बागियों का अभयारण्य बनी कांग्रेस
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Thursday 16 Apr, 2009 03:23 PM
ग्रेस में 'राजनीतिक बगावत' की जो नई पटकथा लिखी जा रही है, उसमें पार्टी बागियों का 'अभयारण्य' बनी दिखती है। छोटी-बड़ी पार्टियों से निकले या निकाले गए नेताओं का नया ठौर कांग्रेस ही बनी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस ने जिस तरह दूसरे दलों के बागियों को अपनाया, उससे साफ है कि वहां अपनी खोई राजनीतिक मीन हासिल करने के लिए पार्टी इनके भी आसरे है।कांग्रेस में ताजा शुमार हुए बागियों के मुख्यत: दो प्रकार हैं। पहली सूची में वे जिन्होंने 22 जुलाई 2008 को परमाणु करार के मुद्दे पर अपनी पार्टियों को गच्चा देकर विश्वासत मत के पक्ष में मतदान किया था। करीब एक दर्जन ऐसे सांसदों में एक-दो को छोड़ कर कांग्रेस ने सबको टिकट दिया है। इनमें मध्यप्रदेश के दमोह से भाजपा के बागी सांसद चंद्रभान सिंह, कर्नाटक में बेंगलूर मध्य से एच.टी. सांगलियान, धारवाड़ से मंजूनाथ कुन्नुर, गुजरात के सुरेंद्रनगर से सोमाभाई पटेल, शिवसेना के बागी सांसद हरिभाई राठौड़ और अकाली दल से बगावत करने वाले सुखदेव सिंह लिबड़ां को पंजाब के फतेहगढ़ साहिब से टिकट मिला है।उत्तर प्रदेश और बिहार में अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने और संगठन में चेतना लाने के लिए पार्टी ने दूसरी पार्टियों के 'दिलजले नेताओं' या फिर टिकट नहीं मिलने पर बागी बने चेहरों को अपनाने का फैसला किया। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे अधिक दूसरे दलों के बागियों को कांग्रेस ने ही उम्मीदवार बनाया है। लेकिन इससे उन कार्यकर्ताओं में रोष है जो कांग्रेस की खस्ता हालत में भी हमेशा पार्टी के प्रति निष्ठावान रहे। इन आयातित चेहरों की उम्मीदवारी की प्रतिक्रिया हुई मगर नेतृत्व यूपी-बिहार में आधार बढ़ाने के लिए इस कदम को जरूरी मानता है। इसीलिए तो बिहार में राजद प्रमुख लालू प्रसाद के बागी साले साधु यादव, रमई राम, गिरधारी यादव, लोजपा की रंजीत रंजन, जदयू की लवली आनंद को कांग्रेस ने रातोंरात उम्मीदवार बना डाला। उत्तरप्रदेश में भाजपा, सपा और बसपा से निकले दर्जन भर नेता कांग्रेस के टिकट पर ताल ठोक रहे हैं। इनमें राजबब्बर और बेनी प्रसाद वर्मा के अलावा सपा से बगावत कर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सलीम शेरवानी और एस.पी.सिंह बघेल भी हैं। वहीं भाजपा के बागी सोमपाल शास्त्री और रमेश चंद्र तोमर भी पंजे पर किस्मत आजमा रहे हैं। यूपी में ही रमेश दुबे और सूर्यमणि त्रिपाठी ने टिकट कटते ही बसपा को छोड़ कांग्रेस में आ गए और अब 'हाथ' के बूते 'हाथी' को पटखनी देने चले हैं।
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