हाईकोर्ट बैंच .....
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Tuesday 16 Jun, 2009 03:41 PM
उदयपुर बार एसोसिएशन ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखकर हाईकोर्ट बैंच की स्थापना के लिए सकारात्मक विचार करने की मांग की है।
मेवाड-वागड संभाग में हाईकोर्ट बैंच की आवश्यकता गत 28 वर्षों से महसूस की जा रही है। मेवाड-वागड आदिवासी संभाग की सामाजिक, भौगोलिक व आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर इसकी मह ी आवश्यता होने से समाज के सभी वर्गों की इस मांग को सभी वर्गों के प्रतिनिधि के रूप में अधिवक्ता समुदाय द्वारा आंदोलन रूप में गत 28 वर्षों से विभिन्न मंचों पर उठाया गया और गत 26 वर्षों से अधिवक्ताओं के द्वारा प्रत्येक माह की 7 तारीख को संभाग भर के न्यायालय में उपस्थिति नहीं देकर राज्य सरकार के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर व ज्ञापन के जरिए मेवाड-वागड की आदिवासी जनता की इस मांग को लगातार उठाया गया है।
संभाग की विभिन्न जेलों में लगभग 8 हजार आदिवासी बंद हैं जो कि पैरवी के अभाव में नाहक सजा भुगत रहे हैं, इन आदिवासियों के पास इतनी समझ व पैसा नहीं है कि ये जोधपुर उच्च न्यायालय में जाकर वकील मुकरर्र कर अपनी पैरवी करवा सकें, क्योंकि वहां इनकी भाषा भी कोई नहीं समझता है, ये इतनी दूर यात्रा नहीं कर सकते हैं और इनके पास पैसा भी नहीं है।
फरवरी, 2॰॰9 में संसद में भी इस मांग को उठाया गया है और आदिवासी बहुल संभाग की इस मांग को सभी मंचों पर सकारात्मक दृष्टिकोण प्राप्त हुआ है, मेवाड-वागड सभांग में हाईकोर्ट बैंच की स्थापना की यह मांग, गरीब आदिवासियों के कल्याण से जुडी हुई है और इसकी आवश्यकता का अंदाजा यहां आकर व्यक्तिगत रूप में इसको महससू करने पर ही हो सकता है। बार एसोसिएशन के अध्यक्ष त्रिभुवननाथ पुरोहित, महासचिव हेमंत जोशी ने राजस्थान उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को लिखे पत्र में अनुरोध किया कि किन आधारों पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि मेवाड-वागड आदिवासी संभाग को उच्च न्यायालय की खंडपीठ की आवश्यकता नहीं है। 28 वर्षों से की जा रही इस मांग हेतु ना तो उदयपुर संभाग का दौरा किया जाकर परिस्थितियों का आकलन किया गया ना ही अधिवक्ताओं, जनप्रतिनिधियों से अथवा कल्याणकारी संस्थाओं से ही किसी प्रकार का संफ किया जाकर आवश्यकता का आकलन किया गया। बिना विचारण किए नकारात्मक निष्कर्ष आदिवासी व गरीब जनता के साथ अन्याय होकर उनके हितों के सर्वथा खिलाफ है। नकारात्मक प्रतिक्रिया से आदिवासियों के कल्याण के लिए गत 28 वर्षों से किए जा रहे संघर्ष का दमन हो रहा है।
साभार / स्त्रोत -
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