इक बंगला बने न्यारा

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18 Jan, 12 08:18
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‘इक बंगला बने न्यारा’ है बहुत ही मधुर बोली, का गीत, पर गीत से तो बंगला नहीं बनता न मेरे मीत। स्वर्गीय कुन्दन लाल सहगल ने यह न जाने क्या सोचकर गाया होगा, किसी साझे घर में उनका मन शायद बहुत अकुलाया होगा। उनका कोई बंगला बना होगा अथवा नहीं मैं नहीं जानता, परन्तु इस गीत के किसी बोल को भुलाना मेरा रोम-रोम भी नहीं मानता। इस गीत की एक-एक पंक्ति ने बचपन से ही मेरे नन्हें से दिल में घर कर लिया था, न्यारा सा बंगला मैंने अपने मन में भर लिया था। होश संभालते ही जिस दड़बेनुमा कोठरी में मैंने अपने परिवार को सिमटा पाया था, उसमें यह गीत सुबह सुबह ही बजने लगता था, नींद से उठने के साथ ही एक सपना पलस्तर विहीन दीवारों पर सजाने लगता था। गीत सुनकर मुझे ऐसे लगता जैसे स्वर्गीय के. एल. सहगल की आवाज़ में पिताश्री अपने किसी प्रण को बार-बार दोहराया करते हैं, और इक न्यारे बंगले को पलकों में बसाया करते हैं।
देश की आवास नीति से वह बिल्कुल अनजान थे, बंगले की जगह ‘फ्लैट’ बनते देख होते परेशान थे। न्यारेपन में यह साझा घर उनको नहीं भाता था, बंगले के लिए कहीं सरकारी जमीन तक हथियाना उनको नहीं आता था। गीत के बोल पर ही बन जायेगा इक न्यारा बंगला शायद ऐसा वह मानते थे, किसी अफसर को इसके लिए रिश्वत देनी होगी यह भी नहीं जानते थे।
धीरे-धीरे रिकार्ड की तरह से पिताश्री भी घिसने लगे थे, बंगले की चिन्ता की चक्की के पाटों में पिसने लगे थे। यही चिन्ता उन्हें चिता पर ले गई, हमें विरासत में एक ग्रामोफोन और एक घिसा हुआ रिकार्ड दे गई। पिताश्री का शव उस कोठरी से अपनी अन्तिम यात्रा के लिए चला था, जिस ‘बंगले’ में अब तक उनका पूरा परिवार पला था।
कोठरी के एक अन्धेरे कोने में वह ग्रामोफोन बेकार होने पर टिका दिया गया था, एक लम्बे समय तक उसका अस्तित्व ही भुला दिया गया था। वह घिसा हुआ रिकार्ड उस ग्रामोफोन पर उस समय तक चढ़ा था, जब हमने उसका अंजर पंजर कबाड़ी के हवाले किया था। पिताश्री के जीते जी तो यह संभव नहीं हो पाया था, परन्तु ग्रामोफोन बेचकर मैं ज़मीन पाने का एक अदद फार्म अवश्य खरीद लाया था।
पिताश्री के बिना वह सूनी कोठरी और ग्रामोफोन के बिना वह अन्धेरा कोना हम अक्सर घूरा करते और मन ही मन बंगला बने न्यारा की अधूरी धुनों को पूरा करते। यह बोल हमारे अन्तरमन तक छा गए थे और पिताश्री की तरह हमें भी रिझा गये थे। हमारे पास उस कोठरी के किराए तक की जुगाड़ नहीं थी, बंगले की बात तक सोचने की हमारी औकात नहीं थी। वह गीत था कि पीछा ही नहीं छोड़ता था, बार-बार सोच के घोड़ों की लगाम बंगले की तरफ मोड़ता था।
हर छूट्टी के दिन हम दूर-दूर तक निकल जाते थे, परन्तु खाली जमीन के किसी छोटे से टुकड़े के दर्शन तक नहीं पाते थे। जमीन का हर टुकड़ा हमें चाँद का टुकड़ा लगता था, और आने वाली बीवी का सुन्दर सलौना मुखड़ा लगता था। हमने निश्चय किया कि माँ और छोटे भाई बहिनों की फौज में अब और भीड़ नहीं बढ़ायेंगे, कम से कम इस कोठरी में तो नई दुल्हन को नहीं लायेंगे। अब हम उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच गए थे जहाँ बहुत ही रंगीन सपने होते हैं, कोठी, कार और कन्या सभी अपने होते हैं। किसी पड़ोसी कन्या की भाँति रंगीन सपनों में बनता न्यारा बंगला हमें हसीन दिखाई देता था, उस पर सजावट का हर काम बहुत ही महीन दिखाई देता था। इन सपनों को जल्दी जल्दी बाहों में भर लेने को दिल करता था, परन्तु अपनी पतली हालत से मन बहुत डरता था। इसी डर को दूर करने के लिए बीवी आ गई और उसी कोठरी के एक हिस्से में समा गई। बीवी के मामले में भले ही हमे निराशा हाथ लगी थी, परन्तु न्यारे बंगले की आशा की डोर अभी तक हमारे साथ बंधी थी।
जब भी कोई जमीन का टुकडा हमें विज्ञापन में दिखता था, हमारे मन का तार तुरन्त उससे जा जुड़ता था। उस टुकड़े को खरीदने के लिए जब हम हजारों में रकम जमा करते थे तो उसकी कीमत लाखों में हो जाती और हमें रुस्वा कर जाती। किसी मित्र ने बताया मियाँ दिल्ली में जमीन के ख़्वाब देखोगे तो देखते ही रह जाओगे, कुछ भी हाथ नहीं लगेगा नाहक ही पछताओगे।
इस बीच हमारी दार्शनिकता भी कुछ बढ़ गई थी और रमानाथ अवस्थी की एक पंक्ति कुन्दन लाल सहगल के साथ मन में घर कर गई थी। इक बंगला बने न्यारा को हमने नया मोड़ दिया था, उसे मन्दिर किसी गाँव के किनारे के साथ जोड़ लिया था। इस पंक्ति ने हमारी सोच को एक नई दिशा सौंप दी थी, जैसा कि फैशन था एक नई रोशनी हमारे दिमाग में कौंध गई थी। हमने दिल्ली से दूर किसी कस्बे के किनारे एक मन्दिर चुनना शुरू कर दिया था, एक न्यारा बंगला बनवाने की योजना का ताना बाना बुनना शुरू कर दिया था।
योजना आयोग की योजनाओं की तरह से इसका भी कोई तार हमारी पकड़ में नहीं आ रहा था, फिर भी हमारा मन अपनी योजना पर इतरा रहा था। इतने में हमें सरकार द्वारा एक झुनझुना थमा दिया गया, आवास वर्ष में मिलेगा हर एक को आवास यह सुझा दिया गया। अनेकानेक सूत्रों के अधीन हर एक को मकान, आवास वर्ष का लक्ष्य महान, कह कर हमें एक सूत्र पकड़ा दिया। बहुत उत्साहित हो कर हमने दिल्ली के बाहर एक अदद ऐसे प्लाट के लिए आवेदन कर दिया जो अभी तक अस्तित्व में आया ही नहीं था। शायद अभी वहाँ पर हो रहा था किसी बंजर का विकास, अथवा हो चुका था वहाँ के घने जंगल का विनाश।
जमीन के नाम पर हर महीने हमारी तनख्वाह में से एक मोटी रकम कटने लगी, हमारी सूखी सी देह कुछ और तेजी से घटने लगी। न्यारे बंगले के ख्यालों में खोए हम अपनी जेब कटवाते रहे और अपनी उम्र के अमूल्य वर्ष घटवाते रहे। दस वर्ष तक इस त्रासदी को झेलने के बाद हमें सौ गज जमीन का टुकड़ा नक्शे पर दिखा दिया गया, एक अदद छपा हुआ कागज थमा दिया गया। खुशी के मारे हमारे पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे क्योंकि अब कोई साध नहीं थी अधूरी, बादशाह ज़फ़र को दो गज जमीन तक नहीं मिली थी इस देश में, हमारे पास तो सौ गज थी पूरी।
अपने न्यारे बंगले की ओर हमार पहला कदम उठ गया था, भले ही इसके लिए घर का सारा बजट वर्षों तक हिल गया था। पत्नी के ज़ेवर तक महाजन के पास पहुँच गए थे, बर्तन भांडे सब कबाड़ी सहेज गए थे। यह दुनिया किसी को खुश देखना ही नहीं चाहती इसका हमें जल्दी ही हो गया था भान, जब मित्र लोग बोले थे भैय्ये जमीन ही तो मिली है अभी तो बनना बाकी है मकान। यह सिर पर जो चार छ: बाल बचे हैं पकने से पहले ही झड़ जायेंगे, मकान में पहुँचने तक तो कपड़े भी तन से हट जायेंगे। हमें रह-रह कर क्रोध आता था, कमबख्तों को तनिक भी नहीं हमारी भावनाओं का ध्यान, हमारे होने वाले बंगले को कह रहे हैं मकान।
चार पाँच वर्षों तक चक्कर दर चक्कर लगाने के बाद, और विकास दर बिना विकास हुए ही चुकाने के बाद, हमें नक्शे पर कुछ सड़कें दिखा दी गई और प्लाट की ओर जाती एक पगडंडी पर स्याही लगा दी गई। अब हम नक्शा पास करवाने, किसी ठेकेदार को फंसाने के चक्कर में ऐसे फंस गए, कि जिन्दगी के चार छ: साल और नीचे धंस गए। सौ गज जमीन पर बंगला नहीं बनता अब यह भी हमें समझ में आ गया, मकान ही सही अपना तो होगा यह विचार भी हमें समय समझा गया। मकान पर होने वाले व्यय का अनुमान हम हर साल लगवाते, तो पाँच सात हजार हमेशा ही बढ़े हुए पाते। जल्दी ही रिटायर होने पर एक अच्छी खासी रकम हाथ आयेगी, वही शायद इस चिन्ता से छूटकारा दिलायेगी। उस राशि को भी कब कोई ग्रहण लग जाये मैं नहीं जानता क्योंकि कितने ही राहु, केतु उसके चारों ओर चक्कर काट रहे हैं, उस रकम को अपने-अपने तौर पर बाँट रहे हैं। पत्नी के गहनों पर ब्याज दर ब्याज का लम्बा हिसाब है, कई देनदारियों से अम्माँ की भरी हुई किताब है। बेटे को अभी शिक्षा दिलवाना भी जरूरी है, तो बेटी की शादी भी मुझ गरीब की मजबूरी है। गीत है कि अब भी कानों में रस घोलता है, मन भी बेकाबू हो बार-बार बोलता है कि इक बंगला बने न्यारा, और सोचकर रह जाता हूँ कि मैं क्या करूँ बेचारा।

Source : मनोहर पुरी

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