दूतावास बंद होने से बचाने में जुटी निरुपमा
|
This story has been read 482 times.
|
Share |
|
Saturday 10 Oct, 2009 05:11 PM
नई दिल्ली काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर आत्मघाती हमले के अगले ही दिन सुरक्षा इंतजामों का जायजा लेने शुक्रवार को काबुल पहुंचीं विदेश सचिव निरुपमा राव का एजेंडा दूतावास को बंद होने से बचाने का भी है। जान हथेली पर रख नौकरी कर रहे कई अधिकारियों ने दूतावास अस्थायी तौर पर बंद करने के लिए दबाव बढ़ाना शुरू कर दि ा है। युद्धग्रस्त मुल्क में अपने कूटनीतिकारों के इस रुख से चिंतित विदेश मंत्रालय ने कोशिशें तेज कर दी हैं कि दूतावास बंद होने की नौबत न आए। आत्मघाती हमले के फौरन बाद निरुपमा का काबुल कूच करना मंत्रालय की इसी रणनीति का हिस्सा है।
सूत्रों के अनुसार अमेरिका भी लगातार कोशिश कर रहा है कि भारत काबुल स्थित अपना दूतावास बंद न करे। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ऐसे किसी भी कदम से तालिबान के हौसले बढ़ेंगे। वहीं उनसे लोहा ले रहे अमेरिकी और नाटो देशों की सेना का मनोबल टूटेगा।
सूत्रों की मानें तो काबुल स्थित भारतीय दूतावास को अस्थाई तौर पर बंद करने के अधिकारियों के बढ़ते दबाव की भनक अमेरिका को भी लग चुकी है। अमेरिकी कूटनीतिकारों ने कोशिश भी शुरू कर दी है कि भारत ऐसे किसी दबाव में न आ पाए। दिल्ली में गुरुवार को अमेरिकी राजदूत टी. रोएमर की विदेश सचिव के साथ हुई मुलाकात को वाशिंगटन की इस कोशिश से जोड़ कर भी देखा जा रहा है।
उधर काबुल में भारतीय राजदूत जयंत प्रसाद से लेकर सभी अधिकारियों के साथ राव ने शुक्रवार को अलग-अलग बातचीत की। विदेश सचिव ने उन्हें समझाया कि अफगानिस्तान में अपनी भूमिका काफी आगे बढ़ा चुके भारत को इस मौके पर दूतावास बंद करने जैसे किसी भी कदम से कूटनीतिक नुकसान होगा। वहीं विश्व बिरादरी के बीच ऐसे किसी फैसले से भारत की छवि खराब होने का हवाला भी दिया गया। यह भी कहा गया कि इससे सारे किए-कराए पर पानी भी फिर सकता है और तालिबान तो यही चाहता है। भारत को अफगानिस्तान से निकाल फेंकने के मकसद से ही तालिबान ने दूतावास पर हमलों का सिलसिला जारी रखा है।
जानकार सूत्र बताते हैं कि पिछले साल जुलाई में दूतावास पर हुए पहले आत्मघाती हमले के बाद से ही वहां का स्टाफ काफी भयभीत है। उनका डर इस खुलासे ने और बढ़ाया है कि इस तरह के हमले महज कुछ तत्वों के कारनामे नहीं हैं, बल्कि इसमें पाकिस्तान सरकार की एजेंसियों की मिलीभगत और उनकी सोची-समझी साजिश है।
साभार / स्त्रोत -
|
|
|
|