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भारत कभी पराधीन नहीं रहा-प्रो.कुसुमलता केड़िया

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12 Aug 18
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भारत कभी पराधीन नहीं रहा-प्रो.कुसुमलता केड़िया बीकानेर । श्रीलालेश्वर महादेव मन्दिर, शिवमठ, शिवबाड़ी के अधिष्ठाता पूज्य स्वामी संवित् सोमगिरिजी महाराज की अध्यक्षता में पर्यावरणीय एवं आध्यामिक चेतना की जागृति एवं संवर्द्धन में कार्यरत मानव प्रबोधन प्रन्यास द्वारा आयोजित चार दिवसीय प्रबोधन व्याखान माला की श्रृंखला के द्वितीय दिवस का शुभारंभ आज सायं 6 बजे कार्यालय जिला उद्योग संघ में दीप प्रज्जवलित, सरस्वती पूजन तथा यति स्तुति के साथ हुआ। उसके बाद प्रो. रामेश्वर मिश्र ‘पंकज’, प्रो. कुसुमलता केड़िया एवं स्वामीजी श्री सोमगिरिजी महाराज का श्री मधु आचार्य आशावादी, श्रीराम अग्रवाल, बाबूलाल सांखला, डॉ घनश्याम सिंह, डॉ दिग्विजय सिंह, हरीश शर्मा, मंजू शर्मा, डॉ बेला भनोत ने शाल व माल्यापर्ण कर स्वागत किया। कार्यक्रम के द्वितीय दिवस में अग्रणी समाज वैज्ञानिक एवं विकास अर्थशास्त्री प्रो. कुसुमलता ने भारत कभी पराजित नही रहा - के बारे में प्रकाश डालते हुए कहा कि 19 वीं एवं 20 वीं शताब्दी में एक औपनिवेशिक वृन्तात रचा गया भारत की पराधीनता का। 1860 के पहले भारत पराधीन है ऐसा कोई उल्लेख कहीं नहीं मिलता। जर्मनी के उदय के बाद इग्लेण्ड को लगने लगा था कि यह औपनेवेशिक ढांचा टूटने वाला है । भारत पुनः अपने विराट साम्यर्थ के साथ प्रकट न हो इसके लिए कई कुचक्र रचे गए जिसमें (1) एक था झूठा इतिहास लिखना। (2) दूसरा था देश का विभाजन (3)तीसरा था 1935 के इंडिया एक्ट को संविधान के रूप में स्थापित करना और इसके लिए चौथा (4) नेहरू को देश पर प्रधानमंत्री के रूप में थोप देना और पांचवा था (5) योद्धा राष्ट्र भारत को गांधी के द्वारा अहिंसक व शान्ति का पूजारी प्रसारित करवाना।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में स्वामी संवित सोमगिरिजी महाराज ने कहा कि भारत का अर्थ है प्रकाश अर्थात् आध्यामिक चेतना और दिव्य चेतना ज्योति की साधना में रत राष्ट्र। हमें अपने स्व का, अपने आत्म स्वरूप का और अपने वास्तविक सत्य स्वरूप का स्मरण और प्रचार करना चाहिए तथा अपने विद्यार्थियों और भावी पीढि को उस सत्य का ही ज्ञान देना चाहिए । आरोपित प्रचारों से स्वयं को मुक्त रखते हुए सत्य और धर्म में प्रतिष्ठ होने में ही हमारे जीवन की सार्थकता है उसके लिए ज्ञान और तप की आवश्यकता है जैसा कि आज की प्रमुख वक्ता प्रो. कुसुलता केड़िया जी के जीवन में हम देखते हैं। हमें फैलाए हुए अंधकार को चीर कर प्रकाश की ओर बढ़ना है।

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