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सशक्त विपक्षी गठबंधन की बाधाएं

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18 Aug 18
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सशक्त विपक्षी गठबंधन की बाधाएं ललित गर्ग /आगामी लोकसभा चुनाव की हलचल उग्र होती जा रही है। भारतीय जनता पार्टी बनाम विपक्षी गठबंधन का दृश्य बन रहा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, विपक्षी एकता के स्वर सुनाई दे रहे हैं। लेकिन सशक्त विपक्ष के गठबंधन की सबसे बड़ी बाधा भावी प्रधानमंत्री को लेकर है। फिर भी विपक्षी गठबंधन को सफल बनाने के लिये नारा दिया गया है कि ‘पहले मोदी को मात, फिर पीएम पर बात।’ निश्चय ही इस बात पर विपक्ष एक होने की तैयारी कर रहा है। लेकिन विचारणाीय बात है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अब नीतियों के बजाय नेतृत्व मुद्दा बन गया है।

राजनीतिक दलों की एकजुटता अच्छी बात है, लेकिन यह समय उन लोगों के लिए चुनौती है जिन्होंने अब तक औरों की वैशाखियों पर लड़खड़ाते हुए चलने की आदत डाल रखी है। जिनकी अपनी कोई मौलिक सोच नहीं, कोई संकल्प नहीं, कोई सपना नहीं, कोई सार्थक प्रयत्न नहीं। कोरा गठबंधन जनजीवन को शुद्ध सांसें नहीं दे पायेगा। बहुत सावधान एवं सर्तक होने की जरूरत है। चुनाव जीतना ही लक्ष्य न हो और ऐसी गलत शुरुआत भी न हो, क्योंकि गणित के सवाल की गलत शुरुआत सही उत्तर नहीं दे पाती। गलत दिशा का चयन सही मंजिल तक नहीं पहुंचाता। दीए की रोशनी साथ हो तो क्या, उसे देखने के लिए भी तो दृष्टि सही चाहिए।

राजनीतिक दलों की नीति एवं नियत पर शंका की स्थितियां वर्ष 2019 के आम चुनाव की तस्वीर को जहां अनिश्चिय के धरातल पर खड़ा कर रही है, वहीं चुनावी सरगर्मियों एवं तैयारियां में भी हर तरह के हथियार अपनाने के संकेत दे रही है। आगामी चुनाव के लिये राजनीतिक जोड़-तोड़ एवं रणनीतियां व्यापक स्तर पर बन रही है, जिसका उद्देश्य येन-केन-प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन चुनावी सरगर्मियों में आम-जनता एवं उसकी समस्याओं के समाधान का स्वर कहीं से भी सुनाई नहीं दे रहा है। समय की मांग है कि सत्ता के लालच अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए हकदार का, गुणवंत का, श्रेष्ठता का हक नहीं छीना जाए।

दलों के दलदल वाले देश में दर्जनभर से भी ज्यादा विपक्षी दलों के पास कोई ठोस एवं बुनियादी मुद्दा नहीं है, देश को बनाने का संकल्प नहीं है, उनके बीच आपस में ही स्वीकार्य नेतृत्व का अभाव हमारी राजनीतिक संस्कृति की विडम्बना एवं विसंगतियों को ही उजागर करता है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि हमारी राजनीतिक संस्कृति नेतृत्व के नैसर्गिक विकास में सहायक नहीं है। नतीजतन चाटुकारिता की संस्कृति पनप रही है, जिसमें आलाकमान की पसंद-नापसंद ही नेता बनाती-बिगाड़ती है। ऐसा नहीं है कि विपक्ष में नेताओं का अभाव है, लेकिन व्यक्ति या परिवार तक सिमट गये दलों की सोच की सीमाएं बहुत सीमित हैं।

देश पर एकछत्र राज करने वाली सशक्त राजनीतिक पार्टी कांग्रेस भले ही पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में 44 सीटों पर सिमट गयी है, पर आज भी भाजपा के सामने वही सही मायने में राष्ट्रीय राजनीतिक दल है, जो चुनौती देने में सक्षम हो सकती है। लेकिन अपनी इन संभावनाओं को इस राष्ट्रीय दल ने सत्ता की महत्वाकांक्षा एवं चाटुकार संस्कृति के चलते कमजोर कर दिया है। एक समय था, जब ज्यादातर राष्ट्रीय पहचान और स्वीकार्यता वाले नेता कांग्रेस में ही हुआ करते थे, लेकिन किन्हीं पूर्वाग्रहों के चलते आज उसे नेतृत्व के मामले में सबसे दरिद्र बना दिया हैं। आज जो राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, उनकी अभी तक की सबसे बड़ी राजनीतिक योग्यता नेहरू परिवार का सदस्य होना ही है। उन्होंने इस योग्यता के अलावा अपनी कोई स्वतंत्र पहचान या योग्यता अभी तक तो साबित नहीं की है। उस कांग्रेस पार्टी का राजनीतिक धरातल और शीर्ष राजनेताओं का दिल इतना संकीर्ण कैसे हो गया कि यहां अपनों को भी अपना-सा अहसास नहीं मिलता और दिमागी सोच इतनी बौनी पड़ गई कि समान धरातल पर खड़ा आदमी भी उन्हें अपने से छोटा दीखने लगा? वह क्यों सीमित दायरों में बंध गई? क्यों धर्म, जाति, संप्रदाय, भाषा और प्रांत के नाम पर बंट गई? उसके लिये क्यों अच्छाइयों और बुराइयों के मानक बदल गए और क्यों चरित्र से भी ज्यादा चेहरों को मान्यता मिलने लगी? कांग्रेस नेतृत्व के सम्मुख खड़ी इन स्थितियों की समीक्षा जरूरी है। राहुल गांधी को संगठनात्मक प्रयोगों के साथ-साथ कांग्रेस की बेहतरी के लिए कुछ और भी करना होगा। क्योंकि स्थितियां तो यही बताती हंै कि उनके आगे आने के बाद कांग्रेस के पराभव की रफ्तार बढ़ी ही है।

विडंबना यह भी है कि कांग्रेस ने अपनी गलतियों से सबक नहीं सीखा, वरना आज भी उसकी नेतृत्व की तलाश राहुल गांधी तक ही सीमित नहीं होती। जाहिर है, बदली परिस्थितियों में अन्य गैर भाजपा दलों में राहुल के नेतृत्व की स्वीकार्यता नहीं हो सकती। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली जनाधार रखने वाले अखिलेश यादव और मायावती तो राहुल को अपना नेता मानने की सोच भी नहीं सकते। उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी उन्हें कैसे अपना नेता मान लेंगी? नवीन पटनायक हो या चंद्रबाबू नायडू, राजनीति का लम्बा अनुभव रखते हंै, जनाधार भी उनका सुदृढ़ है, वे कैसे राहुल की छतरी के नीचे आ जाये? अरविंद केजरीवाल भले नये-नये राजनीतिक सितारे हैं, लेकिन वे भी कांग्रेस-भाजपा, दोनों को हाशिये पर धकेल कर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं। कैसे अपने विरोधी दलों का नेतृत्व उन्हें स्वीकार्य होगा? इन विरोधाभासी स्थितियों में कैसे सशक्त एवं प्रभावी विपक्षी गठबंधन हो सकेगा, यह भविष्य के गर्भ में है।

बात केवल गठबंधन की ही न हो, बात केवल मोदी को परास्त करने की भी न हो, बल्कि देश की भी हो। कुछ नयी संभावनाओं के द्वार भी खुलने चाहिए, देश-समाज की तमाम समस्याओं के समाधान का रास्ता भी दिखाई देना चाहिए, सुरसा की तरह मुंह फैलाती गरीबी, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी और अपराधों पर अंकुश का रोडमेप भी बनना चाहिए। संप्रग शासन में शुरू हुईं कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याएं राजग शासन में भी बदस्तूर जारी हैं। तब एक निर्भया कांड से देश हिल गया था, लेकिन अब आये दिन निर्भया कांड की खबरें आ रही हैं। मुजफ्फरपुर हो या देवरिया-संरक्षण गृह ही शोषण के अड्डे बन गये हैं। विजय माल्या, मेहुल चोकसी जैसे ऊंची पहुंच वाले शातिर लोग हजारों करोड़ का घोटाला करके विदेश में बैठे हैं, व्यापार ठप्प है, विषमताओं और विद्रूपताओं की यह फेहरिस्त बहुत लंबी बन सकती है, लेकिन ऐसा सूरज उगाना होगा कि ये सूरत बदले। जाहिर है, यह सूरत तब बदलेगी, जब सोच बदलेगी। इस सोच को बदलने के संकल्प के साथ यदि प्रस्तावित गठबंधन आगे बढ़ता है तो ही मोदी को टक्कर देने की सार्थकता है। यह भी हमें देखना है कि टक्कर कीमत के लिए है या मूल्यों के लिए? लोकतंत्र का मूल स्तम्भ भी मूल्यों की जगह कीमत की लड़ाई लड़ रहा है, तब मूल्यों का संरक्षण कौन करेगा? एक खामोश किस्म का ”सत्ता युद्ध“ देश में जारी है। एक विशेष किस्म का मोड़ जो हमें गलत दिशा की ओर ले जा रहा है, यह मूल्यहीनता और कीमत की मनोवृत्ति, अपराध प्रवृत्ति को भी जन्म दे रहा है। हमने सभी विधाओं को बाजार समझ लिया। जहां कीमत कद्दावर होती है और मूल्य बौना। सिर्फ सत्ता को ही जब राजनीतिक दल एकमात्र उद्देश्य मान लेता है तब वह राष्ट्र दूसरे कोनों से नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तरों पर बिखरने लगता है।

राजनीति करने वाले राष्ट्रीय उत्थान के लिए काम नहीं करते बल्कि उनके सामने बहुत संकीर्ण मंजिल है, ”वोटों की“। ऐसी रणनीति अपनानी, जो उन्हें बार-बार सत्ता दिलवा सके, ही सर्वोपरि है। वोट की राजनीति और सही रूप में राष्ट्रीय उत्थान की नीति, दोनों विपरीत ध्रुव बनते जा रहे हैं। एक राष्ट्र को संगठित करती है, दूसरी विघटित। लेकिन राष्ट्र को जोड़ने की बजाय तोड़ने की नीति से तो लोकतंत्र कमजोर ही होता जायेगा। सच तो यह है कि बुराई लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं, बुरी तो राजनीतिक सोच हैं। वैसे राजनीति से जुड़े लोगों ने ढलान की ओर अपना मुंह कर लिया है। राष्ट्रद्रोही स्वभाव राजनीतिक दलों के लहू में रच चुका है। यही कारण है कि दलों को कोई भी कार्य राष्ट्र के विरुद्ध नहीं लगता और न ही ऐसा कोई कार्य उनको विचलित करता है। कैसी विडम्बना है कि कोई सत्ता में बना रहना चाहता है इसलिए समस्या को जीवित रखना चाहता है, कोई सत्ता में आना चाहता है इसलिए समस्या बनाता है। जाति धर्म हमारी राजनीति की झुठलाई गई सच्चाइयां हैं जो अब नए सिरे से मान्यता मांग रही हैं। यह रोग भी पुनः राजरोग बन रहा है। कुल मिलाकर जो उभर कर आया है, वह यही है कि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का स्वर कहीं से सुनाई नहीं दे रहा है। भाजपा हो या कांग्रेस, सपा हो या बसपा या अन्य राजनीतिक दल- एक कोशिश करें राष्ट्र को संगठित करने की, सशक्त करने की, जो वर्ष 2019 के चुनावों का आधार भी बने और चुनावी घोषणापत्र भी।




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