
अमेरिका एक पूर्ण विकसित देश कहलाता है, क्योंकि यहाँ व्यक्ति के लिए भौतिक संसाधनों की भरमार है। आम व्यक्ति के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की यहाँ कोई कमी नहीं है। पानी यहाँ भरपूर है। किसी भी देश के पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए तीस प्रतिशत जंगल होने अनिवार्य हैं और इस अनिवार्यता को यह महाद्वीप पूर्ण करता है। यहाँ इतने गहरे और बडे जंगल सुरक्षित देखकर आश्चर्य होता है। यहाँ के सारे मकान लकडी से बनते हैं, लेकिन जंगल नहीं कटते। लकडी आती है अविकसित या विकासशील देशों से। प्रकृति यहाँ पूर्ण रूप से अटखेलियाँ करती है। एक तरफ विशाल पहाडों की दीवार से आरक्षित समुद्र, तो दूसरी तरफ सफेद बालू पर बल खाता, सफेद झाग उडाता, नीला समुद्र। केलिफोर्निया में समुद्र के मुहाने पर एक गहरा जंगल है रेड-वुड जंगल। मीलों तक पसरा यह जंगल, दो हजार वर्ष पुराने पेडों का संरक्षक बना हुआ है। पेड के तने की चौडाई चार आदमियों के हाथ फैलाने से भी पकड में नहीं आए और लम्बाई तो ३०० फीट से भी अधिक। कई पेड नीचे से खोल मात्र रह गये हैं लेकिन ऊपर से पुनः हरे हो गए हैं। भारत के जंगल और यहाँ के जंगलों में रात-दिन का अंतर है। भारत में जंगलों में कई प्रकार के पेड मिलते हैं, लेकिन यहाँ केवल रेड वुड। पशु और पक्षी भी आमतौर पर यहाँ नजर नहीं आते। शाम पडी तो सोचा की अपने तरह ही पक्षियों का कलरव सुनने को मिलेगा, लेकिन नहीं, शाम को भी यहाँ शान्ति ही थी। फिर पेडों को देखा, देखा वहाँ फल नहीं थे, जब फल ही नहीं है तब पक्षी क्या करेंगे, यहाँ आकर ?
शहर में भी ऐसे पेड नहीं हैं जहाँ पक्षी अपना बसेरा कर सके। बस कभी-कभी कबूतर दिखायी दे जाते हैं। दूसरे जानवरों का देखना तो दुर्लभ ही है। गाय और कुत्ते को रोटी देना तो यहाँ चाँद-सितारे तोडने के समान है। ताजा दूध के लिए मन मसोस कर रह गए और केन बन्द पुराने दूध को पीने के लिए मन को तैयार नहीं कर पाए। लेकिन फिर सेनफ्रांसिस्को के पास के समुद्री क्षेत्र जाते समय देखा कि दूर-दूर तक वीराना छाया हुआ है। दूर से देखा तो घास के इन वीरान पहाडों पर कुछ काले धब्बे चलते से दिखायी दिए। कार जैसे ही पास गयी और मुँह से खुशी की आह निकल गयी, अरे ये तो गायें हैं। फिर तो वहाँ बस गायें ही गायें थीं। सोचा उनके फार्म हाउस में जाकर ताजे दूध की मांग कर ली जाए। मन ताजा दूध के स्वाद की कल्पना में खो गया, लगा कोई कहेगा कि बैठो और चाहे जितना दूध पीओ। लेकिन हमें निराशा ही हाथ लगी, ताजा दूध का रिवाज नहीं है तो नहीं है। पहली बार वहीं पहाडों पर हिरण भी दिखायी दिए, लगा कि जंगल जीवन्त हो उठा है। अमेरिका में प्रकृति को न केवल सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया है अपितु उसे दर्शनीय बनाने का भरपूर प्रयास भी किया है। समुद्र के हर कोने की सुन्दरता को विभिन्न कोणों से दिखाने का एक सफल प्रयोग है यहाँ। रुको बाहर कोई आ गया है, अरे यह तो प्लम्बर है। कल से नल टपक रहा था। एक सवा छः फीट का आदमी अपना पूरा किट लिए आया और चुपचाप अपना काम करने लगा। हमारे यहाँ पाँच या सवा पाँच फीट का आदमी आता और न जाने कितनी बातें करते हुए नल का टपकना बन्द करता है। कभी-कभी लगता है कि अमेरिका में सब कुछ है लेकिन सुख और दुःख बाँटने वाला कोई नहीं। बतियाने वाला कोई नहीं। रास्ते चलते देखकर सब मुस्कान फेंक देंगे लेकिन बातें किससे करें, मन खोजता ही रहता है। जैसे आकाश में चिडयों का शोर नहीं, वैसे ही धरती पर मनुष्यों की आवाज नहीं। बस हैं तो कारों का काफला, जो दौड रहा है बस दौड रहा है। अष्ट भुजाओं से काली-काली सडकें, उन पर बने रावण के दस सिरों जैसे फ्लाई ओवर और उन पर तेज रफ्तार से दौडती हुईं भाँति-भाँति की कारें। एक कार पास से निकली, अरे यह क्या ? इसमें तो ड्राइवर ही नहीं! दिमाग ने झटका खाया, नहीं यहाँ लेफ्ट-हेण्ड ड्राइव है, ओह ड्राइवर तो दूसरी तरफ है।
लेकिन मैं बात समुद्र की कर रही थी। हमारी कार समुद्र किनारे घुमावदार सडक पर सरपट दौड रही थी। जरा सा चूके नहीं कि कार पानी में। बार-बार डर के मारे पूछते ही रहे कि बेटा अब कितना रास्ता और है ? वीराना क्षेत्र आने लगा, नंगे पहाड, बस उन पर सूखी घास। केवल यहाँ गाय और घोडों के तबेले ही हैं। पूरा क्षेत्र सुरक्षित रख छोडा है। रास्ते में समुद्र की सुन्दरता निहारने का मन हो जाए तो रुकिए, रास्ते में विस्टा पोइन्ट बने हुए हैं, यहाँ ही अपनी गाडी रोकिए और देखिए समुद्र को उफनते हुए, लहराते हुए, इठलाते हुए। हम अपनी मंजल पर जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहते थे, हवाएँ तेज बहने लगी थीं और ठण्ड भी अपनी तासीर दिखाने को बेताब थी। सेनफ्रांसिस्को में गोल्डन ब्रिज है। समुद्र के ऊपर बना हुआ। उसका नाम गोल्डन क्यूँ है, यह पता नहीं चला। क्योंकि न तो उसका रंग गोल्डन है और न ही वह गोल्ड से बना है। हो सकता है कि अमेरिका के गोल्ड युग की शुरुआत उसके निर्माण के साथ ही हुई हो। वैसे भी अमेरिका की प्रगति १९३६ के बाद की ही वहाँ नजर आती है। जहाँ भी गए लगभग १९३६ का निर्माण ही दिखायी दिया। खैर हम गोल्डन ब्रिज की बात कर रहे थे। वहाँ से समुद्र को निहारना ऐसा लगता है जैसे आप मसूरी की ठण्ड में बर्फीली पहाडयों के स्थान पर ठहाका मारते हुए समुद्र को देखें। कभी कल्पना नहीं की थी कि समुद्र किनारे भी इतनी ठण्ड होगी ? लेकिन यहाँ तो लग रहा था कि शीघ्रता नहीं की तो कुल्फी जम जाएगी। एक तरफ समुद्र था तो दूसरी तरफ पहाड और आकाश से बादल आ-आकर पहाडों से टकरा रहे थे। कभी गोल्डन ब्रिज के दरवाजे की ऊँचाई एक मंजला हो जाती और जैसे ही बादलों से लुका-छिपी खेलता हुआ सूरज हमें �ता� कह देता तो हमें दिखाई देता कि अरे यह ब्रिज तो बहुत ऊँचा है। सिर को पीछे करो, और करो, जितना कर सकते हो करो, तब आप उसकी ऊँचाई नाप सकेंगे। अरे मैं फिर कहाँ भटक रही हूँ, मैं तो समुद्र के उस दूसरे किनारे पर जाने के लिए निकली हूँ जहाँ से चालीस मील की दूरी पर चल रहे जहाज अपनी मंजल को पा लेते हैं। समझ गए न, मैं लाइट हाउस की ही बात कर रही हूँ। मैं समुद्र किनारे, रास्ता दिखाते आकाशदीपों को सर उठाकर खडा होते हुए देखती रही हूँ, लेकिन यह भी दर्शनीय महत्त्व का हो सकता है, इस पर कभी विचार नहीं किया था। लाइट हाउस की केयर टेकर ने जल्दी से कहा कि �गो सून, इट इज गोइंग टू बी क्लोज�। नीचे देखा, अरे बाप रे तीन सौ सीढयों को पार करके नीचे जाना था, खैर उतर तो जाएँगे लेकिन क्या ये जंग खाए घुटने वापस चढ पाएँगे? चलो जो होगा देखा जाएगा, आकाशदीप हमें पुकार रहा था, हमेशा दूर से ही इसे देखा है, आज पास से देखने का मौका मिला है तो फिर घुटने को तो भूलना ही पडेगा। एक सुंदर सी गाइड दिखा रही थी पुराने लाइट-हाउस की नयी, साफ-सुथरी मशीन को। अब तो इलेक्ट्रोनिक का जमाना आ गया तो पास ही दूसरी लाइट लगा दी गयी थी और इसे पुराने वैज्ञानिकों को याद करने के लिए छोड दिया गया था। चालीस मील दूर से जहाज इन लाइटों को देख पाते हैं और शहर आ रहा है, इस बात की खुशी मना सकते हैं।
पहाडों पर कहीं-कहीं केसरिया रंग बिखरा हुआ था, अरे यहाँ हनुमान जी कहाँ से आ गये ? नजदीक गए, हाथ लगाकर देखा, अरे ये तो एल्गी है। हमारे यहाँ हरे रंग की होती है और यहाँ केसरिया है। यहाँ समुद्र के पानी को हाथ लगाने की मनाही है, लगाएँगे भी तो कैसे ? एक तरफ तो पहाड है, वहाँ से आप उतर नहीं सकते, और दूसरी तरफ मीलों तक फैली छोटी लेकिन वीरान पहाडयाँ। समुद्री किनारा भी है और यह किनारा तकरीबन तेरह मील लम्बा है। ऊपर से समुद्र का और न ही उसके किनारे का कोई छोर दिखाई दे रहा था। बस दिख रहा था तो सफेद बालू रेत के सुनसान तट पर आँचल लहलहाता समुद्र। आँचल भी कैसा? सम्पूर्ण विस्तार नीले रंग का और जब आँचल लहराए तो सफेदी जगमगा उठे। दूर-दूर तक कोई जानवर नहीं। हमारी आँखें तलाश रही थीं, पहाड पर छिपे किसी जंगल के जानवर को। तभी आँखों ने जंगल की जीवन्तता को पा ही लिया, एक नहीं पूरे पाँच हिरण वहाँ बडे ही धैर्य से घास खा रहे थे। इन हिरणों में चौकन्नापन नहीं था, यहाँ शेर नहीं थे। पहाड के दूसरी तरफ समुद्र की खाडी थी। यहाँ समुद्री पक्षी आकाश से सीधे ही समुद्र में छलांग लगाते और अपनी चोंच को पूरा समुद्र में डुबाकर अपना नन्हा सा शिकार खोज ही लेते। अपनी काली मूँछे निकाले उदबिलाव भी उचकते हुए दिखायी दे गए। गोल्डन ब्रिज के समुद्र किनारे पर हजारों की तादाद में समुद्री पक्षी थे। उनका शोर शाम को खामोश समुद्र को भी मदमस्त करने पर मजबूर कर रहा था। वे सब उड रहे थे, एक साथ हजारों। समुद्र खुश हो रहा था, अपनी बाँहें फैलाकर आगे बढ रहा था, चाँद पूर्ण यौवन के साथ उन्हें देख रहा था। पक्षी समुद्र के अंग-अंग को प्रफुल्लित कर रहे थे, उसके विशाल सीने पर अठखेलियाँ करते हुए आगे बढते जा रहे थे। कभी इस छोर पर और कभी उस छोर पर, पक्षियों का कलरव गूँज रहा था। समुद्र खुशी से उछलता और अपने साथ ले आता समुद्री वनस्पतियाँ। भारत के समुद्री किनारों पर शंख मिलेंगे, सीप मिलेंगी लेकिन यहाँ टूट कर आयीं कुछ बेले ही मिलेंगी।
ठण्डी हवाएँ तन को लग रही थीं और मन कहीं चाय और पकोडे वाले को ढूँढ रहा था। यहाँ कहाँ पकोडे ? किनारे पर खूब लम्बी वुड-वाक है, यहाँ खाने-पीने को बहुत कुछ है, लेकिन अपने पकोडे नहीं। रेत पर टहलिए, पाँवों में मिट्टी लेकर घर बनाइए लेकिन चना-जोर-गर्म की आवाज लगाकर कोई लडका आपको कुछ खाने पर मजबूर नहीं करेगा। रेत पर खोमचे वाले भी नहीं हैं तो गंदगी भी नहीं है। लेकिन फिर भी जिधर देखो उधर डस्टबीन ही डस्टबीन रखे हैं। आदमी फेंकना चाहे तो भी न फेंक सके। कभी यहाँ आकर मन होता है कि मूँगफली खायी जाए और उनको हाथों में मसलकर, फूँक मार कर, छिलकों को उडाया जाए। लेकिन सारे सुख कहाँ परायी धरती पर ? एक दिन ऐसी ही एक यात्रा पर निकले थे, देखा रास्ते में फल-सब्जी की दुकान सजी है। हम भी कार को उधर ही मोड ले गए। चेरी, स्ट्राबेरी से लेकर कितने ही जाने-अनजाने फल और सब्जियाँ यहाँ थी। यहाँ कुछ पसन्द आया हो या नहीं लेकिन यहाँ की चेरियाँ लाजवाब हैं। ढेर सारी खरीदी गयी और घूमते-घूमते वहीं खाना शुरू किया गया। खाने के बाद पहली बार गुठली को हवा में मुँह से फेंकते हुए जो मन को आनन्द आया वह अनूठा था। लगा जैसे आज जंजीरें टूट गयी हों। समुद्र किनारे पहाड पर चढकर केला खाओ और उसे केले के छिलके को हवा में नहीं उछालो तो फिर केले खाने का मजा ही क्या ? लेकिन यहाँ तो डर इतना हावी है कि सुख लेने ही नहीं देता। घुमावदार पहाडी रास्ता, अपने यहाँ लिखा मिलेगा �हार्न बजाएँ� और यहाँ हार्न बजाना तो जैसे रात को मंदिर में घण्टी बजाना। सभी को अपनी लेन में चलना है, ओवर टेंकिग नहीं। सडक पर पीली लाइन खींच दी गयी है, यदि दो लाइने हैं तो आप ओवर टेंकिग नहीं कर सकते। हाँ डोटेड पीली लाइन है तब आप ओवर टेंकिग कर सकते हैं। सडक किनारे साइनबोर्ड लगे हैं स्पीड के लिए, कहीं तीस, कहीं पचास तो कहीं पैंसठ। ज्यादा बढाई नहीं कि कैमरे ने आपको पकड लिया और चालान की टिकट मिल गयी। न मंत्री पुत्र और न ही अफसर पुत्र। चढाई वाले रास्ते पर जा रहे थे, तीस की स्पीड निर्धारित थी। आगे गाडयाँ उसी रफ्तार से चल रही थीं, हमें थोडी जल्दी थी, वैसे भी भारतीयों को जल्दी ही रहती है, उन्हें पता नहीं कहाँ जल्दी जाना होता है ? यहाँ किसी को कोई जल्दी नहीं होती। चुपचाप लाइन में खडे रहते हैं और काउण्टर वाला धीरे-धीरे, खरामा-खरामा काम करता रहता है। खैर हम जल्दी में थे और शायद हमें गाडयों के पीछे चलना सुहा नहीं रहा था। अरे होर्न दो न, लेकिन होर्न बजाना तो यहाँ वार-त्योंहार ही होता है, फिर? देखा आगे वाली गाडी, जगह देखकर किनारे हो गयी और हम शान से आगे निकल गए। यही है यहाँ आगे निकलने का तरीका। लेकिन यह तरीका केवल गाडयों के लिए ही है, आप वैसे आगे निकल कर दिखाएँ तब जाने।
हम सोचते थे कि हमारे पुरातन भारत में ही टेटू या गोदने का रिवाज है। हम कैसे उन्हें गँवार कहकर मजाक उडाते रहे हैं। कभी भी कोई गाँव से आता और उसके हाथों में या शरीर में गोदने का चिह्व देखते, उसे हिकारत की नजर से हम देखते आए हैं। लेकिन यहाँ देखा कि एक मोटी सी औरत कुछ छोटा सा पहने हुए घूम रही है। यहाँ छोटे की तो परवाह भी किसे है ? लेकिन उसकी पीठ, रंग-बिरंगी हो रखी थी। देखा अरे यह तो गोदना है। पूरी पीठ पर चित्रकारी करायी हुई थी। अब उसे दिखाना है तो फिर ठण्ड में भी छोटे कपडे तो पहनने ही पडेंगे न। महिलाएँ ही नहीं पुरुष भी पूरी पीठ पर या शरीर पर गोदना करवाते हैं। मैं सोच रही थी कि सारे शरीर पर गोदने के लिए तो एनस्थिसीया का प्रयोग करते होंगे, लेकिन नहीं जी, फैशन के लिए इंसान सब बर्दाश्त करता है। अमेरिका में विभिन्न देशों के लोग रहते हैं और सभी एक ही रंग में रंगे दिखायी देते हैं। कपडे खरीदने के लिए एक मॉल में गए, यहाँ अपने जैसे कपडों का बाजार नहीं है। बस सिले-सिलाए कपडे मिलते हैं। एक बार राजस्थान में अकाल पडा, जनजाति क्षेत्र में न तो खाने को और न ही पहनने को। भारत के महानगरों के सेठों ने ट्रक भरकर कपडे भेज दिए। कुछ कपडे नये और कुछ पुराने। लेकिन सभी गाँठों में बंधे थे, इस कारण मुसे हुए थे। जब हमने इन्हें बाँटने के लिए निकाला तो मन किया कि सभी को प्रेस कराकर देने चाहिए। लेकिन वह सम्भव नहीं था, प्रेस कराने के ही हजारों रुपये लग जाते। लेकिन यहाँ मॉल में देखा कि बदरंगे, मुसे-तुसे, फटे हुए कपडे बडे ही मँहगे दामों में मिल रहे थे। बेटे से पूछा कि कबाडी की दुकान है क्या ? लेकिन उसने हँसकर कहा कि यही फैशन है। फिर यही फैशन हो भी क्यों नहीं, सारे ही कपडे मशीन में धुलते हैं और प्रेस का किसी के पास समय नहीं तो एक धुलाई के बाद तो ऐसे ही पहनने हैं फिर नये ऐसे ही क्यों न खरीदे जाएँ! कहाँ भारत के चटक रंग और कहाँ यहाँ के फीके रंग ?
जब कोलम्बस यहाँ आया था तब उसने अमेरिका को ही इण्डिया समझ लिया था और इसी कारण उसने यहाँ के लोगों का नाम दिया था, रेड-इण्डियन। अब यहाँ से रेड शब्द हटता जा रहा है और सब जगह इण्डियन ही लिखा मिलता है। हम पहले तो खुश हुए कि अरे इण्डियन फूड यहाँ है फिर पता लगा कि ये सब रेड-इण्डियन्स के लिए लिखा है। हम जैसे नए लोगों के लिए अन्तर समझना कठिन हो जाता है। लेकिन भारत से आए लोगों ने यहाँ भारतीयों के खाने का पूरा इंतजाम कर रखा है। सभी कुछ उपलब्ध है, बस स्वाद में अन्तर है। यहाँ संकर प्रजाति बनाने का बडा शौक है तो सेब कई प्रकार के, आडू कई प्रकार के और दोनों को मिलाकर अलग से कई प्रकार के फल। तुरई एक-एक हाथ से भी अधिक लम्बी, शिमला मिर्च इतनी बडी की भरवा बनाने का उत्साह ही समाप्त हो जाए। किसी को बैंगन के भुर्ते का शौक हो तो अकेला एक बैंगन का भुर्ता नहीं खा सकता। एक ही बैंगन आधे किलो से अधिक का। प्याज इतने बडे और मीठे, लगता है प्याज खा रहे हैं या फिर ककडी। लहसुन भी इतना मोटा कि एक ही गुली पर्याप्त है सब्जी के लिए। लेकिन जहाँ कुछ फलों में स्वाद की विचित्रता है वहीं कुछ फल निहायत ही स्वादिष्ट हैं। चेरी और स्ट्राबेरी की साइज भी बडी और स्वाद भी लाजवाब। आम भी अब बडी तादाद में आने लगा है, लेकिन मेक्सिको में भी आम होता है तो वहाँ से भी आम और केरी दोनों ही आती हैं। एक केरी आधा किलो से अधिक। हमें बडे-बडे बाजार देखने की आदत है, लेकिन यहाँ बडे-बडे मॉल मिलेंगे। भारत में शाम को लोग बाजारों में घूमते हैं और यहाँ मॉल में। बाजार में ठेले वाले मिलते हैं और यहाँ मॉल में रेस्ट्रा। यहाँ रात को दस बजे बाद जन-जीवन थम जाता है, जबकि भारत में दस बजे बाद शुरू होता है। अमेरिकन्स तो रात आठ बजे ही घर को बन्द कर लेते हैं। उनके रेस्ट्रा भी शाम का खाना रात आठ बजे तक ही परोसते हैं। रात आठ बजे बाद किसी को भी फोन करना तहजीब नहीं है, मिलने जाना तो बहुत दूर की बात है।
Source : डॉ. अजित गुप्ता