तेल, गैस दाम बढ़ाने की सिफारिश
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Wednesday 02 Sep, 2009 03:29 PM
नई दिल्ली शुक्र है कि केंद्र सरकार योजना आयोग की सभी सिफारिशों को आंख मूंदकर नहीं स्वीकार करती है। अगर ऐसा हो जाए तो अगले कुछ दिनों में ही न केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों की मार जनता को झेलनी पड़ेगी, बल्कि कोयले के दामों बोझ तो आम लोगों के साथ उद्योग जगत को भी उठाना पड़ेगा। मंगलवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिं की अध्यक्षता में हुई योजना आयोग की पूर्ण बैठक में एकीकृत ऊर्जा नीति पर पेश प्रपत्र में ऐसे ही कई सुझाव दिए गए हैं। आयोग ने साफ तौर पर कहा है पेट्रोलियम व कोयला कंपनियों को अपने उत्पाद की कीमत तय करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए।
योजना आयोग के सदस्य [ऊर्जा] किरीत एस पारिख की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने समग्र ऊर्जा नीति का मसौदा तैयार किया है। इसमें सरकार से कहा गया है कि रसोई गैस और किरासिन को दी जाने वाली सब्सिडी लक्षित समूह तक पहुंचाने के लिए अब ठोस कदम उठाने का वक्त आ गया है। क्योंकि इससे कोई भी मकसद पूरा नहीं हो रहा है। इसी तरह से पेट्रोल-डीजल व कोयले की कीमत निर्धारण में सरकार की अहम भूमिका होने के चलते भी कई तरह की दिक्कतें पैदा होती हैं। योजना आयोग ने कहा है कि सरकार को इन तीनों उत्पादों की कीमतों को या तो अंतरराष्ट्रीय स्तर से संबंधित कर देनी चाहिए या फिर कंपनियों को कीमत तय करने की आजादी मिलनी चाहिए। जहां तक गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की बात है तो उन्हें सब्सिडी देने की खातिर अलग से व्यवस्था करने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं।
योजना आयोग ने एकीकृत ऊर्जा नीति बनाने के उसके पुराने सुझावों को लागू करने में केंद्र सरकार के स्तर पर हो रही लेट लतीफी को भी आड़े हाथों लिया है। आयोग ने कहा है कि पेट्रोलियम उत्पादों को दी जाने वाली सब्सिडी अमूमन पूरी तरह से गलत हाथों में जा रही है। प्रशासनिक मूल्य व्यवस्था होने के चलते निजी कंपनियां पेट्रोलियम नेटवर्क बिछाने के लिए आगे नहीं आ रही हैं। गैस कीमत निर्धारित करने को लेकर आयोग का कहना है कि पेट्रोलियम मंत्रालय को नई नीति बनाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि बिजली उत्पादन को पर्याप्त मात्रा में गैस उचित कीमत पर उपलब्ध हो सके। इसी तरह से इंटरनेट के माध्यम से निविदा के जरिए कोयले की बिक्री की रफ्तार बढ़ाने की बात कही गई है।
आयोग ने कई नई सिफारिशें की हैं। मसलन बिजली परियोजनाओं से विस्थापित लोगों को उत्पादित बिजली का एक फीसदी देने की व्यवस्था करने की बात पहली बार कही गई है। इससे बिजली परियोजनाओं के जमीन अधिग्रहण को लेकर हो रही दिक्कतों को दूर किया जा सकता है। जलावन के लिए लकड़ी की दिक्कतों को देखते हुए आयोग ने पहला सुझाव तो यह दिया है कि हर आबादी के एक किलोमीटर के भीतर जलावन के लिए विशेष किस्म के जंगल लगाए जाने चाहिए। साथ ही निर्धारित समय सीमा के भीतर हर घर में रसोई गैस अथवा पाइप गैस या फिर किरासिन पहुंचाने की नीति बनाई जानी चाहिए।
साभार / स्त्रोत -
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