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“दुष्ट व्यक्ति विद्वान भी हो तब भी उसका संग नहीं करना चाहिये”

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01 Jul 20
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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

“दुष्ट व्यक्ति विद्वान भी हो तब भी उसका संग नहीं करना चाहिये”

वैदिक साहित्य में वेद से इतर ऋषियों व विद्वानों के अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं जिनमें जीवन को अपने लक्ष्य आनन्द व मोक्ष तक पहुंचाने के लिये उत्तम विचार व शिक्षायें दी गई हैं। ऐसी ही एक शिक्षा है कि मनुष्य को दुष्ट व्यक्तियों की संगति नहीं करनी चाहिये। इसका परिणाम यह होता है कि सज्जन मनुष्य की सज्जनता व शुभगणों में प्रवृत्ति कम होकर संगति किए गए दुष्ट व्यक्ति के अवगुण उसमें आ जाते हैं। यह सज्जन मनुष्य की बहुत बड़ी हानि होती है जिससे उसे अपने जीवन व उसके बाद भी हानि होती है। जो मनुष्य वैदिक साहित्य के स्वाध्याय से दूर हैं तथा जो विद्वानों व सत्पुरुषों की संगति नहीं करते उनमें लोभ, काम, परिग्रह तथा दुष्ट इच्छाओं का आ जाना सम्भव होता है। स्वाध्याय तथा सत्पुरुषों की संगति सहित सन्ध्या एवं देवयज्ञ आदि आवश्यक नियमों का पालन करने से मनुष्य के जीवन व चरित्र का निर्माण होता है। जीवन निर्माण में सत्यसंकल्पों का धारण करना भी महत्वपूर्ण होता है। यदि कभी कोई बुरा विचार आ जाता है तो उसे दृणतापूर्वक रोक देना चाहिये। यदि उसे रोका न जाये तो इससे बड़ी हानि होती है। ऐसा करके मनुष्य अनेक बुराईयों व भावी दुःखों एवं पतन से बच जाते हैं। अनेक लोगों के जीवन में ऐसा भी देखा गया है कि कई बुरे लोगों ने सत्पुरुषों के प्रभाव से अपनी बुराईयों को छोड़ दिया। इसके हम दो उदहारण प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

                एक बार एक स्थान का प्रसिद्ध डाकू अपने साथियों के साथ एक स्थान पर डाका डालने गया। जिस घर में डाका डालना था उसी से सटा हुआ एक मन्दिर था जहां कर्म-फल व्यवस्था पर व्याख्यान हो रहा था। डाकू मन्दिर में कुछ स्थानों पर छुप कर बैठ गये। वहां से वह डाका डालने वाले धनवान के घर की निगरानी कर रहे थे। संयोगवश डाकुओं के सरदार के कानों में वहां हो रहे व्याख्यान के शब्द पड़ रहे थे। व्याख्यान में वक्ता कह रहे थे मनुष्य जो भी शुभ व अशुभ कर्म करता है उसे उसका फल इस जन्म या परजन्म में अवश्य ही भोगना पड़ता है। वह उस कर्म के फल को बिना भोगे उसके बन्धन से मुक्त नहीं होता। डाकू के कान में यह शब्द पड़े तो इन शब्दों को सुनकर वह अपने कर्मों के बारे में विचार करने लगा। उसने अपने साथियों को उसके अगले संकेत तक योजना के अनुसार कोई कार्य न करने को कहा। अब वह व्याख्यान सुन रहे श्रोताओं के मध्य आ कर बैठ गया। सत्संग में जो लोग बैठ थे वह उसे देख डर कर भागने लगे। सभी लोग उस डाकू को पहचानते थे। एक समय आया कि वक्ता व डाकू ही वहां रहे। व्याख्यान समाप्त होने पर डाकू ने वक्ता से प्रश्न किया कि यदि कोई व्यक्ति अच्छे व कुछ बुरे काम करता है तो क्या उसके बुरे कर्म उसके अच्छे कर्मों में समायोजित होते हैं अथवा नहीं? वक्ता ने तर्कयुक्त उत्तर देते हुए कहा शुभ कर्मों का फल अलग से और पाप कर्मों का फल अलग से मिलता है। डाकू को वक्ता की बातें तर्कसंगत लगी। उसने उस दिन की डाका डालने की योजना स्थगित कर दी। उसके बाद उसने डाके न डालने का निर्णय किया और स्वयं एक साधु की तरह सज्जन पुरुष का जीवन व्यतीत करने लगा। यह व्याख्यान व सज्जन पुरुष की संगति का प्रभाव था। ऐसे अनेक उदाहरण और भी हैं।

 

                ऋषि दयानन्द (1825-1883) ने अविभाजित पंजाब सहित पूरे देश में वैदिक धर्म का प्रचार किया था। जब वह प्रचार करते हुए पंजाब के झेलम नगर में पहुंचे थे तो वहां उनके व्याख्यान सुनने एक गीतकार, गायक, संगीतज्ञ अमीचन्द जी भी पहुंचे थे। अमीचन्द जी ने स्वामी दयानन्द जी से अनुरोध किया कि वह एक भजन प्रस्तुत करना चाहते हैं। स्वामी जी ने उनका आग्रह स्वीकार किया और अमीचन्द जी को श्रोताओं को अपना भजन सुनाने का अवसर दिया। अमीचन्द जी का कण्ठ माधुर्य से युक्त था तथा उनके द्वारा प्रस्तुत रचना के शब्द प्रभावशाली थे। भजन की समाप्ति के बाद स्वामीजी ने उनके भजन की प्रशंसा की। स्वामी जी के व्याख्यान के बाद आयोजकों ने स्वामी दयानन्द को अमीचन्द के व्यक्तिगत दुर्गुणों से परिचित कराया। दूसरे दिन अमीचन्द जी व्याख्यान सुनने समय से बहुत पहले पहुंच गये। आज पुनः अमीचन्द जी ने ऋषि दयानन्द को भजन सुनाने के लिये अवसर देने का अनुरोध किया। ऋषि ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। अमीचन्द जी ने भजन सुनाया। भजन के बाद स्वामी जी ने अमीचन्द जी के भजन की भूरि भूरि प्रंशसा की और अन्त में कहा कि ‘अमीचन्द! तुम हो तो हीरे, किन्तु कीचड़ में पड़े हुए हो।’ यह शब्द सुनकर अमीचन्द जी पर जादू का सा प्रभाव हुआ। वह बोले महाराज! आज के बाद आपको अपना मुंह तभी दिखाऊंगा जब कीचड़ से बाहर आ जाऊंगा। इसके बाद उनका जीवन कीचड़ से पूर्णतः बाहर निकल गया। वह उसके बाद आर्यसमाज के प्रथम प्रभावशाली और अनेक शास्त्रीय भजनों के रचनाकर व गायक के रूप में प्रसिद्ध हुए जिनको आज भी देश विदेश में गाया जाता है। यह परिवर्तन भी सत्संगति का परिणाम था। उनके उत्तरवर्ती सभी भजनोपदेशकों के लिए उनका जीवन अनुकरणीय एवं प्रेरणादायक है। अमीचन्द जी के जीवन में यह परिवर्तन ऋषि दयानन्द जी की संगति के कारण आया। यदि वह उस दिन सत्संग में न जाते तो उनके जीवन में यह क्रान्तिकारी परिवर्तन न आता। पहले उन्हें ऋषि दयानन्द जैसा साधु पुरुष मिला नहीं था जिससे वह कुसंगति में फंसकर दुव्र्यसनों से ग्रस्त् हो गये जिससे उनका पारिवारिक जीवन भी बर्बाद हो गया था। इस घटना के बाद सभी बिगड़ी बातें सुधर गईं। हम अनुभव करते हैं कि यदि कोई बन्धु ऋषि दयानन्द के जीवन चरित्र और उनके सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों को पढ़े ले तो उसके जीवन का अमीचन्द जी की भांति सुधार हो सकता है और वह लोहे से कुन्दन बन सकता है। 

 

                मनुष्य के अन्दर दुष्टता एवं अन्य दुर्गुण संगति के कारण ही आते हैं। जो मनुष्य ईश्वर की सन्ध्या-उपासना करता है तथा सज्जन व विद्वानों की संगति करता है, उसके अन्दर ईश्वर व उन सज्जन विद्वानों के सदृश गुण आते हैं। वैदिक धर्म में प्रतिदिन दैनिक अग्निहोत्र करने का विधान है। अग्निहोत्र को यज्ञ कहते हैं। यज्ञ करने से देवपूजा, संगतिकरण एवं दान आदि गुणों का सम्मिलित लाभ इसके करने वालों को प्राप्त होता है। अग्निहोत्र करने से जीवन अग्नि के समान पापों से रहित तथा तेजस्वी बनता है। यज्ञ में पुरोहित एवं अन्य विद्वानों की उपस्थिति से उनसे संगतिकरण होता है जिससे उनके धार्मिक विचार सुनने को मिलते हैं। यह धार्मिक विचार हमारे जीवन के दोषों को दूर करते हैं और हमें सज्जन व साधु मनुष्य बनाते हैं। दान करने से सुपात्रों को लाभ होता है जिसका फल परमात्मा कई गुणा दान करने वालों को भी देता है। शुभगुणों का दान भी महत्वपूर्ण है। इससे दूसरों को तो लाभ होता ही है, दानी मनुष्य को भी कर्म के अनुसार फल तथा आत्मसन्तोष का अनुभव होता है। सन्ध्या, अग्निहोत्र-यज्ञ, पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ सहित वेदज्ञान एवं वैदिक सत्साहित्य के स्वाध्याय के कारण ही वैदिक धर्म एवं संस्कृति विश्व की महानतम संस्कृति है। वैदिक धर्म में सज्जन पुरुष औरों से अधिक पाये जाते हैं, यह हमारा निजी अनुभव है। जैसा गुरु होता है वैसा ही चेला होता है। इस कहावत के अनुसार वैदिक धर्मी राम, कृष्ण, ऋषियों, योगियों, ऋषि दयानन्द तथा स्वामी श्रद्धानन्द जी के गुणों वाले होते हैं।

 

                हमारे देश के अनेक महापुरुषों ने दुष्ट व्यक्तियों के सम्बन्ध में हमें सावधान किया है। महाराज भृतहरि ने लिखा है कि ‘दुष्ट मनुष्य यदि विद्वान हो तो भी उसके संग से बचना चाहिए। क्या मणिवाला सर्प जहरीला नहीं होता?’ आचार्य चाणक्य ने कहा है ‘दुष्ट मनुष्यों को रास्ते पर लाने के केवल दो ही उपाय हैं। या तो जूते से उनका मुंह तोड़ दिया जाय अथवा उनकी अवहेलना कर दी जाये।’ एक अन्य स्थान पर आचार्य चाणक्य ने कहा है ‘दुष्ट व्यक्ति के तीन लक्षण होते हैं, उसका मुख कमल के समान सुन्दर दिखाई देता है और वाणी चन्दन के समान शीतल लगती है परन्तु उसका हृदय कैंची के समान तेज होता है।’ कुमार-संभव ने लिखा है कि ‘दुष्ट लोगों को महान व्यक्तियों के कार्य अच्छे नहीं लगते, इसलिए वे उनसे द्वेष करते हैं।’ आर्यसमाज का सातवां नियम है ‘सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य (सज्जनों के सज्जनता तथा दुष्टों के साथ दुष्टता का) व्यवहार करना चाहिये।’

 

                ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ यथा नाम तथा गुण एवं विश्वविख्यात ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में उन्होंने मनुष्य की परिभाषा दी है। यहां अन्यायकारी बलवान एवं अधर्मी शब्दों का प्रयोग दुष्ट व्यक्तियों के लिये ही किया गया है। उनके वचन हैं ‘मनुष्य उसी को कहना (अर्थात् मनुष्य वही है) कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं, कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उस का नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे। अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उस (मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जायें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवें।’

 

                इस लेख को लिखने का हमारा प्रयोजन यह बताना है कि हमें दुष्ट प्रवृत्तियों के लोगों से कदापि मित्रता व संगति नहीं करनी चाहिये। यदि करेंगे तो इसके दुष्परिणाम हमें प्राप्त होंगे। इसके स्थान पर हमें यथासम्भव सज्जन, सच्चे धार्मिक तथा विद्वान लोगों की ही संगति व मित्रता करनी चाहिये। इससे जीवन में बहुत लाभ होता है। सद्ग्रन्थ भी हमारे सच्चे मित्रों के समान होते हैं। अतः हमें वेद सहित सत्यार्थप्रकाश, उपनिषद, दर्शन, विशुद्ध मनुस्मृति, शुद्ध रामायण एवं शुद्ध महाभारत आदि सद्ग्रन्थों का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। इससे हमारा यह लोक एवं परलोक सुधरेगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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