मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना कुमति भिन्ना सुमति भिन्ना।

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03 Sep, 10 13:32
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मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना कुमति भिन्ना सुमति भिन्ना। कहते हैं मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना कुमति भिन्ना सुमति भिन्ना। हर शख्स का, हर व्यक्ति की सोच अलग है, सोचने का तरीका भिन्न है। इस भिन्न सोच के कारण कोई ‘रुपया’को सबसे बड़ा मानता है – दाम बनावे काम! कोई रुपए को सबसे बड़ा मानता है, तो कोई आदमी को सबसे बड़ा मानता है, चूंकि उसके पास ‘अक्ल’है, शक्ल है, ज्ञान है, दिमाग है और जानवरों में श्रेष्ठ है, उत्तम है, फिर मनुष्य जीवन इतना कठिन है कि चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जीवन जीने को मिलता है, तो कोई शख्सियत को सबसे बड़ा मानता है, क्योंकि भौतिक शरीर तो नाशवान है, एक शख्सियत ही ऐसी चीज है जो मरने के बाद भी जीवित रहती है। इस शख्सियत बनाम छवि, उर्फ इमेज को बनाये रखने के लिए लोग बाग क्या-क्या नहीं करते और क्या-क्या करते हैं। तो जैसा कि मैं अर्ज कर रहा था कि ‘सबसे बड़े’हेतु भिन्न-भिन्न छोटों, मध्यमों व बड़ों के मत भिन्न हैं, मेरा मत भी सबसे बड़े के मामले में सर्वथा विभिन्न है। मैं न आत्मा, आत्मा सो परमात्मा को बड़ा मानता हूं न ‘शख्सियत’को न ‘आदमी’को न ‘दाम’को न ‘काम’को, मैं तो सबसे बड़ा या बड़ी ‘जुगाड़’को मानता हूं। औरों को भी ‘जुगाड़’को ही सर्वोपरि मानने के लिए प्रेरित करता हूं। जैसा कि मैं मानता हूं, लेख पढऩे के बाद आप भी मान जायेंगे (मुझे नहीं जुगाड़ों को) कि सबसे बड़ी जुगाड़ है और उससे बड़ा जुगाड़ू। मैं एक छोटा-सा आदमी हूं। आप आम आदमी कह सकते हैं, जब छोटा आदमी हूं तो मेरी आवश्यकताएं भी छोटी हैं मसलन नोन, तेल, लकड़ी। अब चूंकि नोन तेल तो सुलभ हैं किंतु लकड़ी दुर्लभ अतएव खाना बनाने के काम हेतु आम आदमी के पास केवल एक विकल्प है और वह है केरोसिन जो आजकल आसानी से उपलब्ध नहीं होता, जिसे पाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। घंटों क्यू में खड़ा होना पड़ता है और कठोर तपस्या करनी पड़ती है। तब भी गर किस्मत में हुआ तो मिला नहीं तो दूसरे दिन या जब भी केरोसिन विक्रेता कहे केरोसिन लेने लाइन लगाने चले जाओ (इस सारे प्रक्रम में केरोसिन विक्रेता की मेहरबानी भी अत्यावश्यक है) जो कि किसी निकले हुए तिल में से तेल निकालने के कार्य से कमतर नहीं। खैर मैं तो बात जुगाड़ की कर रहा था। ऐसे ही तेल प्राप्ति की जुगाड़ की सत्यकथा मुझसे भी जुड़ी है। एक बार बहुत लंबी केरोसिन की लाइन में एक केरोसिन वितरण केन्द्र में लगा मैं अपनी बारी का घंटों से इंतजार कर रहा था कि उधर से मेरा मित्र गुजरा मुझे लाइन में लगना उस जैसे जुगाड़ू को नागवार लगा। उसने मुझे लाइन से खींचा और बोला केरोसिन का खाली डिब्बा इधर दो मैं कुछ जुगाड़ करता हूं। जब कुछ देर बाद वह लौटा तो मेरा केरोसिन का डिब्बा केरोसिन से लबालब भरा था। वैसे तो जुगाड़ के कई किस्से हैं जो जुगाड़ुओं की मदद से ही संपन्न करवाये जा सकते हैं। मसलन अच्छे स्कूलों में बच्चों के दाखिले, रेलवे पास, मकान का पट्टा, सरकारी आवास, विभिन्न कनेक्शन तथा रो•ामर्रा की चीजों की प्राप्ति हेतु लगी लाइनें आदि। ऐसी ही एक और घटना का जिक्र मैं करना चाहूंगा। हुआ यूं कि कुछ दिन पूर्व तक मैं अपने परिवार (सीमित हम दो, हमारे दोनों के दो-दो) के साथ एक किराये के मकान में रह रहे थे। मालिक मकान हर वर्ष किराया बढ़ा दिया करता था। धीरे-धीरे उस मकान के किराये की राशि इतनी हो गयी कि वह मेरे भुगतान के बूते से बाहर की बात हो गयी। अब स्थिति यह हो गयी कि मासिक आमदनी में से या तो पेट भर लो या मकान का भाड़ा दे मकान में रह लो अस्तु एक पारिवारिक मीटिंग आयोजित की गयी और मीटिंग के अंत में परिवार ने निर्णय लिया कि गर जीवित रहना है तो खाना जरूरी है, सिर छुपाने के लिए किराये का छोटा मकान भी चल सकता है और फिर छोटा मकान देखने की मुहिम शुरू हुई। अभी मकान ढूंढने की मुहिम के चालू होने के दो ही दिन बीते होंगे कि एक परिचित जुगाड़ू मित्र के घनिष्ठï का अन्यत्र ट्रांसफर हो गया। वे मित्र के घनिष्ठï चूंकि पूर्व में किरायेदारों को भुगत चुके थे इसलिए वे मकान को किराये पर नहीं उठाना चाहते थे लेकिन मकान की सुरक्षा भी चाहते थे। अंतत: परिचित जुगाड़ू मित्र की जुगाड़ काम आयी और उनके घनिष्ठ का बड़ा मकान हमारी भुगतान की अधिकतम सीमा में हमें किराये पर मिल गया। यह सब जुगाड़ का ही पावन नतीजा था। जीवन के उतार-चढ़ाव वाली जिंदगी में जुगाड़ के ऐसे कई अध्याय भरे पड़े हैं किस-किस को याद करें किस किस को भूल जायें। प्रिय जुगाड़ुओ जैसा कि मैं पूर्व में स्वीकार कर चुका हूं कि मैं एक आम आदमी हूं और मेरी सीमाएं भी आम हैं, किंतु चूंकि मैं राजधानी में रहता हूं इसलिए राजधानी के बाहर वालों को कई किस्म की गलतफहमियां हैं, जैसे कि मैं राजधानी में रहता हूं तो मेरी कई जुगाड़ें हैं और मैं उनके कई काम आ सकता हूं। मैं मोड़ों को (छोकरों को) मोडिय़ों (लड़कियों) को सरकारी नौकरियां दिलवा सकता हूं, प्राइवेट नौकरियां दिलवा सकता हूं, लाइसेंस बनवा सकता हूं, यूं कहो उनकी हर समस्या जो कि राजधानी में हल की जा सकती है, मैं जुगाड़ लगा उसे हल कर सकता हूं। कई ऐसे पत्र परिचितों/अपरिचितों के आते हैं कि हमारे मोड़े-मोड़ी ने फलां कोर्स कर लिया है, ये डिग्री ले ली है, आपकी तो जुगाड़ है, उसे सरकारी नौकरी दिलवा दें कहीं चिपका दें। रुपये-पैसे कितने ही लग जाएं चिन्ता न करें, पत्र देखते ही लौटती डाक से जवाब देना। हम मोड़े को मोड़ी को रुपये-पैसे के साथ भेज देंगे या स्वयं आ जायेंगे। और कुछ तो सचमुच में अपने छोकरे-छोकरियों, रिश्तेदारों के साथ जेबों में नोट लिए आ धमकते हैं। ऐसे ही किसी को निविदा, किसी को ट्रांसफर, किसी को कुछ तो किसी को कुछ जैसे राजधानी कल्पवृक्ष हो यहां उनकी मुरादें जुगाड़ों और जुगाड़ुओं के माध्यम से पूरी हो जाती हैं। क्योंकि जुगाड़ सर्वोपरि जो है। अंत में यह सच है कि मीडिएटर उर्फ जैक बनाम जुगाड़ के सौजन्य से सारे काम संपन्न हो जाते हैं। मंत्री से लेकर चपरासी तक के, व्यापारी से लेकर मजदूर तक के हर तरह के, हर किस्म के यहां तक कि अवैध (जो अब वैध हैं) काम भी। वर्तमान में जुगाड़ और जुगाड़ुओं का अत्यधिक महत्व है यद्यपि ‘जुगाड़’का महत्व आदिकाल से है, किन्तु अब उनकी प्राथमिकताएं बदल गयी हैं। मध्यस्थता बदल गयी इसलिए माध्यम ‘जुगाड़ू’में बदल गये। आज बिना जुगाड़ के कोई काम नहीं होता। अतएव एक जुगाड़ का (हर क्षेत्र में) रखना अति आवश्यक है। बिना जुगाड़ के काम की संभावना होने न होने के बीच झूलती है किंतु जुगाड़ से तो काम का होना तय ही है। अब मूलभूत आवश्यकताओं में ‘जुगाड़’भी शामिल हो गया है। गर आज रहीम होते तो कहते ‘रहिमन जुगाड़ राखिए, बिन जुगाड़ सब सून, जुगाड़ गए न उबरे, मोती मानस चून।’
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