गर्भगृह में बैठे नीलकंठ भी गुमसुम

( Read 1061 Times)

20 Feb, 12 11:19
Share |
Print This Page

कालिंजर हूं। खुद इतिहास हूं, लेकिन अतीत नहीं देखना चाहता। चाहूं भी तो देख नहीं पाता। उदास हो जाता हूं। मैं ही क्या, मेरे गर्भगृह में बैठे नीलकंठ भी गुमसुम हैं। जनकल्याण के लिए समुद्र मंथन से निकले हलाहल को कंठ में धारण कर भी मुस्कराने वाले महादेव करें भी तो क्या? समुद्र मंथन से विष निकला तो कालचक्र रोक उन्होंने देवताओं-राक्षसों को यहीं शरण दी। बाद में चंदेल राजाओं ने यहां गर्भगृह में महादेव को प्रतिस्थापित कर मेरा भव्य निर्माण कराया। पहले मोहम्मद गौरी, फिर शेरशाह सूरी, बाद में मुगलों और फिर बुंदेलों, एक हजार से ज्यादा वषरें में तो मुझे खुद भी याद नहीं रहा कि मेरे ऊपर कितने हमले हुए? औरंगजेब की सेना ने मेरा निशान मिटाने की कोशिश की। महादेव के मंदिर में विध्वंस किया, लेकिन मेरा वजूद कायम रहा। अपने गर्भगृह में नीलकंठ के रहने के बावजूद मैं शापित विधवा की तरह खड़ा हूं। अब लोकतंत्र है। देश तरक्की कर रहा है, लेकिन कालिंजर क्या पूरे बुंदेलखंड में तो समय अब सियासत ने रोक दिया है। देश की तरक्की के साथ जब बुंदेलखंड ही कदम मिलाकर नहीं चल पा रहा तो भला मेरे भग्नावशेषों को कौन संभाले? मगर वीरों की धरती बुंदेलखंड को क्या हुआ? शायद यही देखकर महादेव भी उदास होकर विरक्ति भाव में बैठे हैं। वरना तो जिस धरती पर आल्हा-ऊदल की शौर्यगाथाएं सुनकर लोगों की भुजाएं फड़कती हों। जहां के पराक्रमी लाल छत्रसाल ने आततायी औरंगजेब के छक्के छुड़ा दिए। जिस बुंदेलखंड को शूरवीरों की धरती बताकर उसके उत्तर प्रदेश में शामिल होने के फैसले पर पुरुषोत्तम दास टंडन गर्व करते थे। फिर इस वीरों की धरती को क्या हुआ कि अब उसे अपने लोगों का पेट भरने के लिए विश्र्वबैंक या फिर केंद्र सरकार के अनुदान की ओर निहारना पड़ रहा है? क्या-क्या देखना मेरे नसीब में लिखा है। खूब खून बहता देखा, लेकिन कायरता नहीं। मगर धीरे-धीरे बुंदेलखंड का पराक्रम सिर्फ बीहड़ों तक ही सीमित रह गया। उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में आने वाले बुंदेलखंड की वीरता का ठेका डकैतों ने ले लिया। मध्य प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड की बात करें तो मलखान सिंह, तहसीलदार सिंह, मोहर सिंह का आतंक था और अभी हालिया दिनों में उत्तर प्रदेश के हिस्से में ददुवा, कुसुमा नाइन, रागिया और ठोकिया जैसे डकैतों की बंदूके गूंजती थी। बुंदेलखंड की इस नई वीरगाथा पर भला मैं कैसे इतराऊं या फिर नीलकंठ भी कैसे मुस्कराएं। उस पर भ्रष्टाचार के दीमक से नपुंसक हो चुकी बुंदेलखंड की सियासत से यह उदासी जैसे और गहरी हो गई। महादेव तो गंगा को देवलोक से अपनी जटा पर लाए। मगर यहां चित्रकूट मंडल के पाठा क्षेत्र में पानी की कमी से खेतिहर भुखमरी से या खुद जान देकर मर रहे हैं। बावजूद इसके कि पाठा के भूगर्भ में 12 किलोमीटर चौड़ी और 110 किलोमीटर लंबी नदी बहती है। यहां से तीस से चालीस हजार गैलन प्रति घंटे के हिसाब से पानी निकाला जा सकता है। इसके लिए किसी भगीरथ की जरूरत नहीं। बस मुकम्मल योजना को जमीन पर उतारने वाला शासन-प्रशासन चाहिए। ऐसा अगर हो जाए तो सालाना 60 से 70 करोड़ का बजट केवल पेयजल पर होने वाला खर्च बच जाए। साथ ही सूखे से बेहाल बुंदेलखंड में किसानों की मौतों का सिलसिला भी थमे। मगर किसानों के घर टूटी सिसकियां जैसे सत्ता-तंत्र को सुनाई ही नहीं देती। अब आज एक बार फिर मतदान देख रहा हूं। मतदाता क्या लोकतंत्र के नाम पर नए सामंतों और चाटुकारों को सबक सिखा पाएंगे? क्या बुंदेलखंड के लोगों के अंतर्मन में बैठा शिव तीसरा नेत्र खोलकर लालच और भ्रष्टाचार के दैत्य को खत्म कर पाएगा? या फिर लोकतंत्र के इस मंथन से फिर विष निकलेगा, जिसे आम जनता कंठ में धारण कर जीने को मजबूर होगी!
यह खबर निम्न श्रेणियों पर भी है: धर्म कर्म , उत्तर प्रदेश
Your Comments ! Share Your Openion
Latest Videos @ Pressnote.in
Rank #1 :: Italy
Rank #2 :: India
Rank #3 :: Japan
Rank #4 :: Egypt
Rank #5 :: Greece
Rank #6 :: Germany
Rank #7 :: Mexico
Rank #8 :: Peru
Rank #9 :: Thailand
Rank #10 :: Philippines
About Us
Group Edior : Mr. Virendra Shrivastava
Editor : Dr. Munesh Arora
Best Viewed in IE6+, Mozilla 3+ (1024 x 768 px)
For any queries please mail us at :
newsdesk@pressnote.in
Top 11
The Udaipur
CopyRight : Pressnote.in
WCAG