हैरान करने वाली है.पेट्रोल कीमतों की अबूझ पहेली

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16 Dec, 11 08:10
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पेट्रो पदार्थ के मामले में भारत आत्मनिर्भर नहीं है. हमें आयात पर निर्भर रहना होता है. आयात के बावजूद तेल की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सकता है. पेट्रो पदार्थ पर लगे करों में कटौती कर इसके मूल्य को काबू में रखा जा सकता है. पिछले साल के जून से जब से पेट्रोल की कीमतें बाजार के हवाले की गयीं, तब से अब तक लगभग दस बार इसकी कीमतों में इजाफ़ा किया जा चुका है. पेट्रोल कीमतों में जिस तेजी से वृद्धि हो रही है, वह हैरान करने वाली है. खाद्य पदार्थ की बढ़ती कीमतों पर बार-बार आश्वासन देने के बावजूद इसे भी नियंत्रित करने में सरकार नाकाम रही है. महंगाई बढ़ने के पीछे कभी वैश्विक कारण तो कभी घरेलू कारण बताये जाते हैं. ऐसा लगता है कि सरकार मान चुकी है कि महंगाई पर नियंत्रण करना उसके बस में नहीं रह गया है. यही वजह है कि इसे नियंत्रित करने का जिम्मा रिजर्व बैंक के हवाले कर दिया गया है. रिजर्व बैंक भी पिछले एक साल में करीब एक दर्जन बार रेपो रेट में बढ़ोत्तरी कर चुका है. रिजर्व बैंक की इन नीतियों से लोन महंगा होता जा रहा है. लोन मंहगा होने से बाजार में मौद्रिक तरलता में कमी आना स्वाभाविक है. लोन महंगा होने से सिर्फ़ मध्यवर्ग पर ही भार नहीं पड़ेगा, बल्कि इससे अर्थव्यवस्था की विकास दर भी प्रभावित होगी. पेट्रोल की कीमतों में इजाफ़ा और रेपो रेट में वृद्धि से महंगाई का बढ़ना तय है. पहले सरकार मूल्यवृद्धि करने से पहले काफ़ी सोच-विचार करती थी, लेकिन अब सरकार कीमतें बढ़ाने और उसके प्रभाव के बारे में ध्यान देती नहीं लगती. सरकार मान चुकी है कि लोग महंगाई के साथ जीना सीख गये हैं. दरअसल सरकार मान रही है कि अभी उसके कार्यकाल का आधा समय बाकी है. ऐसे में महंगाई से उसकी सेहत पर तत्काल कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है. चुनाव आते-आते कई रियायतों की घोषणा कर लोगों के गुस्से पर काबू कर लिया जायेगा. सरकार ने इसी सोच के तहत पिछले साल पेट्रोल की कीमतों का निर्धारण बाजार की कीमतों के आधार पर करने की छूट दे दी. सरकार मानती है कि पेट्रोल का उपभोग समाज का मध्यवर्ग करता है. उसे कीमतें बढ़ने से अधिक फ़र्क नहीं पड़ता. यह सोच गलत है. समाज का एक बड़ा तबका दो पहिया वाहनों का प्रयोग करता है. इस वर्ग की कमाई उतनी नहीं हैं. पेट्रोल की कीमतों का असर उसके बजट पर पड़ता है. देश में केवल 10 फ़ीसदी आबादी ऐसी है जिस पर महंगाई का खास असर नहीं पड़ता है. एक बात सही है कि मध्यवर्ग चुनावों में उतना सक्रिय नहीं रहता है. ऐसे में सरकार की सोच है कि मध्यवर्ग की नाराजगी से चुनाव नतीजों पर खास असर नहीं पड़ेगा. यही वजह है कि सरकार पेट्रोल और लोन की दर बढ़ाने से परहेज नहीं कर रही है. लेकिन इस महंगाई का दूसरा पहलू किसानों को प्रभावित कर रहा है. खाद्य पदार्थो की बढ़ती कीमतों का लाभ किसानों को नहीं बल्कि बिचौलियों को हो रहा है. जबकि कृषि लागत दिनों-दिन बढ़ती जा रही है. ऐसे में लागत के मुताबिक किसान को उचित मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है. इससे कृषि संकट और जटिल होता जा रहा है. अगर बढ़ती कीमतों का लाभ किसानों को मिलता तो यह कृषि क्षेत्र के लिए राहत की बात होती और महंगाई के झटके को वे सहने की स्थिति में होते. लेकिन महंगाई से किसान और गरीब दोनों बेहाल हो रहे हैं. ऐसा लगता है सरकार जमीनी हकीकत को नहीं समझ पा रही है. महंगाई की मार सबसे अधिक गरीबों पर पड़ती है. सरकार के पास महंगाई रोकने के लिए विकल्पों की कमी नहीं है. लेकिन वह उन पर गौर ही नहीं करना चाहती. यह सही है कि पेट्रो पदार्थ के मामले में भारत आत्मनिर्भर नहीं है. घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर रहना होता है. लेकिन आयात के बावजूद तेल की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सकता है. पेट्रो पदार्थ पर कई कर लगे हुए हैं. इन करों में कटौती कर इसके मूल्य को काबू में रखा जा सकता है. मूल्य बढ़ाने के पीछे सरकार तर्क देती है कि तेल कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है और सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ता जा रहा है. देश में जब एक तरफ़ लाखों करोड़ रुपये के घोटाले हो रहे हैं, और दूसरी ओर सरकार सब्सिडी कम करने पर जोर दे, यह बात गले नहीं उतरती. आखिर सरकार की क्या मजबूरी है कि वह लाखों करोड़ रुपये का कॉरपोरेट टैक्स माफ़ कर देती है, लेकिन लोगों पर पड़ रहे महंगाई के बोझ को उठाने के मामले में पीछे हट जाती है. सरकार पिछले दस सालों में लगभग 21 लाख करोड़ रुपये का कॉरपोरट टैक्स राहत दे चुकी है. जबकि देश की कोई भी निजी कंपनी शायद ही घाटे में चल रही है. ऐसे में आम लोगों को राहत पहुंचाने के नाम पर बढ़ती सब्सिडी की बात करना लोगों को भ्रमित करना है. मौजूदा ओर्थक नीतियों की खामियों की सजा आम आदमा को भुगतना पड़ रहा है. ऐसी स्थिति में जनकल्याणकारी योजनाओं से भी आम आदमी की स्थिति में फ़र्क नहीं आने वाला. देश में ऐसे 30 करोड़ लोग हैं जिनकी रोजाना आय बीस रुपये से कम है. बढ़ती महंगाई से इन लोगों की स्थिति और भी दयनीय हो जायेगी. यह सही है कि किसी भी वस्तु की बिक्री वास्तविक कीमत पर होनी चाहिए. सब्सिडी से राजस्व घाटा बढ़ता है. लेकिन सामाजिक संतुलन का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. महंगाई समाज के सभी वर्ग को समान रूप से प्रभावित नहीं करती. महंगाई से भले एक तबके पर फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन देश की बड़ी जनसंख्या इससे बेहाल हो जाती है. कीमतों में बढ़ोतरी से खाद्य वस्तुओं की खपत पर प्रभाव पड़ता है. पैसे वाले भले अपने बजट में कटौती न करें लेकिन कम आय वाले लोग अपने खाने-पीने के सामान में कटौती करने पर मजबूर होते हैं. पेट्रोल की कीमतों के साथ ऐसा नहीं है. ऐसा नहीं है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने के बाद लोग अपने जरूरी के कामों के लिए दो पहिया वाहनों का प्रयोग करना बंद कर देंगे. यह अकसर उनकी रोजी-रोटी से जुड़ा होता है और उनकी जरूरतों में शुमार हो चुका है. पेट्रोल की कीमत बढ़ने से ईंधन पर खर्च बढ़ जाता है. इसके उलट उच्च मध्यवर्ग पर इसका खास असर नहीं होता, क्योंकि पेट्रोल का बजट उनकी आय का मामूली हिस्सा होता है. सरकार को जमीनी हकीकत समझते हुए मौजूदा मूल्य प्रणाली में बदलाव करने की पहल करनी होगी.(www.prabhatkhabar.com)
यह खबर निम्न श्रेणियों पर भी है: सम्पादकीय
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