आदिवासियों की आजीविका में ‘वाडी’ के जरिए सुधार

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14 Dec, 11 09:35
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अब से कुछ वर्ष बाद, पूर्वी और दक्षिणी जिले में गांवों के दो समूह संतरों और अमरूदों के प्रमुख उत्पादकों का रूप ले लेंगे। इन गांवों में मुख्यत: सिक्किम के लैप्चा और भूटिया नाम के दो आदिवासी समुदाय रहते हैं। श्रम-बहुल, पर खेती की दृष्टि से कम रोजगार वाली परंपरागत व्यवस्था को ‘वाडी’ परियोजना के अधीन ला कर जोत को बाग़ों के रूप में विकसित करने से निश्चित रूप से उनमें बेहतर भविष्य की आशा जगेगी। इस प्रकार यह परियोजना इन लोगों के लिए न केवल टिकाऊ आजीविका सुनिश्चित करेगी, बल्कि उनके सामने प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में कई अन्य समस्याओं का भी समाधान करेगी। सिक्किम में वाडी परियोजना के कार्यान्वयन के लिए पूर्व में रे ग्राम समूह और दक्षिण में केजिंग ग्राम समूह चुने गए हैं। इन ग्राम समूहों का चयन राष्ट्रीय कृषि एवं ग्राम विकास बैंक (नाबार्ड) द्वारा आदिवासी विकास कोष (टीडीएफ) के अधीन किया गया है और इसमें योजना का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए क्रमश: सिक्किम का संयुक्त प्रगतिशील संगठन (यूपीओएस)(स्थानीय गैर-सरकारी संगठन) और कृषि विकास केन्द्र (केवीके) सक्रिय सहयोग कर रहे हैं। वाडी परियोजना के कार्यान्वयन के प्रारंभ में इन ग्राम समूहों का चयन वहां के लोगों द्वारा विकास के माडल को अपनाने में दिखाई गई रुचि के बाद ही किया गया है। इसी प्रकार गैर-सरकारी संगठनों के अधिकारियों और लाभार्थियों को वाडी परियोजना के अधीन कुछ सफल परियोजना क्षेत्रों का दौरा कराया गया ताकि वे इस धारणा को बेहतर तरीके से समझ सकें। इस प्रकार ये दो ग्राम समूह बागान विकास के लिए 300-300 एकड़ भूमि देंगे और इनसे इतने ही आदिवासी परिवारों को टिकाऊ आजीविका और आमदनी के स्रोत उपलब्ध होंगे। इसके अलावा उन्हें विपणन और प्रसंस्करण की सुविधाएं भी प्राप्त होंगी, क्योंकि इन क्षेत्रों को परियोजना के अंग के रूप में लिया जाएगा। ‘वाडी’ एक गुजराती शब्द है जिसका ‘अर्थ छोटा बग़ीचा’ है जिसमें एक या दो एकड़ भूमि रहती है। आदिवासी विकास के लिए बैफ द्वारा गुजरात के वनसडा नामक क्षेत्र में दो दशक तक लगातार प्रयास करने के बाद कारगर यंत्र के रूप में ‘वाडी’ का विकास किया गया है। इस धारणा का देश के लगभग प्रत्येक उस हिस्से में, जहां आदिवासियों की आबादी अधिक है, अत्यधिक सफलता के साथ प्रयोग किया गया है। वाडी, क्षेत्र विशेष के उपयुक्त, किसी फल की फसल या जंगली वृक्षों की उन फसलों का मेल हो सकती है, जो जोत के चारों तरफ उगाई जाती है। ‘वाडी’ माडल में जैविक और विपणन संबंधी आशंकाओं को कम से कम करने के लिए वृक्षों की दो या अधिक फसलों का चयन किया जाता है। सिक्किम के इन दो ग्राम समूहों के लिए संतरे और अमरूद के बाग़ अधिक उपयुक्त पाए गए हैं। वित्त पोषण की एक खास बात यह है कि इसमें अनुदान और ऋण दोनों का मिला-जुला लाभ दिया जाता है। इससे प्रतिभागियों के हित और कार्यक्रम में उनकी भागीदारीत्‍ता सुनिश्चित होती है और प्रतिभागी आत्म निर्भर भी बनते हैं। जैसे-जैसे इस कार्यक्रम में वाडी संस्थानों के साथ प्रगति होती है और आय अर्जन गतिविधियां बढ़ती हैं, आय अर्जन गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिभागियों को ऋण सहायता भी दी जाती है। लघु उद्यमों, जल संसाधन विकास और अन्य जरूरतों के लिए भी ऋण दिया जाता है। सिक्किम क्षेत्र के लिए नाबार्ड ने इस परियोजना पर आने वाले खर्च का 90 प्रतिशत हिस्सा अनुदान के रूप में और 10 प्रतिशत हिस्सा लाभार्थियों द्वारा वहन करने पर जोर दिया है। इस उद्देश्य के लिए 318.89 लाख रूपये का अनुदान घटक आवंटित किया गया है जिसमें से 139.29 लाख रूपये सिक्किम प्रगतिशील संगठन-यूपोस और 179.60 लाख रूपये कृषि विकास केन्द्र के जरिए दिये जाएंगे। ये दोनों संगठन सिक्किम में पाँच वर्षों तक वाडी योजना को कार्यान्वित करने में भागीदार हैं। प्रतिभागियों का आत्मविश्वास बढ़ाने के उद्देश्य से तकनीकी सलाह देने के लिए विशेषज्ञों की भी व्यवस्था की गई है। आदिवासी विकास का वाडी माडल, दृष्टिकोण में समग्र है जो फसलों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन के साथ-साथ अन्य आवश्यकताओं का भी समाधान करता है। हालांकि इस कार्यक्रम का मुख्य जोर वाडी पर है, विकास की अन्य गतिविधियां भी इस से संबद्ध हैं जो पर्यावरण, लिंग और स्वास्थ्य के क्षेत्रों की समस्याओं से निपटते हैं। इनमें वाडियों में भूमि संरक्षण, जल संसाधन विकास, कृषि विकास, महिला विकास और स्वास्थ्य भी शामिल हैं। वाडी के अधीन एक एकड़ माडल में फलों के करीब 60 पौधे और 600 से 800 तक जंगली पौधे लगाये जाते हैं जिससे मौसम की निर्भरता के अधीन पर्याप्त आमदनी और आजीविका सुरक्षा प्रदान की जा सकती है। पाँच वर्षों में एक गांव में परिवार की संख्या के अनुपात से बगीचे तैयार हो जाएंगे और वह सैकड़ों टन फल पैदा करने वाला इलाका बन जाएगा। जहां एक ओर फलों के पौधे चार-पाँच सालों बाद आजीविका के साधन बन जाएंगे, वहां जंगली पौधे बाड़ और छाया प्रदान करने लगेंगे। इसके साथ-साथ जंगली पौधे परिवारों की ईंधन, चारे और इमारती लकड़ी की छोटी-मोटी आवश्यकताओं को पूरा करने लगेंगे। वाडी धारणा का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस योजना के अधीन कोई लाभार्थी, परियोजना के अधीन भूमि को बगीचे के आर्थिक जीवन की समाप्ति अथवा कम से कम 25 वर्ष तक नहीं बेच सकता। इससे न केवल भूमि स्रोत बना रहेगा बल्कि इससे भावी पीढ़ी के लिए सर्वाधिक कीमती संपत्ति सुरक्षित रहेगी। दो जिलों में वाडी परियोजना के सफल प्रयोग के बाद नाबार्ड का इसे सिक्किम के आदिवासी लोगों की अधिक आबादी वाले पश्चिम और उत्तरी जिले में शुरू करने का भी एक प्रस्ताव है।
Source : खगेन्द्रमणि प्रधान@pib.nic.in

यह खबर निम्न श्रेणियों पर भी है: सम्पादकीय
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