आधुनिक युग के कबीर ः नागार्जुन

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09 Sep, 11 14:06
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नागार्जुन (वैद्यनाथ मिश्र) का रचना-संसार बहुआयामी है और गहरी प्रतिबद्धता का परिचायक है। वे अपने समाज में पूरी तरह रच-बस गए थे। मगर उनकी प्रतिबद्धता, समता, समाजवाद और क्रांति से थी। तभी मामूली लोगों के दुख-दर्द और संघर्ष से और सबकी खुशहाली से वे पूरी तरह सम्बद्ध हैं। वे स्वयं कहते हैं - प्रतिबद्ध हूँ, सम्बद्ध हूँ, आबद्ध हूँ प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त संकुचित स्व की आपाधापी के निषेधार्थ... अविवेकी भीड की भेडया-धसान के खिलाफ... प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ।१ नागार्जुन माक्र्सवादी हैं और इस सम्बन्ध में वे कहते हैं कि अन्तरराष्ट्रीय साम्यवाद जब राष्ट्रीय हो लेगा, तभी वह राष्ट्रीय माक्र्सवाद की संज्ञा पा सकेगा। मेरे लिए इसका मतलब स्थानीय समस्याओं और निकट के संघर्षों से जुडना है। बाहर-बाहर तो हम प्रगतिशील बने रहें और भीतर वही प्रतिक्रियावाद काम करता चले तो फिर कैसी राष्ट्रीयता और कैसी साम्यवादिता*? मैं स्थानीय घटनाओं से निर्लिप्त होकर माक्र्सवादी नहीं रहना चाहता।२ तभी शायद वे यह कहने के लिए बाध्य हुए हैं - ऊपर-ऊपर मूक क्रांति, संपूर्ण क्रांति कन्वन क्रांति, मंचन क्रांति, वंचन क्रांति किचन क्रांति प्रवाहित रहेगी भीतर तरल भ्रांति ।३ लेकिन नागार्जुन की विशेषता है कि वे दो विरोधी भावों या ध्रुवांतों को जोडने की अद्भुत महारत रखते हैं। इसका अच्छा उदाहरण ’पाँच पूत भारत माता के‘ कविता में देखा जा सकता है। नागार्जुन की प्रतिबद्धता संकुचित नहीं है। वह व्यापक अर्थ में प्रगतिशील हैं और सही मायने में किसी वैचारिक चौखटे के प्रति नहीं, बल्कि जिंदगी के प्रति प्रतिबद्ध हैं। पूरी तरह मेहनतकश जनता और उसके संघर्ष के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनकी कविताओं में इसीलिए सामान्य जन-जीवन के ऐसे तमाम दृश्य उपलब्ध होते हैं - पूरी स्पीड में है ट्राम खाती है दचके पै दचका सटता है वदन से वदन पसीने से लथपथ छूती हैं निगाहों को, कत्थई रातों की मीठी मुस्कान।४ नागार्जुन अपनी कविताओं में वह पूरी तरह समाए हुए हैं। वे कोई तटस्थ कवि नहीं रहे हैं, यद्यपि तटस्थता एक काव्य-मूल्य माना गया है। जबकि उनकी कविताओं में उनके मन का, मन से उठ रही तरंगों का, यहाँ तक कि उनके निजी विचारों, उनकी जीवन-दशा और हालात का भी पता चलता है। नागार्जुन यों तो कथाकार भी थे और उन्होंने मिथिला क्षेत्र की विषय-वस्तु परक उपन्यास लिखे तथा विवादास्पद बने। इस कथाधारा में चिंतन से विमुख वे कभी नहीं हुए। लेकिन कवि क्षेत्र अपना वैशिष्ट्य लेकर ही सर्जनात्मक प्रधानता पा लेता है। उन्होंने समकालीन राजनीति के बेतुकेपन और अनचाही दस्तकों, आहटों और समाज म आते बदलावों को जैसा अनुभव किया, वैसा ही कविताओं में निरूपित भी कर दिया पर अभिव्यक्ति का तीखापन व्यंग्यपरक होता गया है। उनकी यही प्रतिबद्धता उनकी सर्जना की जीवन्तता है। वे स्वयं जनवादी आन्दोलनों और संगठनों के लिए निरन्तर कार्य करते हुए अपनी कविताओं से उसी संघर्ष को गति देते होते थे। इसी सर्जना के दौरान वे जनाकांक्षा, जन-असंतोष और जन-क्रोध के गंध-रूप-रस के मिश्रित रसायन से नवीन ऊष्मा और ऊर्जा प्राप्त करते हैं - देखोगे, सौ बार मरूँगा । देखोगे, सौ बार जिऊँगा । हिंसा मुझसे थर्राएगी, मैं तो उसका खून पीयूँगा । प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है, मेरे कवि का जन-जन में जो ऊर्जा भर दे मैं उद्गाथा हूँ उस रवि का ।५ नागार्जुन का विद्रोह निरा वैयक्तिक नहीं है, उसमें जनता का सुख-दुख, जन-उत्पीडन और जन-जन को बेहतर जीवन की आशाओं का गर्जन-तर्जन और भावनाओं का ताण्डव छिपा रहता है, तभी तो वे ’सफल दुनिया‘ से बाहर रह गए असफल लोगों की वन्दना करते हैं - जो नहीं हो सके पूर्ण काम मैं उनको करता हूँ प्रणाम वो कुण्ठित कुछ भ्रष्ट जिनके अभिमंत्रित तीर हुए ग ग ग ग ग जिनकी सेवाएँ अतुलनीय पर विज्ञापन से रहे दूर प्रतिकूल परिस्थितियों ने जिनके कर दिए मनोरथ चूर-चूर उनको प्रणाम ।६ असफल लोगों के पुरुषार्थ पर लिखी गई हिन्दी साहित्य में नागार्जुन की यह पहली कविता है जिससे स्पष्ट होता है कि उनकी दृष्टि में कितना कुछ समाया हुआ है। वे जीवन को जिस गहराई से देखते हैं, वास्तव में वही उनकी कविता की ताकत है। नागार्जुन जीवन के कवि हैं और जीवन की तमाम तकलीफें झेलने, अपमान सहने, अभाव और दुःखों की मार सहने के बावजूद जीवन उनके काव्य में एकदम ताजा रहता है। वृद्धावस्था में नागार्जुन बच्चों के नूतन उत्साह (खिलंदडपन) के समय चन्दू को अपने सपनों का उल्लेख करते हैं - चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा । चंदू मैंने सपना देखा, भभुआ से हूँ पटना लौटा । ग ग ग ग ग चंदू मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ बाहर चंदू मैंने सपना देखा लाए हो तुम नया कलैण्डर ।७ प्रगतिशील कवि नागार्जुन की सौंदर्य चित्रणा भी अप्रतिम है। सौंदर्य-चेतना के इस बिन्दु पर वे हिंदी के अन्य प्रगतिशील कवियों से अलग हो जाते हैं, क्योंकि वे जीवन के यथार्थ के नाम*पर*सौंदर्य*का तिरस्कार करते हैं। नागार्जुन बनावटीपन को सौंदर्य न मानकर जीवन की जिजीविषा से जोडकर देखते हैं*- कर गई चाक, तिमिर का सीना जीत की फाँक, यह तुम थीं।८ दैहिक प्रम नागार्जुन के काव्य में जीवन का अंग बनकर उभरता है जो अनगढ शब्दों और आंतरिक ताप एवं भावनाओं की ऊर्जा का स्पर्श पाकर कलात्मक बन जाता है - झुकी पीठ को मिला किसी हथेली का स्पर्श तन गई रीढ । ग ग ग ग ग निगाहों के जरिए जादू जादू घुस आया अन्दर तन गई रीढ ।९ इस ’तन गई रीढ‘ की अर्थवत्ता विशिष्ट है। इसमें प्रेम की पूरी शक्ति, गति और सम्मोहन समाया हुआ है। लेकिन उनका ग्रामीण अंचल के प्रति लगाव भी कम नहीं है - याद आता है मुझे अपना तरुउनी ग्राम याद आती हैं लीचियाँ, वे आम ग ग ग ग ग धन्य वे जिनके मृदुलतम अंक हुए थे मेरे लिए पर्यंक ।१० नागार्जुन की कविता किसी चौखटे की कविता नहीं, बल्कि हर चौखटे को तोडकर बाहर निकलती है। यही कारण है कि प्रगतिशील कविताओं की रूढयों को तोडकर नागार्जुन आगे बढ जाते हैं तथा आस्तिक के रूप में सूर्य को अर्घ्य चढाते और प्रार्थना-मंत्र पढते हैं और डेविएशन की चर्चा भी करना नहीं भूलते - पछाड दिया मेरे अस्तित्व ने मेरे नास्तिक को साक्षी रहा तुम्हारे जैसा नवजवान पोस्ट ग्रेजुएट मेरे इस डेविएशन का ।११ नागार्जुन की कविता की अनौपचारिकता एक विशिष्ट पहचान बनाती है। जो उन्हें निराला और मुक्तिबोध के अतिरिक्त तीसरे कवि के रूप में नितान्त बतकही के अंदाज में अनौपचारिक कविताओं के रचनाकार सिद्ध करती है। वे ड्राइंगरूम में बैठकर कविता को सजाने-सँवारने का काम या शहराती कविताओं का सर्जन नहीं करते, बल्कि टेढी-मेढी पगडंडियों, रोजमर्रा की घटनाओं का विवरण लिए होती हैं। तभी इन कविताओं में सहज जीवन्तता मिलती है। नागार्जुन सदैव राष्ट्रीय अस्मिता, मानव पक्षधरता, संघर्षशील चेतना के ऐसे कवि हैं जिनकी अभिव्यक्ति में विषयगत वैविध्य के साथ अन्यत्र दुर्लभता का अदृश्य स्थल भी होता है। सामान्यतः जहाँ कवियों की दृष्टि नहीं पहुँचती, वहीं नागार्जुन मामूली यथार्थ संवेदना से अपनी निजता में संजोकर अभिव्यक्ति-कर्म का दायित्व पूरा करते हैं। इसी कारण नामवर सिंह कहते हैं कि जो वस्तु औरों की संवेदना को अछूती छोड जाती है, वही नागार्जुन के कवित्व की रचना-भूमि है।१२ उनकी ऐसी ही कविता है - जमना किनारे मखमली दूबों पर पूस की गुनगुनी धूप में पसरकर लेटी है भरे-पूरे बारह थनों वाली छोनों को पिला रही है दूध यह भी तो मादरे हिंद की बेटी है।१३ नागार्जुन अपने समय के ऐसे यथार्थवादी कवि हैं जो यथार्थ के हलाहल पर खास दृष्टि से अपना रचनात्मक दायित्व पूरा करते हैं तथा अपने कविता-कर्म के मर्मों के उद्देश्य के प्रति सावधान ही नहीं, समर्पित भी रहे हैं। उनका यह दुर्लभ चिंतन हमारे समय का अभीष्ट है। आधुनिककाल के अप्रतिम व्यंग्यकार होने की मूलवत्ता भी नागार्जुन में विद्यमान है। इसीलिए अपने समय के यथार्थ को समर्पित नागार्जुन जनहित में ही तात्कालिकता का जोखिम स्वीकार करते हैं। इसीलिए केदारनाथ सिंह कहते हैं कि - एक तथ्य, जिसकी ओर सहसा ध्यान नहीं जाता है, यह है कि तात्कालिक विषय पर कविता लिखना एक खतरनाक काम है।१४ तात्कालिक घटनाओं से संवेदनशील कवि के सक्षम सरोकार रखने वाले नागार्जुन ने अकाल, भ्रष्टाचार, भाषिक संवेदनाओं से जनता को निरन्तर ठगते रहना, सुख और भोग में लापरवाही का चरित्र और मुखौटा बार-बार देखा है और उस पर चोटें की हैं। नागार्जुन ने व्यंग्य को अपनी निजता में नई धार दी है और उसके प्रभाव को अप्रतिम बोध कदापि कदर्थ नहीं होता, लेकिन व्यंग्य की मार्मिक अनुभूतियों के द्वारा यथार्थ के आयाम का प्रयोग उनके लिए संभव था। नागार्जुन का व्यंग्य हिन्दी कविता को समय सापेक्ष करते हुए जनता, मिट्टी, संस्कृति और संसार, सबको पूरी जीवन्तता से पूरा करते हैं। तभी नामवर सिंह कहते हैं कि - कबीर के बाद व्यंग्य को नागार्जुन ने ही सार्थकता प्रदान की है।...व्यंग्य की विदग्धता ने ही नागार्जुन की अनेक तात्कालिक कविताओं को कालजयी बना दिया है, जिसके कारण वे कभी बासी नहीं हुई और अब भी तात्कालिक बनी हुई है।...कबीर के बाद हिंदी में नागार्जुन से बडा व्यंग्यकार अभी तक नहीं हुआ। नागार्जुन के काल में व्यक्तियों के इतने व्यंग्य-चित्र हैं कि उनका एक विशाल एलबम तैयार किया जा सकता है।१५ इसमें संदेह नहीं कि नागार्जुन अपने समय के ऐसे कवि हैं जो सहज बौद्धिक या वैचारिक आग्रहों की अधिकता ही नहीं, उनमें हार्दिकता का तरल विस्तार है, क्योंकि उनकी कविताओं में यथार्थ भावुकता, भावात्मक आवेगों से कवि ने भविष्य को संकेतित किया है। यही नहीं, वे नए कवियों को विश्वसनीयता से जो अवलोकन किया है, उसमें एकाकार उनकी संवेदना, भावुकता, भावनात्मकता का परिचय नहीं देती, बल्कि नयी पीढी को संदेश प्रदान करती है। नागार्जुन युवा कवियों के एक अभिभावक की भूमिका अदा करते हैं - तुम किशोर तुम तरुण तुम्हारी अगवानी में खुरच रहे हम राजपथों की काई, फिसलन खोद रहे जहरीली घास पगडंडियाँ निकाल रहे हैं । ग ग ग ग ग तुम नहीं तो और किसे हम देखें बोले लो मशाल अब घर-घर को आलोकित कर दो।१६ नागार्जुन ने शिल्प के स्तर विविध प्रयोग किए हैं। किसी अन्य कवि से अकेले ऐसे प्रयोग की संभावना नहीं है। उनके काव्य में कलात्मकता भी है और लोकानुरंजकता भी है। सामाजिक यथार्थ और सामाजिक परिवर्तन की कामना उनमें व्यापक रूप से परिलक्षित होती है। रामविलास शर्मा ने कहा है कि, ’’नागार्जुन ने लोकप्रियता और कलात्मक सौंदर्य के संतुलन और सामंजस्य की समस्या को जितनी सफलता से हल किया है, उतनी ही सफलता से बहुत कम कवि हिंदी से भिन्न भाषाओं में भी हल कर पाए हैं।१७ अन्ततः यह कहना समीचीन होगा कि नागार्जुन की युगधर्मिता, मामूलीपन, अनौपचारिकता, चौखटों से बाहर रहने की जिद, आमजन के सुख-दुख के साथी हैं तथा आधुनिक काव्य के कबीर हैं।
Source : प्रो. विजय कुलश्रेष्ठ

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