
सीधी सी बात यह है कि केवल आपकी सेवाधर्मिता ही सबकुछ नहीं होता, आपकी नीयत भी कसौटी पर हर वक्त हुआ करती है. साथ ही आप जिस भी देश में रहें वहां की रीति-नीतियों, तौर-तरीकों, क़ानून व्यवस्थाओं के प्रति सम्मान, दुनिया में अपने राष्ट्र की अच्छी छवि का निर्माण करना भी हमारे कर्तव्यों में शुमार होता है. आप कभी भी उस देश में सम्मान के हकदार नहीं हो सकते जहां की थाली में खा कर आप उसी में छेद करना शुरू कर देते हों. देशद्रोह के अपराध में छत्तीसगढ़ के एक निचले अदालत में विनायक को उम्र कैद की सज़ा सुनाये जाने और उसके बाद दुनिया भर में प्रायोजित किये जा रहे बवाल के मध्य हमें यहाँ कहने की इजाज़त दीजिए कि मानवाधिकार का पाठ थ्येन-आनमन वाले देश के माओ से सीखने की हमें ज़रूरत नहीं है. वास्तव में दुनिया में हमारी पहचान एक ऐसे ‘साफ्ट देश’ के रूप में है/रही है जो कायरता की हद तक सहिष्णु है. जहां मानवाधिकार एक संस्कृति है.
पहली बात यह कि किसी एक आरोपी के लिए इतना हाय तोबा मचाया जाना उचित है? ऐसे फैसले तो इस देश में रोज होते हैं. बहुत सारे फैसले उपरी अदालतों में जा कर पलट भी दिए जाते हैं. लेकिन इतनी सी बात के कारण हम देश की न्याय प्रणाली को ही कठघरे में खड़े करदें? विनायक सेन के पास तो फ़िर भी वकीलों, पूर्व जजों, प्रोपगंडाबाजों की फौज है. इतनी न्यायिक प्रक्रियायों से तो देश के एक सुविधाहीन आम आदमी को भी गुजरना पड़ता है. लेकिन न्याय का अपना तरीका है, वह अपने ही हिसाब से चलेगी. यह किसी भी व्यक्ति के लिए तो बदलने से रही.
फ़िर दूसरा सवाल यह आता है कि क्या वास्तव में विनायक इतने बड़े नायक हैं जिनके विरुद्ध एक फैसला पर दुनिया भर में देश को बदनाम कर इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाय? जबाब है बिलकुल नहीं. चुकि यहां पर एक रस्म चली है कि अगर आपका कोई कदम देश के खिलाफ हो तो आप हाथों हाथ लिए जायेंगे, अगर आप थोड़ी बदतमीजी से भारत को गाली देने की औकात रखते हों तो आपकी मामूली चीज़ों को भी देवता बना दिया जाएगा. बस केवल इसीलिए विनायाकवादी यहाँ नायकत्व का झांसा देते दीखते हैं. इस रस्म की अदायगी में अभी एक लेखक ने सेन की तुलना महात्मा गांधी से कर दी. सोच कर कोई हंस ही सकता है कि गुलामी के समय में भी सशक्त क्रान्ति का विरोध करने वाले महामानव की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से की जाय जिसे हिंसक संगठनों को बढाबा देने के अपराध में उम्र कैद की सज़ा सुनायी गयी है. ऐसे में तो हमें विनायक की तुलना ओसामा बिन लादेन से करने दीजिए. अगर ये डाक्टर हैं तो ओसामा भी इंजिनियर है. जैसा कि एक लेखक ने कहा है कि सेन चाहते तो मोटी फीस कमा कर चैन से गुजारा कर सकते थे. तो सेन के परिवार का तो नहीं मालूम लेकिन ओसामा तो खरबपति बाप का वारिस है. फ़िर भी उसने आराम की जिंदगी के बदले हिंसा का ऐसा रास्ता अपनाया. अगर बात जन समर्थन की हो तो सेन के समर्थन में कितने लोग हैं यह जानना हो तो उसे छत्तीसगढ़ के ही किसी शहर या कसबे में सड़क पर छोड़ दीजिए. अव्वल तो उन्हे कोई पहचानेगा नहीं और अगर पहचान ले तो फ़िर उस कसबे में इतने टमाटर बरसेंगे की वह सस्ता हो जाएगा. लेकिन ओसामा के समर्थक तो करोड़ों में है. तो क्या इसलिए हम उसके हज़ार खून माफ कर देंगे? अगर आपने कुछ मुट्ठी भर समूहों को अपनी सेवाओं के द्वारा अपना मुरीद भी बना लिया हो तो भी आपको क्या राष्ट्र को ललकारने की इजाज़त दे दी जाय? अभी हाल में कर्नाटक के वीरप्पन के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे बांदीपुर अभयारण्य से गुजरना हुआ. वहाँ पर उसके प्रति अभी भी भक्ति देख कर ताज्जुब हुआ. वीरप्पन के बारे के कुछ टिप्पणी करने के कारण ड्राइवर के हाथों ही बमुश्किल गाली खाते बचा. तो उस समर्थन के बदौलत हम वीरप्पन को मसीहा मान लें? जबकि कई बार तो वीरप्पन हमें नैतिक रूप से इन समूहों से इस मामले में ज्यादा मज़बूत दिखता है कि उसने तो कम से कम कभी किसी विचारधारा के लिए काम करने का दावा नहीं किया. लेकिन विचारधारा की चादर ओढ़कर पूजिवादियों के ही टुकड़े पर पलने वाले नक्सलियों के समर्थक होने का आरोप जिस पर साबित हुआ है उसे हम क्या कहें?
बात अभिवक्ति के आजादी की. छत्तीसगढ़ के बाहर के लोगों को जान कर ताज्जुब होगा कि प्रदेश ने तो इस आज़ादी के मामले में एक मिसाल कायम की है. शायद तब यह पहला मामला होगा जब यहाँ के एक अखबार में बस्तर के नक्सलियों की सबसे बड़ी कमिटी के प्रवक्ता और पुलिस महानिदेशक के बीच सवाल-जबाब के हफ़्तों तक दर्ज़नों आलेख छपे. लेकिन नक्सली प्रवक्ता इस बड़े मंच का उपयोग कर भी केवल इस एक सवाल का सीधा जबाब भी नहीं दे पाया कि आखिर वो कत्ले-आम मचाये क्यू है? मांग क्या है उसकी. सारी बहस बस मार्क्स के कुछ पन्नों और थीसिस, एंटीथीसिस, सिंथेसिस तक सिमट कर रह गयी. आम लोगों को कुछ ही समझ में नहीं आया. तो अब किसको कहते हैं विचार-विमार्श की आज़ादी? बात केवल इतनी है कि इकतरफा चाहे जितना झूठ ये दुनिया भर में राष्ट्रद्रोही ताकतों को इकठ्ठा कर फैला लें, लेकिन हिंसा या उसका समर्थन करने की ज़रूरत इन्हें पड़ती ही इसलिए है क्योंकि इनके पास तर्क नहीं होते. आप उनसे पूछ कर देखिये (जैसा कि श्रीमती एलीना सेन से एक पत्रकार ने फैसले के दिन पूछा था) एक शिशु रोग विशेषज्ञ को बुजुर्ग नक्सल पोलित ब्यूरो सदस्य ‘सान्याल’ का इलाज़ करने के लिए तैतीस बार उससे जेल में मिलने की ज़रूरत क्यू कर होती है? तो बौखला कर ये अग्निवेश की तरह समूचे मीडिया को ही बिका हुआ साबित करना ये शुरू कर देंगे. सवाल यह है कि अगर आपको सेवा ही करना है तो वो करने से रोका किसने है?
विनायक का सेवा या उसका योगदान क्या गांधी, बिनोबा या बाबा आमटे जैसे लोगों द्वारा किये जा रहे कार्यों का पासांग भी है? चित्रकूट में जा कर नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित प्रकल्प देख आइये, बाबा रामदेव के आंदोलनों पर नज़र डालिए, गायत्री परिवार के कामों को देखिये, पानी बचाने वाले राजेंद सिंह पर गौर कीजिये, एक गांव को ही स्वर्ग बना देने वाले अन्ना हजारे जी को याद कीजिये. ऐसे अनेकों संगठन या व्यक्ति काम कर रहे हैं जिन्हें अपनी शानदार उपलब्धि के लिए नक्सलियों को उकसावे की ज़रूरत नही पडी.उसी बस्तर या ओडिशा या ऐसे ही आदिवासी क्षेत्रों में बिना किसी श्रेय की इच्छा किये संघ के विभिन्न संगठनों को काम करते देखिये. वो तो बिना किसी जोनाथन अवार्ड की कामना के अपना काम बदस्तूर संपादित करते रहते हैं. उन्हें मालूम है कि आत्मसंतोष के अलावा उन्हें कुछ नहीं मिलना. छत्तीसगढ़ में आपको ऐसे सेवा भावी लोग और संगठन मिल जायेंगे बात चाहे रामकृष्ण मिशन आश्रम की हो या फ़िर जांजगीर में कुष्ठ आश्रम चलाने वाले संगठन की. इनकी सेवाओं के आगे आपको विनायक जैसे लोग बौने ही दिखेंगे. लेकिन चुकि यह कुछ लोगों को मालूम है कि लोकतंत्र को गाली दो तो सारी शोहरत आपके क़दमों में होगी. जैसे कि तरह कि सैकड़ों महान लेखक साहित्य को समृद्ध करते मर गए लेकिन गाली देने की कुव्वत हो तो एक किताब की बदौलत अरुंधती विश्वविख्यात लेखिका हो गयी.
आप मानवाधिकार हनन का दुष्प्रचार करते हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमिटी आती है उसको ऐसे कोई सबूत नहीं मिलते. आप जन समर्थन की बात करते हैं लेकिन सभी प्रभावित क्षेत्रों में नक्सल फरमान के बावजूद शहरों से ज्यादा मतदान होता है और लोकतंत्र जीत जाता है. ज़ाहिर है दुनिया भर में साख प्राप्त देश का चुनाव आयोग खास कर ईवीएम के ज़माने में खुद ही तो नहीं डाल देगा वोट. तो देश की सभी प्रणाली गलत. हर वो चीज़ गलत जो इनके अनुरूप न हो भले ही वह विभिन्न मानकों पर तैयार की गयी विभिन्न तथ्यों पर कसी गयी हो. ज़मानत मिल जाय तो कोर्ट सही, सज़ा दे दे तो गलत. इनके झूठे प्रेस विज्ञप्ति को अखबार अगर अपना लीड बनाते रहे तो वो ठीक लेकिन अगर सवाल खड़े कर दे तो बिकाऊ. इनके लोग हत्या करें तो ठीक पुलिस कारवाई करे तो मानवाधिकार हनन.
तो इनके कुतर्कों के खिलाफ तथ्यों की कमी नहीं है. जहाँ तक इस फैसले का सवाल है तो निश्चित ही जो भी सच होगा वो सुप्रीम कोर्ट तक से छन कर आ ही जाएगा. बस इस मौके पर इतना ही कहना समीचीन होगा कि लाख कमियों के बावजूद हमारे लोकतंत्र और उसके विभिन्न अंगों में पर्याप्त ताकत है कि वह विडंबना से पार पाए. बुराइयां जितनी हो लेकिन हमें अपना समाधान इसी तंत्र से पाना है. यहाँ के लोकतंत्र को हिटलर वाले चश्मे से देखने वालों की नज़र ठीक कर देने के लिए विधि द्वारा जो भी प्रक्रिया अपनाय जाय वो सही है. कोई लाख चिल्लाये लेकिन आज की तारीख में हमारी प्रणाली द्वारा अपराधी साबित हुआ विनायक हमारे नायक नहीं हो सकते.
Source : visfot.com