
उदयपुर। प्रसिद्ध पाश्र्व गायक अमित कुमार ने कहा कि नए दौर और तकनीक की जुगलबंदी मे आत्मा का संगीत मर गया है। हारमोनियम के साथ आज कौन सुर छेड़ता है और कौन उस गहराई वाले संगीत के माध्यम से सीधे भगवान से जुड़ पाता है। आज तो बटन का युग है, दबाओ और चाहे जैसा रिदम पाओ। सुनने मे वो अच्छा तो लगता है लेकिन...? गुजरे जमाने के बेहतरीन फनकार किशोर दा के पुत्र अमित कुमार शनिवार को उदयपुर प्रवास पर मीडिया से मुखातिब होते हुए कुछ ऎसे ही शब्दों के साथ बदले दौर मे बिगड़े सुर और ताल पर अपना दर्द बयां कर रहे थे। वे उदयपुर मे लायंस क्लब की संगीत संध्या के लिए आए हुए थे। उनका मानना है कि नए युग मे अच्छा तो हुआ लेकिन बिगड़ा बहुत कुछ है। व्यावसायिकता के कारण संगीत अब सिंथेटिक हो चुका है।
'दु:खी मन मेरे...' और 'कोई हमदम ना रहा...' जैसे सदाबहार गीतों को वे अपने पिता किशोर दा की श्ृं?ाला के बेहतरीन तराने मानते हैं। उनको मलाल इस बात का है कि संगीत प्रेमी आज भी किशोर दा के उन्हीं नगमों को पसंद करते हैं जो सालों से उनके लबों पर हैं, जबकि गीत तो एक से एक और भी हैं कि सुनते ही जाओ बस।
उन्होंने चुटकी लेते कहा कि वे गुमनाम गीत सुना दूं तो लोग सो जाएं। अमित ने कहा कि आज परिश्रम कोई नहीं करना चाहता। हमारे दौर मे मुझे ले लीजिए या फिर सुरेश वाडेकर, शैलेन्द्र कुमार, नितिन मुकेश व उदित नारायण को ही ले लो। रिहर्सल मे दम निकल जाता था लेकिन तब संगीत निखरता तो लोगों की जुबां से हटाना मुश्किल हो जाता था। आज का संगीत आता है और फुर्र हो जाता है। वह दौर ऎसा खत्म हो गया कि कुछ कल्पना भी नहीं कर सकते। आज गा रहे हैं परफॉर्म करने के लिए, दिल से जुड़ने और दिल से जोड़ने के लिए नहीं।