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धर्म पर आने वाले सकंट के समय समाज एकजुट होःसुप्रकाषमति माताजी

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23 Oct, 17 08:29
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धर्म पर आने वाले सकंट के समय समाज एकजुट होःसुप्रकाषमति माताजी उदयपुर। गणिनी आर्यिका सुप्रकाषमति माताजी ने कहा कि धर्म पर आने वाले संकट के समय समाज को एकजुट को हो ना चाहिये ताकि विरोधी ताकतें हावी नहीं हो पायें।
वे आज हिरणमगरी से. ५ स्थित वाटिका में संयम उपरण पिच्छी परिवर्तन, वर्शायोग निश्ठापन आदि कार्यक्रमों के समापन पर आयोजित धर्मसभा में उपस्थित हजारों को श्रावक-श्राविकओं को संबोधित कर रही थी। उन्हने कहा कि जैन समाज को त्याग, तपस्या के लिये एकजुट होना चाहिये। संत पर दाग लगने पर पीडा होती है। संतो के खिलाफ मोबाईल पर आने वाले संदेष को आगे नहीं भेजना चाहिये। अब भी यदि जैन समाज एकजुट नहीं हुआ तो आने वाले समय में दिगम्बर जैन साधु-संत भ्रमण नहीं कर पायेगा।
कलष स्थापना एवं पिच्छी परिवर्तन समारोह में बोलियों पर लगे प्रतिबंध- सुप्रकाषमति माताजी ने कहा कि यह अफसोस के साथ कहना पड रहा है कि वर्तमान में समय में समाज देष में ऐसे साधु संतो की खोज कर अपने यहंा वर्शावास कराता है जिनके माध्यम से समाज में धन को एकत्रित किया जा सकें। वर्शायोग के समय होने वाले कलष स्थापना एंव समापन पर होने वाले पिच्छी परिवर्तन समारोह में लगने वाली लाखों रूपयें की बोलियों पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिये और इसकी षुरूआज इस वर्शा योग से की है। इस वर्शा योग में न तो कलष स्थापना पर और न हीं आज किसी भी प्रकार की बोली लगायी गई। पुर्ण्याजकों को कलष एवं पिच्छी प्रदान की गई। उन्हने कहा कि समाज संतो का इस्तेमाल कर अपनी आय को बढा रहा है। पिच्छी संयम का उपकरण ओर अहिंसा का ध्वज है जिसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता है।
कलष की बोली से ंसतो के चरित्र का आंकलन करना गलत परम्परा- कलष स्थापना के समय लगने वाली बोली से संतो के चरित्र का आंकलन किया जाता है जो यह परम्परा गलत है। इसे बंद किया जाना चाहिये। कलष की बोली एक सामाजिक व्यवस्था है। उस आयोजन को लेकर यदि कोई दानदाता मिल जाये तो फिर बोलियंा नहीं लगायी जानी चाहिये।
उन्हने कहा कि पैसा और साधु को एक साथ जोड कर नहीं देखा जाना चाहिये। उन्हनें सभी का आव्हान किया कि वर्तमान में पंचम काल चल रहा है। आप को विचलित नहीं होना है। अभी तो धर्म पर और संकट आयेंगे। उनका मुकाबला करना होगा। जैन साधु संकट की गली से गुजर रहा है। साधु-संतो का ध्यान रखा जाना चाहिये।
इस अवसर पर आर्यिका सुगीतमति माताजी ने कहा कि मन के नियंत्रण में नहीं होने पर मनुश्य स्वास्थ्य, सम्पत्ति एवं सत्ता का सुख प्राप्त करने के बावजूद दुखी हो जाता है। ईष्वर से मांगना है तो मन को नित्रयंण में करने की षक्ति मांगनी चाहिये। साधु सदैव प्रसन्न रहते है क्योंकि उन्हने अपने मन को नियंत्रित करना सीख लिया है।
सुप्रकाष ज्योति मंच के राश्ट्रीय संयोजक ओमप्रकाष गोदावत ने बताया कि गुरू मां के प्रभाव के कारण आज समाज के अनेक युवा धर्म से जुड की इसकी राह पर चल पडे है जो समाज के लिये एक सकारात्मक संकेत है।
मंच के अध्यक्ष राजेष बी.षाह ने बताया कि इससे पूर्व प्रातः आठ बजे सुप्रकाषमति माताजी ससंघ हिरणमगरी से. ५ पंहुचे जहंा उनका भव्य स्वागत हुआ। कुण्डलगढ से आये विषेश कलाकारों द्वारा उनकी भव्य षोभायात्रा निकाली गई।
पिच्छी,षास्त्र,वस्त्र हुए भेंट-पाण्डाल में सुप्रकाषमति माताजी,सुगीतमति माताजी , सुहितमति माताजी को राजेष,रमेष बी.षाह एवं परिवार, अषोक,अजित गादडोत,महेन्द्र फान्दोत, महावीर पचोरी ने पिच्छी,केषवललाल, ओमप्रकाष,दिलीप कुमार गोदावत पे षास्त्री,दाडमचन्द दाडम परिवार ने वस्त्र भेंट किये। इस अवसर पर ओमप्रकाष,केषवलाल गोदावत एवं परिवार ने माताजी का पाद प्रक्षालन किया।
संयोजक हीरालाल मालवी ने बताया कि समारोह में माताजी ने वर्शायोग के प्रारम्भ में ध्यानोदय क्षेत्र में स्थापित किये गये मुख्य कलष ओमप्रकाष गोदावत, दर्षन कलष मदनलाल हरावत,ज्ञान कलष हरीष कीकावत,चारित्र कलष बांसवाडा के अषोक बोहरा, तप कलष बांसवाडा के नानालाल,पुश्पाबेन कीकावत, श्रीयंत्र कलष बांसवाडा के ही सुरेष ललित ंसंघवी, तीर्थ क्षेत्र कमेटी कलष राजेष बी.षाह, भक्तामर कलष सुभाश धन्नावत को प्रदान किया गया। मुख्य कलष ओमप्रकाष गोदावत के घर पर माताजी ने स्वयं जा कर वहंा स्थापित कराया।
प्रारम्भ में चन्द्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर के महामंत्री रमेष जूंसंोत ने स्वागत उद्बोधन दिया। श्रीमती अंजू चम्पावत एण्ड पार्टी द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत की गई।

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