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भारत की 90% वंचित आबादी की दुर्दशा

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14 May, 18 09:33
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उत्तर प्रदेश के हाथरस में दलितों को भागवत कथा सुनने हेतु सार्वजनिक रूप से बैठने पर रोका गया। नहीं रुकने पर मारपीट की गयी। समाचार पत्र की खबर में संविधान को धता बतलाते हुए दलित जाति का उल्लेख किया गया है। पुलिस को तहरीर अर्थात रिपोर्ट नहीं मिली। अतः मामला दर्ज नहीं किया गया। यह खबर अनेक सवाल खड़े करती है:-

----> 01. यूपी में संघ नियंत्रित भाजपा की सरकार है। संघ-भाजपा का कहना है कि दलित हिंदू हैं। मगर यूपी में भागवत कथा सुनने का हक दलितों को नहीं है।
----> 2. अजा वर्ग के विद्वान लोगों को दलित शब्द लिखे या बोले जाने से घोर आपत्ति होती है। मगर इस खबर में तो दलित जाति का उल्लेख किया गया है। अब क्या होगा?
----> 3. अजा वर्ग/दलित जो आमतौर पर सोशल मीडिया पर खुद को हिंदू नहीं होने का दम भरते हैं। यूपी में चार बार उनकी बसपा की सरकार रह चुकी, फिर भी वे भागवत कथा में जाकर पिट रहे हैं। इसके लिये प्राथमिक जिम्मेदारी किसकी है?
----> 4. खबर में पिटने वालों की पहचान दलित जाति के रूप में सार्वजनिक की गयी है, लेकिन पीटने वालों की पहचान और उनके नाम प्रकाशित तक नहीं किये गये हैं। जिससे प्रिंट मीडिया की निष्पक्षता संदेह के घेरे में है!
----> 5. बसपा के लोगों ने पिटने वाले कथित दलित जाति के लोगों के हालचाल पूछे, लेकिन उनकी ओर से पीटने वालों के खिलाफ तुरन्त रिपोर्ट दर्ज करवाने की कार्यवाही की गयी या नहीं, खबर से कुछ पता नहीं चलता?
----> 6. उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रतिपक्षी बसपा, सपा तथा कांग्रेस जैसे मजबूत राजनीतिक दलों की नाक के नीचे यूपी में संघी हिंदुओं का गुंडाराज कायम है, मगर इन सब दलों की चुप्पी क्या अपराधियों तथा सरकार के अवैधानिक कुकृत्यों को बढ़ावा और परोक्ष समर्थन नहीं दे रही?
----> 7. यूपी में ही भीम आर्मी के पराक्रमी और महाबली लोग भी हैं, जो सारे देश से हिंदू आतंक को समूल मिटाने की बात कहकर आम वंचित लोगों को हिन्दुओं के विरुद्ध उकसाते रहते हैं, मगर उत्तर प्रदेश में ही उनके ही लोग हिंदू धर्म कथा सुनने के मोह में पिट रहे हैं?
----> 8. मूलनिवासी षड्यन्त्र के संचालक तथा आदिवासियों को हमेशा को नेस्तनाबूद करने को आतुर वामन मेश्राम, जो बसपा, कांशीराम तथा अम्बेडकर के कार्यों को भी नेस्तनाबूद करके ब्राह्मणों को विदेशी बोलकर खुद को भारत का इंडीजीनियश घोषित करके भारत के 85% लोगों को शूद्र बतलाकर, अपने आप को संसार का सबसे बड़ा शूद्र हितैषी घोषित करता रहता है। वह भी अपने ही लोगों को हिंदू कथा सुनने से नहीं रोक सका?
----> 9. बहुजन को सर्वजन घोषित करके, बसपा को ब्राह्मणों के यहां गिरवी रख चुकी मायावती 4 बार सत्ता में रहकर भी एक भी ऐसा कानून नहीं बना पाई, जिसके भय से वंचितों की ओर उंगली उठाने वाले गुंडा तत्व थर-थर कांपने लगे? बजाय इसके मायावती ने यूपी की मुख्यमंत्री रहते हुए एट्रोसिटी एक्ट को ही निलंबित कर दिया था। मगर तब बसपा भक्त चुप्पी साधे बैठे रहे!
----> 10. जो सुप्रीम कोर्ट एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग की बात कहकर एट्रोसिटी एक को मृतप्रायः घोषित कर चुका है, उस सुप्रीम कोर्ट को यह घटना दिखायी देगी। ऐसी उम्मीद करना वंचितों को खुद को ही धोखे में रखने के समान होगा।
----> 11. ‎एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को गलत कहकर असहमति व्यक्त करने वाली नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार इन घटनाओं के बाद भी वंचितों के हितों की रक्षा हेतु जागेगी, ऐसी उम्मीद कम ही है?
----> 12. ‎अजा एवं अजजा के लिये सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित विधायक और सांसद ऐसी घटनाओं पर लम्बा मौन साध लेते हैं। किसी अज्ञात स्थान पर छिप जाते हैं। ऐसे में संघ नीतियों को लागू करने के लिए ईवीएम की जादूई तकनीक से यूपी के मुख्यमंत्री बनाये गये अकेले योगी को दोष देने से क्या हासिल होगा?
----> 13. ‎यूपीएससी द्वारा क्लास वन का ठप्पा लगा देने के बाद भ्रष्टाचार की गंगोत्री में नहाकर महामानव बन चुके अजा एवं अजजा के ब्यूरोक्रेट्स की पद पर रहते हुए 70 साल की चुप्पी टूटने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती। बेशक उनकी बला से समस्त वंचित समुदायों को सार्वजनिक रूप से बेइज्जत क्यों न कर दिया जाए? क्योंकि उन्होंने तो अगली सात पीढ़ियों की सुरक्षा का इंतजाम कर लिया है।
----> 14. ‎आम वंचितों पर हो रहे अत्याचार के लिये, आम व्यक्ति लंबे समय से अंगड़ाई लेते हुए हुंकार भर रहा था। जिसका प्रतिबिम्ब 2 अप्रेल, 2018 को देश और दुनिया ने देखा। मगर हमारे ही गुलाम राजनेताओं ने 2 अप्रेल के नायकों को जेल में बंद करवा दिया। जो आज तक यातना झेल रहे हैं। अनेक तो ऐसे धूर्त हैं, जो इन निर्दोषों को छुड़वाने के कथित प्रयासों के एवज में अपने सिर युद्ध जीतने जैसा सेहरा बंधवा रहे हैं और अंधभक्त जयकारे लगा रहे हैं!
----> 15. ‎हम वंचित समुदाय जिनकी आबादी 90% है, अपने संवैधानिक हकों की रक्षा के बजाय हिंदू धर्म रक्षा में लगे हुए हैं। दिनरात रामायण, भागवत कथा, यज्ञ करवाने में मशगूल हैं। मंदिर बनवा रहे हैं और क्लास वन इन कामों को संवैधानिक हक बताकर बढ़ावा दे रहे हैं। हम भी लगे हुए हैं। लगें भी क्यों नहीं-ब्राह्मण हमारे दिमांग में बैठकर हमें नर्क का भय दिखा रहा है और साथ ही स्वर्ग प्रलोभन दे रहा है!

उपरोक्त दर्दनाक और आत्मघाती हालातों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन लोगों को नक्सलवाद के नाम पर हर दिन मारे जा रहे हजारों निहत्थे आदिवासियों की हत्याओं तथा आदिवासी महिलाओं तथा नाबालिग बच्चियों के साथ जारी बलात्कार की खबरे बेअसर सिद्ध हो रही हैं, उनमें से उत्तर प्रदेश में धर्मकथा सुनते हुए पिटे दलितों की पिटाई की जिम्मेदारी कौन लेगा?

"नोट: उक्त विवरण पढ़ने के बाद लगता है कि इन विचारों को पढ़ने से वंचित समुदायों के लोगों की नींद खुल सकती है तो इसे आप अपने मित्रों को भी पढ़वा सकते हैं। अन्यथा इसे अनदेखा/डिलीट तो कर ही सकते हो?"
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