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वर्ल्ड हैड नेक कैंसर डे

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27 Jul, 17 19:55
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वर्ल्ड हैड नेक कैंसर डे नई दिल्ली. देशभर में प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक मुख और गले के कैंसर रोगी सामने आ रहे है, और जिनमें से 50 प्रतिशत की मौत बीमारी की पहचान के अंतराल में ही हो जाती है। इसमें युवा अवस्था में होने वाली मौतों का कारण भी मुंह व गले का कैंसर मुख्य है। हालांकि पूरी दुनियंाभर में विश्व गला व सिर कैंसर दिवस आज ही के दिन मनाया जा रहा है देश के 96 प्रतिशत युवा आबादी जानती है कि चबाने वाले तंबाकू उत्पाद ही गंभीर बीमारियेां (कैंसर) का कारण बनते हैै। इसका खुलासा ग्लोबल एडल्ट्स टोबैको सर्वे (गेट्स-2)2017 द्वारा जारी रिपोर्ट में हुआ है।
वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिमस (वीओटीवी)के स्टेट पैटर्न व कैंसर रोग विशेषज्ञ डा. हरित चतुर्वेदी बतातें है कि ग्लोबल एडल्ट्स टोबैको सर्वे (गेट्स-2) 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में गत सात वर्षो में 15 साल से अधिक उम्र के 19.9 करोड़ लोग किसी न किसी रुप मंेे चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का उपभोग करतें है। जबकि चबाने वाले तंबाकू उत्पादेां पर 85 प्रतिशत सचित्र चेतावनी को देखकर 46.7 प्रतिशत लोगों ने इसे छोड़ने के बारे में सोचा, जबकि वर्ष 2009 -10 में 33.8 प्रतिशत लेागांे ने इसे छोड़ने के बारे में सोचा था। वंही 96.4 प्रतिशत युवा वर्ग जानता है कि चबाने वाला तंबाकू ही गंभीर बीमारियों(कैंसर) का कारण है। इसमें 96.4 प्रतिशत पुरुष, 94.8 प्रतिशत महिलाएं, वंही शहरी क्षेत्र में 96.8 प्रतिशत, ग्रामीण क्षेत्रों में 95 प्रतिशत लोग इसमें शामिल है। पिछले सर्वे में 88.8 प्रतिशत लोग ही जानते थे कि गंभीर बीमारियों का कारण तंबाकू है। ये प्रतिशत बढ़ा है।
गेटस का इससे पहले 2009-10 में सर्वे हुआ था जिसके सात साल बाद दूसरा सर्वेे 2016-17 में हुआ जो हाल ही में रिलीज हुआ। यह सर्वे भारत सरकार के द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा कराया है। यह सर्वे देश के 30 राज्यों व दो केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया। वंही यह 74 हजार 73 लोगों पर इसका सर्वे किया गया। जिसकी आयु 15 वर्ष से अधिक थी।
सरकार के द्वारा जनहित में इन उत्पादों पर लिये गए निर्णय से भारत में बढ़ते मुंह व गर्दन के कैंसर को कम करने में अह्म भूमिका साबित हुई है।
डा.चतुर्वेदी बतातें हैं कि देशभर में लाखों लोगेंा में देरी से इस बीमारी की पहचान, अपर्याप्त इलाज व अनुपयुक्त पुनर्वास सहित सुविधाअेां का अभाव है। करीब 30 साल पहले तक 60 से 70 साल की उम्र में मुंह और गले का कैंसर का कैंसर होता था लेकिन अब यह उम्र कम होकर 30 से 50 साल तक पहुंच गई। वही आजकल 20 से 25 वर्ष के कम उम्र के पाश्चात्यकरण तथा युवाअेां में स्मोकिंग को फैशन व स्टाइल आइकान मानना है। मुंह के कैंसर के रोगियों की सर्वाधिक संख्या भारत में है।
भारत में पूरे विश्व की तुलाना में धूम्ररहित चबाने वाले तंबाकू उत्पाद (जर्दा,गुटखा,खैनी,) का सेवन सबसे अधिक होता है। यह सस्ता और आसानी से मिलने वाला नशा है। पिछले दो दशकेां में इसका प्रयोग अत्यधिक रुप से बढ़ा है, जिस कारण भी हैड नेक कैंसर के रोगी बढ़े है।
डा.चतुर्वेदी बतातें है कि ’इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिर्सच द्वारा वर्ष 2008 में प्रकाशित अनुमान के मुताबिक भारत में हैड नेक कैंसर के मामलों में वृद्वि देखी जा रही है। कैंसर में इन मामलों में नब्बे फीसदी तम्बाकु, मदिरा व सुपारी के सेवन से होतें है और इस प्रकार के कैंसर की रोकथाम की जा सकती है।’
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान (आईसीएमआर) की रिपोर्ट मे भी इस बात का खुलासा किया गया है कि पुरुषों में 50ः और स्त्रियों में 25ः कैंसर की वजह तम्बाकू है। इनमें से 60ः मुंह के कैंसर हैं। धुआ,ंरहित तम्बाकू में 3000 से अधिक रासायनिक यौगिक हैं, इनमें से 29 रसायन कैंसर पैदा कर सकते हैं।
उन्होने कहा कि हैड नेक कैंसर के मामले राष्टीय स्वास्थ्य येाजनाअेंा, वंचित लोगों, परिवारों व समुदायों पर भार बढा रहे हैं। भाग्यवश हैड नेक कैंसर से जुडे अधिकांश, मामलों में यदि बीमारी का पता पहले लग जाये तो इसे रोका जा सकता है और ईलाज भी किया जा सकता है। लेकिन लाखों लाखों लोग रोग की देरी से पहचान, अपर्याप्त ईलाज व अनुपयुक्त पुनवर्वास सुविधाओं के शिकार हो जाते है।’ जिस कारण कितनी ही मातांए व पत्नी व बहिने परिवारजनो से वंचित हो जाती है।
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के प्रोफेसर और कैंसर सर्जन डा. पंकज चतुर्वेदी जो इस अभियान की अगुवाई वैश्विक स्तर पर कर रहे है, कहते है ’ हैड नेक कैंसर के नियंत्रण के लिये सरकारो, एनजीओ, चिकित्सा व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों, शिक्षा व उघोग संस्थानों सहित बहु क्षेत्रिय सहयोग की आवश्यकता है। हैड नेक कैंसर पर प्रभावी नियंत्रण और ईलाज की और वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिये अंतर्राष्टीय फेडरेशन ऑफ हेड एण्ड नेक ऑनोलोजिक सोसाईटिज - आईएफएचएनओएस- ने जुलाई 27 को विश्व सिर, गला कैंसर दिवस -डब्ल्यु एचएनसीडी- के रूप में मनाये जाने का प्रस्ताव रखा और आज यह मनाया जाने लगा है। फेडरेशन को इसके लिये अनेक सरकारी संस्थानों, एनजीओ, 55 से अधिक सिर व गला कैंसर संस्थानों व 51 देशों का समर्थन प्राप्त है।
डा.पंकज चतुर्वेदी बतातें है कि एशियन पेसिफिक जर्नल ऑफ कैंसर प्रिवेंशन 2008 व 2016 में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार 2001 में पुरुषेंा में मंुंह का कैंसर के 42725 वंही 2016 में 65205,वंही महिलाअेंा में 22080 व 35088, गले और श्वासं नली 49331, 75901, महिलाअेंा में 9251,14550, भोजन नली 24936 व 38536 वंही महिलाअेंा में 17511व 28165, अमाश्य में 20537 व 31538 वंही महिलाअेंा में 11162 व 17699, फैंफड़े 39262 व 60730 वंही महिलाअेंा में 9525 व 15191,स्तन कैंसर महिलाअेां में 89914 व 140975, गर्भाश्य महिलाओं में 79827 व 125821 तथा अन्य तरह के 214967 व 315840 तथा महिलाअेां में 166629 व 252410 रोगी पाए गए।
संबध हैल्थ फांउडेशन के ट्रस्टी संजय सेठ ने कहा कि देश में अनेक परेशानियों के बावजूद, हालंाकि गुटखे पर, जो की एक धुंआ रहित औधोगिक उत्पाद है, पर लगभग पूरे भारत पर प्रतिबंध लग गया है। गुटखे के अलावा सभी राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सितंबर 2016 से सुगंधयुक्त चबाने वाले तम्बाकु उत्पदों पर प्रतिबंध लगा दिया है। ’तम्बाकु पीडितों की आवाज’ नामक तम्बाकु पीडितों के स्वयं के द्वारा चलाये गये निरंतर आंदोलन के परिणामस्वरूप यह प्रतिबंध प्रभाव में आया। इस आंदोलन से देश के नामी कैंसर विशेषज्ञ भी जुड गये।
वर्ष 2014 में जॉन हॉपकिंस यूनिर्वसिटी ब्लूूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हैल्थ व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुटखा प्रतिबंध के प्रभावों पर एक अध्यन करवाया। अध्ययन के दोरान देश के सात राज्यों: असम, बिहार, गुजरात, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट, उड़ीसा और दिल्ली में 1,001 वर्तमान व पूर्व गुटखा उपभोक्ताओं और 458 खुदरा तम्बाकु उत्पाद विक्र्रताओं पर सर्वे किया गया।
इस सर्वे में सामने आया कि 90 फीसदी रिस्पोडेंन्ट्स ने इच्छा जताई कि सरकार को धुंआ रहित तम्बाकु के सभी प्रकार के उत्पादों की बिक्री और डिस्टिब्यूशन पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। इस पर 92 फीसदी लोगों ने प्रतिबंध का समर्थन किया। 99 फीसदी लोगों ने कहा कि भारतीय युवाओं के स्वाथ्य के लिये प्रतिबंध अच्छा है। जो लोग प्रतिबंध के बावजूद गैरकानूनी ढंग से पैकेज्ड तम्बाकु का सेवन करते है उनमें से आधे लोगों ने कहा कि प्रतिबंध के बाद उनके गुटखा सेवन में कमी आई है।
80 फीसदी लोगो ने विश्वास जताया कि प्रतिबंध ने उन्हें गुटखा छोडने के लिये प्रेरित किया है और इनमें से आधे लोगों ने कहा उन्होने वास्तव में छोडने की कोशिश भी की है।
प्रतिबंध के बाद जिन लोगों ने गुटखे का सेवन छोडा उनमें से प्रत्येक राज्य से एक बडे हिस्से -41 -88 फीसदी ने कहा कि प्रतिबंध के बाद उन्होने गुटखे का सेवन छोड दिया
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