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जजों ने मीडिया के सामने आकर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगायी

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05 Dec 18
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जजों ने मीडिया के सामने आकर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगायी (जस्टिस कुरियन जोसेफ का दावा, मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को कोई और कर रहा था!)
भारत की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार 12 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के तीन पदस्थ जजों ने मीडिया के सामने आकर लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगायी थी। उन्हीं तीन जजों में शामिल रिटायर जज कुरियन जोसेफ का दावा है कि उन्हें ऐसा लगा था कि भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को कोई बाहरी शक्ति नियंत्रित कर रही थी। इस कारण वे अपने दो अन्य साथी जजों के साथ पहल खुद मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के पास गये। उन्हें लिखित में अपनी बात कही। मगर जब कोई असर या कार्यवाही नहीं हुई तो मीडिया के माध्यम से देश की जनता से रूबरू हुए।
मीडिया द्वारा यह पूछे जाने पर कि न्यायमूर्ति मिश्रा के मुख्य न्यायाधीश बनने के चार महीने के भीतर क्या गलत हुआ, इस पर जस्टिस जोसेफ ने खलुकर कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के कामकाज पर बाहरी प्रभावों के कई उदाहरण थे, जिनमें चुनिंदा जजों और सुप्रीम कोर्ट व उच्च न्यायालयों के जजों की नियुक्ति के नेतृत्व में बेंचों के मामलों का आवंटन तक शामिल था।
जस्टिस जोसेफ का साफ शब्दों में कहना है कि बाहर से कोई व्यक्ति सीजेआई को नियंत्रित कर रहा था। हमें कुछ ऐसा ही महसूस हुआ, इसलिए हम उससे मिले, उससे पूछा और उससे सुप्रीम कोर्ट की आजादी और गौरव बनाए रखने के लिए कहा। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में विद्रोही जजों ने केसों के आवंटन सहित तत्कालीन सीजेआई मिश्रा के कामकाज पर सवाल उठाया था। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा जस्टिस एच लोया की कथित संदिग्ध मौत की जांच के लिए एक याचिका की सुनवाई भी की गई थी, उस पर भी सवाल उठे थे। बताया जाता है कि जस्टिस लोया की मौत स्वाभाविक नहीं थी और उनकी मौत के पीछे षड़यंत्र था। लोया भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के विरुद्ध मामले की सुनवाई कर रहे थे।
यह अपने आप में बहुत बड़ी और गंभीर बात है, क्योंकि रिटायर जज कुरियन जोसेफ के बयान के संकेत केन्द्रीय सत्ता की ओर हैं। यदि केन्द्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), चुनाव आयोग, मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीवीसी), सीबीआई और न्यायापालिका को भी नियंत्रित करती है तो फिर इस देश का संविधान एवं लोकतंत्र सिर्फ विलाप ही कर सकते हैं! लोकतंत्र को बचाने का जिम्मा जनता पर है।
मगर दु:ख है कि नोटबंदी के कारण कथित रूप से काला धन एक ओर संग्रहित हो चुका है। जिसके बल पर निर्वाचन से पहले ही सत्ता से बाहर बैठे दल को हराने के लिये बिकाऊ उम्मीदवारों की खरीद-फरोख्त जारी है। विधानसभा चुनावों में अनेकों निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता खुलकर यह बात बोल रहे हैं कि अनेक निर्दलीय तथा बसपा@ सहित अनेक छोटे दलों के उम्मीदवार खुद जीतने के लिये नहीं, बल्कि मजबूत तथा जीत सकने वाले उम्मीदवार को हराने तथा भाजपा की अर्थिक मदद से, भाजपा उम्मीदवार को जिताने के लिये चुनाव लड़ रहे हैं।
@ [हक रक्षक दल (HRD) की ओर से यह बात बसपा सुप्रीमो तक पहुंचाई जा चुकी है, मगर कोई कार्यवाही नहीं होना गंभीर रूप से चिंताजनक]
वहीं दूसरी ओर जो आम जनता, भाजपाई सरकार एवं भाजपाई सरकार के पालतू गोदी मीडिया द्वारा गत साढे 4 साल से हिंदू-मुसलमान के दिखावटी, बनावटी एवं काल्पनिक धर्मयुद्ध में उलझाई हुई थी, अब उसे हनुमान में उलझा दिया गया है। जिन जागरूक लोगों को आगे आकर लोकतंत्र को बचाना चाहिये, वे लोग हनुमान के वंश को खोजने में व्यस्त हो गये हैं। जब तक वंश का पता चलेगा, तब तक लोकतंत्र का काम तमाम हो चुका होगा।
भाजपाई नेताओं की भाषा लोकतंत्र तथा संविधान की मर्यादा को तार-तार कर रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी खुलकर धमकियां दे रहे हैं कि तेलंगाना में भाजपा सत्ता में आयी तो ओवैसी को भी निजाम की तरह भागना पड़ेगा। सरकार द्वारा कथित रूप से चुनाव आयोग को नियंत्रित करने के कारण तथा चुनाव आयोग की अनदेखी और लापरवाई के चलते ईवीएम असुरक्षित हैं, जिनसे छेड़छाड़ की संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं।
वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान में संघ तथा भाजपा के कार्यकर्ताओं की ओर से खलुकर धमकियां दी जा रही हैं कि भाजपा को कोई हरा नहीं सकता! जो भाजपा को कोई वोट नहीं देंगे, उन्हें सरकार बनने के बाद सबक सिखाया जायेगा। क्या यह भाषा ईवीएम को नियंत्रित करके जीतने का संकेत नहीं देती है? जिन लोगों पर देश के मुख्य न्यायायाधीश तथा चुनाव आयोग, आरबीआई, सीबीआई एवं सीवीसी को नियंत्रित करने के आरोप लग सकते हैं, उनके लिये ईवीएम को नियंत्रित करना कौनसी बड़ी बात है?
इन हालातों में देश, संविधान और लोकतंत्र को बचाने का जिम्मा हम जागरूक लोगों का है। मत की ताकत आम जनता के हाथों में है। जिसे अपनी ताकत दिखानी होगी। बेशक विधानसभाओं के चुनाव ईवीएम के साथ छेड़छाड़ के साये में हो रहे हैं, लेकिन इसके बावजदू भी जनता को एकजुट होने की जरूरत है, क्योंकि लोकतंत्र में एकजुट जनता की ताकत के सामने झुकना सत्ता की मजबूरी है।
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