन्याय व शोषण रहित मान्यताओं व परम्पराओं का प्रचार किया था। समाज व देश से अशिक्षा को दूर कर उन्होंने गुरुकुलों, पाठशालाओं व विद्यालयों के संचालन की प्रेरणा की थी। दलितों को भी शिक्षा एवं वेदाध्ययन का अधिकार उनके प्रयासों से मिला। मूर्तिपूजा तथा मृतक श्राद्ध सहित फलित ज्योतिष को उन्होंने मनुष्य की आध्यात्मिक तथा धार्मिक उन्नति में बाधक बताया। स्वामी दयानन्द जी ने देश व समाज की उन्नति के सभी उपायों को सबको बताया था और उसका प्रचार भी किया था। वैदिक सन्ध्या एवं अग्निहोत्र विधि भी उनकी अनुपम देनें हैं। इससे मनुष्य ईश्वर से आत्मिक सम्बन्ध स्थापित कर बुराईयों से दूर होता है और परमात्मा की सहायता से उन्नति करते हुए सुख की प्राप्ति कर मोक्ष की प्राप्ति भी करता है। उपासना एवं यज्ञ करने से मनुष्य का परजन्म भी सुधरता है तथा देश, समाज व विश्व को लाभ होता है। महर्षि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, वेदभाष्य, व्यवहारभानु, गोकरुणानिधि, उनका पत्रव्यवहार तथा ऋषि दयानन्द के जीवनचरित्र भी मनुष्य की उन्नति में सर्वाधिक सहायक हैं। हम आज ऋषि दयानन्द के बलिदान दिवस पर उनका सश्रद्ध नमन करते हैं। ऋषि दयानन्द के जीवन से हमें ज्ञान प्राप्ति, ईश्वर प्राप्ति की साधना तथा देश व समाज की उन्नति के लिये पुरुषार्थ की प्रेरणा मिलती है। इसी से हमारा कल्याण हो सकता है। हमें सत्य का ग्रहण करना है और असत्य का त्याग करना है। सरकार को भी इस नियम का प्रचार करना चाहिये। इस नियम के ज्ञान एवं पालन में ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य निहित है और यही सब सुखों व उन्नति का आधार है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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