सेहत सँवारते और सौन्दर्य निखारते हैं आभूषण -  कल्पना डिण्डोर  

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18 May 19
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सेहत सँवारते और सौन्दर्य निखारते हैं आभूषण -  कल्पना डिण्डोर   

आभूषण पहनना मानव का सदियों पुराना स्वभाव नैसर्गिक रहा है। फिर महिलाओं में तो आभूषण पहनने की प्रतिस्पद्र्धा लगी ही रहती है। हर कोई चाहता है जेवरात पहना और सज -धज कर  अपने व्यक्तित्व को निखारना  ।

जेवर महिलाओं का धन है। प्रत्येक महिला चाहे व अमीर हो या गरीब वह अपनी हैसियत के मुताबिक जेवर का प्रयोग अवश्य करती है। महिलाओं के तन को चार चाँद लगाने में जेवराें की अपनी खास भूमिका रही है।

जेवर न सिर्फ महिलाओं व पुरुषों के तन को सुशोभित करते हैं बल्कि ये एक्यूप्रेशर का काम भी करते हैं। जेवराें का चलन आज का नहीं, मानव सभ्यता के शुरूआती दौर से किसी न किसी रूप में बना हुआ है। सदियों से चला आ रहा यह शौक पहले सम्पन्नता का प्रतीक भी हुआ करता था लेकिन अब यह आधुनिक परिवेश के अनुरूप सौन्दर्य को बहुगुणित करने के जरूरी कारक के रूप में ढलने लगा है।

अब तो जेवरों का प्रयोग ज्यादातर रूप में फैशन के रूप में लिया जा रहा है। यहाँ यह समझना जरूरी है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की युगों पुरानी परम्पराओं में आभूषणों का महत्व विज्ञान की कसौटी पर भी परखा गया है। पुराने समय में महिलाएं व पुरुष अपने शरीर के प्रत्येक हिस्से में ज्यादा से ज्यादा जेवर पहनना पसन्द करते थे। इसका कारण यह था कि हमारे बुजुर्गों को अच्छी तरह पता था कि जेवर एक प्रकार से एक्यूप्रेशर का काम भी करते हैं।

पुराने समय में महिलाएँ अपने पैरों की सभी अंगुलियों बिछुड़ियां पहनती थीं जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों से उनका जुड़ाव होने के साथ ही इन अंगों के एक्यूप्रेशर केन्द्रों पर लगातार दबाव पड़ने से शरीर के तमाम अंगों को अनजाने ही एक्यूप्रेशर चिकित्सा का लाभ मिलता था और यह स्ति्रयों के शारीरिक सौष्ठव की रक्षा करने के साथ ही प्रतिरोधक शक्ति का अनवरत सृजन कर उन्हें बीमारियों से बचाता था। इससे बिना कुछ दवाई लिए शरीर की तकलीफ और दर्द हवा हो जाते थे।

इसी प्रकार नाक में पहने जाने वाली नथ से साइनस व नाक से जुड़ी व्याधियों में भी फायदा होता था। कान में पहने जाने वाले जेवरों में कर्णफूल, टॉप्स आदि पहनने के साथ ही कान के ऊपर तीन-चार तरह के छेद करवा कर सभी में कर्णफूल पहने जाते रहे हैं जिससे साँस, अस्थमा जैसी बीमारियों में लाभ देखा गया है। आज भी कुछ बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए कान की विशेष नस या एक्यूप्रेशर केन्द्र बिन्दु को छिदवाने की परम्परा बनी हुई है। इससे लोगों को लाभ भी होता देखा गया है। हाथ-पैरों में पहने जाने वाले सोने-चाँदी के कड़े भी एक्यूप्रेशर का काम करते हैं।  

जेवरात के अलावा कई चीजें ऎसी हैं जिन्हें हम शरीर पर धारण करते हैं। आभूषण आदि हमें शोभा देते हैं लेकिन हममें से अधिकतर लोग इन आभूषणों से होने वाले नुकसान से अनभिज्ञ हैं।

बहुतेरे लोग आभूषणादि धारण करने में अपनी शान समझते हैं पर इनकी देखभाल या इससे होने वाले नुकसान के प्रति बेपरवाह होते हैं। गले में चैन, हार, मालाएँ, नाक में नथ, कान में बाली, कर्णफूल, कमर में कन्दौरा, पायजेब, चूड़ियाँ, कंगन. अंगूठियाँ, पकड़ा बिछड़ी, हंसली, जूड़े, झूमकी आदि सोने-चाँदी या कृत्रिम धातुओं से बने जेवर आमतौर पर महिलाएँ पहनती हैं। पुरुष प्रायः गले में चैन, अगूठियाँ, कड़े आदि पहनते हैं।

हम रोजाना स्नान अवश्य करते हैं लेकिन हममे से काफी संख्या में लोग ऎसे हैं जिन्होंने कभी इस ओर ध्यान दिया ही नहीं कि हमारे जेवरातों में कितना मैल जमता जा रहा है। महिलाएँ घर-गृहस्थी के काम करती हैं। ऎसे में आटा गूंथने से लगाकर अन्य कामों को करने में अंगूठियों, चूड़ियों आदि में मैल जम जाता है। जल्दबाजी में सफाई से साबुन भी लगा रह जाना स्वाभाविक है। 

इसी तरह नियमित देखभाल के अभाव में पुरुष हो या महिलाएं, इनके जेवरों में गन्दगी जमा हो जाती है। इसका सीधा असर उनकी सेहत पर पड़े बिना नहीं रहता।  इससे जेवरों का सौन्दर्य तो क्षीण होता ही है, इसे पहनने वाले की शारीरिक अंगों की साफ-सफाई के प्रति लापरवाही भी दूसरों को स्पष्ट झलक जाती है।

बहुत बड़ी संख्या ऎसे लोगों भी है जो जनेऊ, गले, हाथ, कलाइयों आदि में धागे पहनते हैं, हाथ में मोरीलसा(काण्डा) बांधते हैं अथवा रूद्राक्ष, तुलसी, चन्दन आदि की मालाएं पहनते हैं। लेकिन देखा यह गया है कि ज्यादातर लोग इनकी नियमित साफ-सफाई पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। आप अपने आस-पास ऎसे लोगों को देखते होंगे जिनके जनेऊ या कलाई में बंधे मोरीलसा(काण्डा) पर जमी गंदगी को देखकर आपको घिन आती है।

सफाई के अभाव में आभूषणों आदि पर जमा गंदगी में महीन कीटाणु पड़ जाते हैं जो इनके सम्पर्क में आने वाली त्वचा पर संक्रमण शुरू कर देते हैं। इसका अन्दाजा हमें तब चलता है जब संक्रमण का जोर बढ़ने लगता है और सफेद धब्बे या अन्य चिह्न दिखाई देने लगते हैं। कई बार चर्म के संक्रमण से त्वचा खराब हो जाती है और खुजली  के साथ लाल-लाल दाने या चकत्ते निकल  आते  हैं, जिससे  एग़्िजमा तथा अन्य त्वचा रोग भी पैदा हो जाते हैं।

कई बार लम्बे समय तक पहनने वाले जेवरों से चमड़ी पर काले धब्बे पड़ जाते हैं अथवा त्वचा गल जाती है। इन स्थानों पर गौर से परीक्षण करवाया जाए तो सूक्ष्म कीटाणुओं का संक्रमण भी देखा जा सकता है।

जेवर पहनना जहाँ एक कला है वहीं उनकी जरूरी सार-संभाल व साफ-सफाई इससे भी बड़ा हुनर है। हमें चाहिए कि रोजाना नहाते समय पहने गए जेवरों को रगड़ कर साफ करें ताकि उसमें किसी भी मात्रा में गन्दगी जमा नहीं रहे। इसके साथ महीने में एक बार सभी जेवरों को निकाल कर गरम पानी में वॉशिंग पाउडर मिलाकर ब्रश से रगड़ कर साफ कर लेना चाहिए। इसके अलावा चाँदी के जेवराें को साफ करने के लिए अरीठा का प्रयोग करना सबसे सस्ता व उत्तम  है। इससे साफ करने से कितना भी पुराना जेवर हो वो नये की तरह चमकने लगता है। 

जेवरों को धारण करने के साथ ही इनकी नियमित सार-संभाल पर ध्यान दिया जाए तो ये जेवर आपके तन-बदन के सौन्दर्य को बहुगुणित करने के साथ ही एक्यूप्रेशर का लाभ भी दे सकते हैं। शरीर के साथ पहने गए जेवरों की साफ-सफाई को अपनी आदत में शुमार कर हम अपनी सेहत को बेहतर बनाते हुए सौन्दर्य निखारने में कामयाबी पा सकते हैं।


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