| पहला पन्‍ना | सम्‍पर्क करें | राय दें |  हमें होम पेज चुने  | पसंदीदा में जोडें   

हिन्‍दी समाचार | अंग्रेजी समाचार | सदस्‍य | फोटो गैलेरीं | ग्रीटिंग कार्ड | सर्च | राय दें

पहला पन्‍ना | खास खबरें | भारत | दिल्‍ली | खाना खजाना | साहित्‍य | शख्सियत | सिनेमा जगत | उदयपुर | चुटकुले |
मधुमती | धर्म कर्म | भारत पर्यटन | डूंगरपुर | बांसवाड़ा | चित्तौड़गढ़ | राजसमन्द | हनुमानगढ | क्रिकेट | सी एम प्लस |
Life Style | संस्‍थागत समाचार | फोटो-फीचर | जोधपुर | भीलवाड़ा | राजस्थान | अन्तर्राष्ट्रीय | अन्य राज्य | अजमेर | सरकारी आदेश |
prashants corner | बीकानेर | उत्सव-व्रत कथा | पंचायत चुनाव | गीत-गजल | व्यापार | निरंकुश आवाज़ | शिल्पग्राम उत्सव | सखी-मंगला | सम्पादकीय |
समसामायिक | जीवोत्थान | टेक्‍नोलोजी
| स्वास्थ्य |

     


वरना हम भी आदमी थे काम के


This story has been read 1378 times. Share



Tuesday 24 Feb, 2009 09:51 PM इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी काम के।
मियां गालिब ने जब यह शेर लिखा होगा, वह समय कुछ ओर था, उस समय का इश्क पाक दामन, इबाबत का दूसरा रूप माना जाता था। जहां इज्जत सरेआम नीलाम नहीं होती थी। जान जुदा हो जाए, पर दामन में दाग नहीं लगता था। आज इश्क का रूप ही बदल गया है। चार दिन की मुलाकात कुछ मीठी-मीठी ब तें धन-दौलत का आंकलन भावनाओं में बहकर युवक-यवती का घर से भाग जाने को इश्क, मोहब्बत, प्यार कहा जाता है। आप और हम चाहे इस रोग से पीडत न हो, लेकिन अधिकांश युवक-युवतियां इस भयंकर रोग से पीडत है। इसमें दोष इनका नहीं है। यह तो उम्र का तकाजा है, अगर युवक-युवती इश्क, मोहब्बत, प्यार के नागपाश में नहीं फसेंगे, तो क्या बुढापे में।
इश्क के कई रूप है, जो समय व उम्र के साथ बदलते जाते है। बाल्यकाल से जब बच्चा युवाकाल यानि यौवन की ओर बढता है उसका आकर्षण रूप, वासनात्मक होता है। युवक-युवती से दोस्ती करना चाहता है, युवती भी युवक के प्रति आकर्षित होती है। शनैः शनैः यह आकर्षण भावनाओं में बहकर भागने, प्रेम विवाह आदि के रूप में बदल जाती है। ऐसे में कदम परम्परा, संस्कृति व संस्कारों के विपरीत माने जाते है। प्रेम विवाह की सफलता का प्रतिशत कम ही आंका जाता है। दरअसल भावना में भवकर उठाए कदम अक्सर असफलता की ओर ले जाते है।
इसी तरह इश्क का दूसरा रूप शौक है। शौक भी कई प्रकार के होते है। जैसे लिखने, पढने, नेतागिरी, शराब सेवन, जुआ खेलना आदि। यह शौक हर वर्ग के युवक या बुजुर्ग या किसी भी उम्र में जन्म ले सकता है। ऐसे शौक धीरे-धीरे परवान चढते है। जब यह चरम सीमा पर पहुंच जाते है, तब मानव को अपने शौक के सिवाय कुछ भी दिखाई नहीं देता, ऐसी अवस्था को इश्क ने कहा जाए, तो क्या कहा जाए।
इश्क वह रोग है, जिसका निदान वैद्य, हकीम, चिकित्सक के पास नहीं है। इश्वर भी इस रोग को फैलने से नहीं रोग सकता है क्योंकि किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए लगन, परिश्रम की आवश्यकता होती है। यह लगन, परिश्रम भी तो एक तरह का इश्क ही है।


साभार / स्‍त्रोत -


Advertisement

खबरें और भी है

कहानी मोहन दास जरूर पढ़े‍‍‍‍‍‍राजकिशोर
धारावी अब नंबर दो
मांगिए सिक्के
एक अदद सवाल गांधी से
गए वो नारे, प्यारे-प्यारे
कलम के जोर पर जिन्दा था, मर गया कैसे
विवाद न बने तब तक वाद होता हैं
अरावली शिखर से......
सॉरी.....!
वरना हम भी आदमी थे काम के
मीडिया और न ही बुद्धिजीवी संवेदनशील
लक्ष्मण रेखा का सबब
“क” का मर्म.....
यक्ष प्रश्न लक्ष्य-25!
   ताजा वीडियों
Error: config file ./video/cpmfetch_config.php specified but was not found.

सर्व अधिकार सुरक्षित । यह वेबसाइट लेक्‍सपेरेडाइज डाट काम द्धारा बनायी गयी है