राष्ट्रपिता का स्मरण
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Thursday 15 Oct, 2009 03:56 PM
02 अक्टूबर, 1869 को गुजरात के पोरबंदर में जन्मे श्री मोहनदास करमचन्द गाँधी को पूरी दुनिया अहिंसा के पुजारी, संत, महामानव और भारत के राष्ट्रपिता के रूप में स्मरण करती है। वास्तविक अर्थों में गाँधी जी एक महामानव, संत और महान् समाज सुधारक थे। पश्चिम के विद्वानों ने गाँधी जी के बारे में जानना चाहा था कि गाँधी जी सं हैं अथवा राजनीतिज्ञ? तब गाँधी जी को देख कर स्पष्ट होता है कि वे संत ही थे- ऐसे महात्मा, जिनके व्यक्तित्व को राजनीति में आने से कोई क्षति नहीं पहुंचती थी। महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आईंस्टीन ने जुलाई 1944 में लिखा था-��भावी पीढयों को विश्वास ही नहीं होगा कि इस धरती पर हाड-माँस का कोई गाँधी जन्मा भी था।��
महात्मा गाँधी देश को अहिंसक तौर-तरीकों से अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए आजादी दिलवाने वाले एक संत के रूप में जाने जाते हैं। लेकिन गाँधी जी का व्यक्तित्व और कृतित्व एक स्वतंत्र्ता सैनानी से बढ कर कई अन्य रूपों में परिलक्षित होता है। गाँधी जी का व्यक्तित्व एक अहिंसावादी, सच के पथ पर चलने वाले, महिलाओं के उद्धारक और विकास की सोच रखने वाले, दलितों, अछूतों के प्रति भेद-भाव के विरुद्ध शंखनाद करने वाले, शोषण और अत्याचार का प्रतिकार करने वाले एक महामानव का दिखाई देता है।
गाँधीजी ने 1909 में लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज में �हिन्द स्वराज� ग्रन्थ की रचना की। यह ग्रन्थ उनके भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के समक्ष पाश्चात्य सभ्यता के सन्दर्भ में उनके विचारों का आईना है। इस ग्रन्थ की रचना को 100 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और अभी पूरे देश में गाँधी रचित इस �हिन्द स्वराज� की चर्चा मीडिया में और लोगों के बीच में मुखर रूप में है। �हिन्द स्वराज� ग्रन्थ में गाँधी जी ने स्पष्ट किया है कि भारत की सनातन जीवन पद्धति अधिक श्रेयष्कर और वरेण्य है जिसकी बदौलत यहाँ की सभ्यता हजारों-हजार वर्षों से प्रवहमान बनी रही हैं। गाँधी जी ने स्पष्टतः कहा है कि-��उनका विरोध यंत्रें से नहीं अपितु उनके दुरुपयोग से है। वे यंत्रें का उपयोग समस्त मानव जाति के समय और श्रम की बचत के लिए करना चाहते थे, न की किसी वर्ग के धन लाभ के लिए।�� चरखा भी एक यंत्र् ही है और उन्होंने सिंगर मशीन का स्वागत भी किया था। वर्तमान भारत में जहाँ शिक्षा, भाषा को लेकर अनेक प्रकार के विचार और मत-वैभिन्न की स्थिति है, उस पर भी गाँधी जी ने स्पष्टतः लिखा है-��मुझे तो लगता है कि हमें सभी भाषाओं को उज्ज्वल और शानदार बनाना चाहिए और हमें अपनी भाषा में ही शिक्षा लेनी चाहिए।��
आज पूरा विश्व परमाणु अस्त्रें के भय में जी रहा है। राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक ताना-बाना उलझा हुआ है। पूरा विश्व हिंसा, आतंकवाद, असंतोष, असमानता से संत्र्स्त है। परमाणु बम संहारक शक्ति से 1945 में मानव परिचित हो ही चुका है। ऐसे कठिन, भयावह समय में गाँधी जी की प्रासंगिकता और उनका स्मरण आज संपूर्ण मानव जाति के लिए वरदान स्वरूप है। गाँधी जी के शब्दों में-��मानव कर्म से भिन्न मैं किसी धर्म को नहीं मानता, सभी धर्मों का लक्ष्य एक ही है। आभ्यान्तर जीवन, ईश्वर में आत्मा का जीवन ही एक महान् सत्य है। शेष सब कुछ बाह्य है।�� वे दुनिया के दःुख के प्रति अति संवेदनशील थे और चाहते थे कि हर आँख का हर आंसू वे पोंछ सकें।
गाँधी जी के जन्म दिवस 02 अक्टूबर को राज्य सरकार के आदेशानुसार पूरे राज्य में उनके साहित्य, चित्रें, उपदेशों आदि को प्रदर्शनियों, विचार-गोष्ठियों के माध्यम से मनाया जा रहा है। इस अवसर पर हम सभी का कर्त्तव्य हो जाता है कि हम गाँधी जी के जीवन से और उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा ले कर कार्य करें।
साभार / स्त्रोत -
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