चेन्नई के एक स्कूल में एक पंद्रह वर्षीय छात्र द्वारा अपनी शिक्षिका की चाकू मारकर हत्या कर देने की घटना जितनी दिल दहला देने वाली है, उतनी ही उद्वेलित और बेचैन करने वाली भी।
छोटी उम्र के छात्रों में गहराती हताशा और कभी आत्महत्या, तो कभी हत्या में व्यक्त होने वाली उनकी प्रतिक्रिया समाज में गहराते गंभीर रोग का लक्षण है। यह प्रवृत्ति शिक्षा प्रणाली में छात्रों के मूल्यांकन से जुड़ी एक मूलभूत समस्या और घरों में माता-पिता से बच्चों की बढ़ती भावनात्मक दूरी की तरफ इशारा करती है।
छात्रों की संपूर्ण प्रतिभा के मूल्यांकन के आधुनिक सिद्धांतों के बावजूद स्कूलों में सिर्फ सिलेबस की पढ़ाई में प्रदर्शन के आधार पर बच्चों का जायजा लेने का रुझान आज भी हावी है, जिसका उन छात्रों पर बेहद बुरा असर होता है, जो इस कसौटी पर कमजोर रहते हैं। उनकी चरम प्रतिक्रिया हमें सिर्फ अफसोस जताने की स्थिति में छोड़ जाती है। यह साफ है कि बदलते सामाजिक उसूलों के साथ शिक्षा को जोडऩे में हमारी विफलता बच्चों को भावावेग में अपराध करने को मजबूर कर रही है।
स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है, क्योंकि आम मध्यवर्गीय घरों में माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय घटता जा रहा है। बच्चों की पीड़ा एवं मनोविज्ञान को समझने और उसके मुताबिक उन्हें गाइड करने की जिम्मेदारी निभाने के लिए आवश्यक समय या इच्छाशक्ति के अभाव ने घरों के अंदर भी एक खाई पैदा कर रखी है। भावनात्मक लगाव की भरपाई आर्थिक रूप से उम्दा जीवनशैली देकर नहीं हो सकती, लेकिन दुर्भाग्य से यही चलन अब परिवारों में बढ़ रहा है।
ऐसे में अगर कोई बच्चा प्रतिशोध पर आधारित बॉलीवुड की कोई फिल्म देखकर वैसा ही बदला लेने पर उतर आता है, तो यह भले लोमहर्षक हो, लेकिन आश्चर्यजनक नहीं है। इसलिए ऐसी घटनाओं को अपवाद मानकर छोड़ नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि इससे शिक्षा के नीति-निर्धारकों, संचालकों, शिक्षकों और हर माता-पिता को सबक लेने की जरूरत है। अगर हम बाल मन की महत्वाकांक्षाओं और मायूसियों को समझ नहीं सकते, तो हम एक स्वस्थ समाज नहीं बना सकते।