अथर्ववेदाचार्य डॉ. मनोहरलाल द्विवेदी

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22 Aug, 11 15:37
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भारतीय वैदिक संस्कृति की पर पराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए वैदिक विद्वानों की सुदीर्घ श्रृंखलाएं पीढियों से देश के कोने-कोने में विद्यमान रही हैं जिन्होंने श्रुति पर परा और अन्य माध्यम से चारों वेदों के अमूल्य ज्ञान को युगों तक आने वाले पीढियों तक संवहित करने में अहम् भूमिका निभायी। बीसवीं सदी में वैदिक पर पराओं का ह*ास होने की स्थिति में कई बिरले विद्वानों का ऐसा समुदाय रहा है जिसने वैदिक ज्ञानराशि को बचाए रखने में पूरा जीवन समर्पित कर दिया। भारतीय संस्कृति और वैदिक पर पराओं की रक्षा करने वाले इन्हीं रत्नों के भगीरथी प्रयासों का परिणाम है कि भारतवर्ष की आदि पर परा से जुडे अपौरुषेय वेदों का ज्ञान आज भी सुरक्षित है। देश में गिने-चुने वेदज्ञों में ‘लोढी काशी’ कहे जाने वाले बाँसवाडा के मूल निवासी वेदज्ञ डॉ. मनेाहरलाल द्विवेदी का नाम भारत भर में अग्रगण्य रहा है। उच्च कोटि के अथर्ववेदाचार्य के रूप में डॉ. द्विवेदी दुनिया भर में जाने जाते रहे हैं। डॉ. द्विवेदी ने गंगा किनारे भगवान शिव की नगरी काशी में 23 अगस्त 192॰ को जन्म लिया। आरंभिक शिक्षा-दीक्षा बनारस में प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति और वेदों क रक्षा तथा अध्ययन का संकल्प लिया। आपने 193॰ में सांगवेद विद्यालय में वेदाध्ययन कर, 1935 में मध्यमा, 1938 में शास्त्री, 1941 में अथर्ववेद साहित्य विषय से एवं आचार्य परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। दुर्लभ विषय पर डॉक्टरेट 1957 में आगरा विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम,ए. करने के बाद वे दो दशक तक निरन्तर शोध में जुटे रहे। सन् 1962 में उन्होंने वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय के उफलपति डॉ. सुरेन्द्र नाथ शास्त्री डी.लिट. के सान्निध्य में ‘ श्रोत सूत्रों का आलोचनात्मक अध्ययन ः कात्यायन यज्ञ पद्घति के संदर्भ में ’’ पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। यह शोध ग्रंथ राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान दिल्ली ने प्रकाशित किया। यह अपने आप में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर दुर्लभ विषय था जिसने डॉ. द्विवेदी को वैश्विक पहचान दी। सन् 1968 में दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से उन्होंने अथर्ववेदाचार्य की उपाधि हासिल की। डॉ. द्विवेदी को बी.लिब. एससी सहित कई अन्य डिग्रियाँ भी प्राप्त थीं। डॉ. द्विवेदी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों श्री राजेश्वर शास्त्री द्रविड, श्री गणपति दीक्षित, श्री दाऊ जी भट्ट, श्री मुकुन्द शास्त्री खिस्ते एवं पिता श्री भगवानलाल जी अग्निहोत्री से काव्य शास्त्र, मीमांसा, दर्शन, पुराण, वेद एवं संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन किया। विलक्षण प्रतिभा के धनी डॉ. द्विवेदी ने अपने ज्ञान को अथर्ववेद तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि अन्य सभी वेदों, साहित्य, दर्शन, पुराण आदि में भी महारथ हासिल करते हुए इनका अध्यापन किया। उनकी माधुर्यपूर्ण एवं सहज-सरल शैली से भरी अध्यापन कला से शिष्य समुदाय ही नहीं बल्कि विद्वत समाज भी अचंभित रहा है। अथर्ववेद शौनख शाखा के उद्भट विद्वान डॉ. मनोहरलाल द्विवेदी की कल्प(कात्यायन श्रोत सूत्र) के आधिकारिक विद्वानों में से एक थे। भाष्य और तर्क में उनका कोई मुकाबला नहीं था। आफ द्वारा पढाए गए छात्र श्रीधर अडि गोकर्ण में अथर्ववेद विभागाध्यक्ष, श्री किशोर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) वाराणसी में रीडर (विभागाध्यक्ष) पद पर, श्री बाल सुब्रमण्यम् एवं श्री सीतारमनम् तिरूपति बालाजी में अथर्ववेद में पारायणरत हैं। स पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में अध्यापन कराते हुए उन्होंने कई शिष्य तैयार किए जो आज भारत भर में वैदिक संस्कृति और दैव वाणी संस्कृत के प्रचार-प्रसार में जुटे हुए हैं। आपकी विद्वत्ता एवं अनवरत ज्ञान के कारण 1॰ अगस्त 1996 को भारत के तत्कालिन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा भारत सरकार द्वारा ‘‘राष्ट्रपति पुरस्कार’’ से एवं महाराणा मेवाड फाउण्डेशन उदयपुर द्वारा 13 अप्रैल 1997 को ‘हारित ऋषि स मान से स मानित किया गया। आपकी विद्वता एवं उपलब्धियों के कारण समय-समय पर कई पुरस्कार प्राप्त हुए। सन् 1976-77 में उत्तरप्रदेश सरकार ने राज्य साहित्य पुरस्कार, सन् 1985 में राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान संस्कृत अकादमी स मान, सन् 1987 में नासिक महाराष्ट्र में गुरु गंगेश्वरानन्द वेद वेदांग पुरस्कार, सन् 1988 में राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा वेद पुरस्कार, सन् 1989 में हनुमान मंदिर न्यास कलकत्ता द्वारा हनुमदीय विद्याव्रति पुरस्कार, सन् 1991 में नरहर गुरु वैदिकाश्रम इन्दौर द्वारा पुरस्कार, पूर्व मु यमंत्री स्व. श्री हरिदेव जोशी के पिता श्री की स्मृति में ‘पन्नालाल जोशी पुरस्कार’ से भी स मानित किया गया। डॉ. द्विवेदी का विवाह 18 वर्ष की उम्र में बाँसवाडा के ही मूल निवासी हेमशंकरजी की पुत्री एवं चतुः स प्रदाय नासिक के महन्त रहे, चैतन्य महाप्रभु के अवतार माने जाने वाले संत 1॰॰8 श्री दीनबंधुदासजी महाराज की सहोदर भगिनी मोतीदेवी के साथ स पन्न हुआ। श्रीमती मोती देवी ने डॉ. द्विवेदी को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शोध कार्य में पूर्ण सहयोग दिया। अथर्ववेद की इस महान विभूति पर भगवत्कृपा भी खूब थी और यही कारण है कि उन्होंने अपने शरीर की समाप्ति का समय पहले ही बता दिया था और ‘काश्यां मरणां मुक्तिः’ को चरितार्थ करते हुए अंतिम समय में काशी में ही देह त्यागी। मोक्षदायिनी गंगा के किनारे रामघाट पर गुरु श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य सद्गुरु भगवान श्रीधर स्वामी महाराज प्रदत्त गुरु मंत्र के जप तथा भगवान काशी विश्वनाथ का ध्यान करते हुए आश्विन नवरात्रि की चतुर्थी तदनुसार 24 सित बर 1998 को स्वति नक्षत्र में शिव धाम सिधार गए। देश और दुनिया भर में अपनी विद्वत्ता का डंका बजाने वाले डॉ. मनोहरलाल द्विवेदी का समग्र जीवन नई पीढी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वागड की वादियों से लेकर गंगा की लहरों तक अपने विलक्षण ज्ञान की गंध बिखेरने वाले इस महापुरुष का समग्र जीवन उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो संघर्षों को चुनौती के रूप में लेते हुए दुनिया की छाती पर अपनी प्रतिभा का राज कायम करना चाहते हैं।
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