वरना हम भी आदमी थे काम के
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Tuesday 24 Feb, 2009 09:51 PM
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी काम के।
मियां गालिब ने जब यह शेर लिखा होगा, वह समय कुछ ओर था, उस समय का इश्क पाक दामन, इबाबत का दूसरा रूप माना जाता था। जहां इज्जत सरेआम नीलाम नहीं होती थी। जान जुदा हो जाए, पर दामन में दाग नहीं लगता था। आज इश्क का रूप ही बदल गया है। चार दिन की मुलाकात कुछ मीठी-मीठी ब तें धन-दौलत का आंकलन भावनाओं में बहकर युवक-यवती का घर से भाग जाने को इश्क, मोहब्बत, प्यार कहा जाता है। आप और हम चाहे इस रोग से पीडत न हो, लेकिन अधिकांश युवक-युवतियां इस भयंकर रोग से पीडत है। इसमें दोष इनका नहीं है। यह तो उम्र का तकाजा है, अगर युवक-युवती इश्क, मोहब्बत, प्यार के नागपाश में नहीं फसेंगे, तो क्या बुढापे में।
इश्क के कई रूप है, जो समय व उम्र के साथ बदलते जाते है। बाल्यकाल से जब बच्चा युवाकाल यानि यौवन की ओर बढता है उसका आकर्षण रूप, वासनात्मक होता है। युवक-युवती से दोस्ती करना चाहता है, युवती भी युवक के प्रति आकर्षित होती है। शनैः शनैः यह आकर्षण भावनाओं में बहकर भागने, प्रेम विवाह आदि के रूप में बदल जाती है। ऐसे में कदम परम्परा, संस्कृति व संस्कारों के विपरीत माने जाते है। प्रेम विवाह की सफलता का प्रतिशत कम ही आंका जाता है। दरअसल भावना में भवकर उठाए कदम अक्सर असफलता की ओर ले जाते है।
इसी तरह इश्क का दूसरा रूप शौक है। शौक भी कई प्रकार के होते है। जैसे लिखने, पढने, नेतागिरी, शराब सेवन, जुआ खेलना आदि। यह शौक हर वर्ग के युवक या बुजुर्ग या किसी भी उम्र में जन्म ले सकता है। ऐसे शौक धीरे-धीरे परवान चढते है। जब यह चरम सीमा पर पहुंच जाते है, तब मानव को अपने शौक के सिवाय कुछ भी दिखाई नहीं देता, ऐसी अवस्था को इश्क ने कहा जाए, तो क्या कहा जाए।
इश्क वह रोग है, जिसका निदान वैद्य, हकीम, चिकित्सक के पास नहीं है। इश्वर भी इस रोग को फैलने से नहीं रोग सकता है क्योंकि किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए लगन, परिश्रम की आवश्यकता होती है। यह लगन, परिश्रम भी तो एक तरह का इश्क ही है।
साभार / स्त्रोत -
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