गरीबों के हित में दवा नीति का बनना

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Published on : 20 Apr, 17 11:04

- ललित गर्ग -

गरीबों के हित में दवा नीति का बनना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र सरकार ने व्यापक स्वास्थ्य देखभाल नीति के तहत लोगों के फायदे के लिए लगभग 700 दवाओं की कीमतें तय कर दिये जाने की जानकारी देकर देश की गरीब जनता को राहत दी है। सरकार के द्वारा ऐसी नीति बनाया जाना भी देश के हित में जिसके अन्तर्गत डॉक्टर्स अब केवल जेनरिक दवाएं ही लिखेंगे। इससे न केवल बड़ी दवा कंपनियों के एकाधिकार को खत्म करेगा बल्कि लम्बे समय से दवा के नाम पर चली आ रही लूटपाट भी समाप्त होगी। इस तरह की नीति का बनना और उसे ईमानदारी से लागू करना सचमुच लोक कल्याणकारी शासन को दर्शाता है। देश में इस समय लगभग एक लाख करोड़ रु. की दवाइयां बिकती है, जिनमें अधिकांश एथिकल होती है, इनमें उचित दामवाली जेनेरिक सस्ती दवाइयां की बिक्री सिर्फ 9 प्रतिशत है। यदि सरकार डाॅक्टरों और दवा-विक्रेताओं के साथ सख्ती से पेश आए और दवाओं पर सरकार की नीति ईमानदारी से लागू होे तो देश के करोड़ों लोग लुटने और पीड़ित होने से बच सकेंगे। स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी हमें अहसास नहीं हो रहा है कि हम स्वतंत्र हैं। इस तरह की विरोधाभासों और विसंगतियों से उत्पन्न समस्याओं ने हमें अब तक जकडे़े रखा है। क्योंकि हमारे कर्णधारों एवं नीति-निर्माताओं के भाषणों में आदर्शों का व्याख्यान होता रहा है और कृत्यों में उसे भुलाया जाता रहा है। अब कुछ बदल रहा है तो शुकून का अहसास भी हो रहा है।
भारत एक लोक कल्याणकारी राज्य है। इस देश में गरीबों को जिस तरीके से लूटा जा रहा है, उसे देखकर दुःखद आश्चर्य होता है। जिसको जहां लूटने का मौका मिल रहा है, वह वहां लूटने में जुटा है। जनाकांक्षाओं को किनारे किया जाता रहा है और विस्मय है इस बात को लेकर कोई चिंतित भी नजर नहीं आता। जो शिखर पर होता रहा है उसी खेल का विस्तार हमारे आस-पास भी दिखाई देता रहा है। भ्रष्टाचार और लूटने की मानसिकता ने देश को खोखला कर दिया है। इस देश में जनता को लूटने के दो बड़े बहाने हैं। एक शिक्षा और दूसरा, चिकित्सा! जबकि ये दोनों ही सेवा और जनकल्याण के क्षेत्र रहे हैं। लेकिन भ्रष्ट राजनीति एवं भ्रष्ट नीतियों ने देश में इन दोनों ही क्षेत्रों को जनता को लूटने एवं भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा माध्यम बना दिया है। गैर-सरकारी कालेजों और स्कूलों की लूट-पाट ने गरीब तबके के लोगों के लिये शिक्षा को केवल अमीरों के लिये आरक्षित कर दिया है। इन स्थितियों में शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के साथ-साथ उसे गरीबों के लिये सुलभ कराने के लिये विभिन्न राज्यों की सरकारें कानून बनाने की सोच रही है, यह भी एक शुभ संकेत है। शिक्षा से भी ज्यादा त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण है दवा और इलाज की लूटपाट। मरता, क्या नहीं करता? अपने मरीज की जान बचाने के लिए अपना सब कुछ लुटाने के लिए तैयार हो जाते हैं। जो लोग निजी अस्पतालों में भर्ती होकर लुटने से बच जाते हैं, उन्हें सरकारी डाॅक्टरों की महंगी दवाइयां दिवालिया कर देती हैं।
दवा कारोबार से जुड़े लोग जानते हैं कि इस कारोबार में दो तरीके से दवाइयाँ बेची जाती है। एक जेनरिक के नाम पर दूसरी एथिकल के नाम पर। जेनरिक और एथिकल को लेकर आम लोगों में यह भ्रम है कि एथिकल दवाइयां असली होती हैं और जेनरिक नकली। जबकि वास्तविकता यह नहीं है। यह बाजार की ताकतों का बिछाया जाल है, जिसमें जेनरिक दवाइयां सीधी बाजार में पहुंचती हैं और एथिकल दवाइयों को बेचने के लिए एक सांगठनिक ढांचा विकसित किया जाता है। परिणाम स्वरूप एथिकल दवाइयां मरीजों तक पहुंचते-पहुंचते अपनी लागत मूल्य से अप टू 1500 प्रतिशत महंगी बिकती हैं। ब्रांडेंड दवाएं इतनी मंहगी कैसे बिकती है? इसके पीछे पूरा षडयंत्र होता है।
मुश्किल यह है कि काफी समय से सरकारें ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले जेनरिक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की बात कहती रही हैं लेकिन उस पर अमल करना अब तक जरूरी नहीं समझा गया। इसके कई कारण हो सकते हैं। लेकिन एक बड़ा कारण ब्रांडेड दवाओं का एक सशक्त संगठन है, जो अब तक सरकार की जनकल्याणकारी योजना को लागू नहीं होने दिया। इसके कारण गरीब जनता लम्बे समय से अच्छे इलाज और ब्रांडेड दवाओं से वंचित रही है। जिनकी आर्थिक हैसियत ठीक है, वे ही अच्छे इलाज और अच्छी दवाओं का लाभ लेती रही है। ऐसे मामले आम हैं कि किसी मरीज या उसके परिवार के लिए इलाज कराना सिर्फ इसलिए संभव नहीं हो पाता कि उस पर होने वाला खर्च वहन कर सकने में वह सक्षम नहीं है। कई बार डॉक्टर मरीज की जांच करने के बाद जो दवाइयां लेने की सलाह देते हैं, उनकी कीमत बहुत-से लोगों के लिए भारी पड़ती है।
इसकी मुख्य वजह यह है कि नामी-गिरामी कंपनियों की दवाओं की कीमत काफी अधिक होती हैं। जबकि उन्हीं रासायनिक सम्मिश्रणों वाली दवाएं अगर जेनरिक श्रेणी की हों तो वे काफी कम कीमत में मिल सकती हैं। ये दवाएं वैसा ही असर करती हैं जैसा ब्रांडेड दवाएं। समान कंपोजीशन यानी समान रासायनिक सम्मिश्रण होने के बावजूद इनके निर्माण पर बहुत कम खर्च आता है। इनके प्रचार-प्रसार पर बेहिसाब धन भी नहीं खर्च किया जाता, इसलिए भी इनकी कीमतें काफी कम होती हैं। लेकिन दवा बाजार पर निजी कंपनियों के कब्जे का जो पूरा संजाल है, उसमें जेनरिक दवाओं की उपलब्धता इतनी कम है कि उसका लाभ बहुत-से जरूरतमंद लोग नहीं उठा पाते। दूसरी ओर, ब्रांडेड दवाओं के विज्ञापन से लेकर डॉक्टरों आदि को प्रभावित करने पर खर्च की गई रकम को भी कंपनियां दवा की कीमत में जोड़ देती हैं। ऐसे आंकड़े कई बार आ चुके हैं कि दवा की लागत के मुकाबले बाजार में उसकी कीमत कई सौ प्रतिशत ज्यादा रहती है। मगर आम लोग समान असर वाली सस्ती जेनरिक दवाएं इसलिए भी नहीं ले पाते कि या तो उन्हें इनके बारे में जानकारी नहीं होती या फिर डॉक्टर ऐसी सस्ती दवाओं को लिखते ही नहीं। डाक्टरों को जिन दवाओं में मोटा कमीशन मिलता है, वे वही दवाएं लिखते हैं। प्रधानमंत्री ने भी भी इसी बात को उजागर किया है कि ”डाक्टर उपचार के दौरान इस तरह से पर्चे पर लिखते हैं कि गरीब लोग उनकी लिखावट को नहीं समझ पाते हैं और लोगों को निजी स्टोर से अधिक कीमत पर दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।” जरूरत है एक ऐसा कानूनी ढांचा बनाने की जिसके तहत अगर कोई डाक्टर पर्चा लिखता है तब उन्हें ऐसे लिखना होगा कि मरीज जेनरिक दवाएं खरीद सकें और उसे कोई अन्य दवा नहीं खरीदनी पड़े। जेनरिक दवाओं को न केवल प्रचलित करना होगा, बल्कि इनके प्रचलन में आने वाली बाधाओं को दूर करना होगा। विशेषतः ब्रांडेड दवाओं के निर्माताओं से विक्रेताओं की नाराजगी झेलने के लिये भी तैयारी होना होगा।
परम्परागत तीर्थों को सब जानते हैं, जहाँ से आध्यात्मिक प्रकाश मिलता है। नए भारत के तीर्थों के रूप में स्कूलों-कालेजों एवं अस्पतालों को नयी शक्ल देनी होगी, जहां से जनकल्याण और जीवन-निर्माण का संदेश मिलता है। भविष्य के जो तीर्थ बन रहे हैं उनके प्रति भी लोगों को एहसास कराना होगा, जहां से राष्ट्रहित, ईमानदारी और नए मनुष्य की रचना की खबरदार भरी गुहार सुनाई दे। अब देश में दवा के नाम पर किसी को लूटते हुए न देखना पड़े, इसके लिये सरकार के साथ-साथ दवा निर्माता, विक्रेता और रोगी- सभी को जागरूक होना होगा। ऐसा करके ही हम नया भारत बना पाएंगे।
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(ललित गर्ग)
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