करूणा का दीप

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05 Dec, 11 12:22
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आज मधुरतम गीत रचूँगी सुध - बुध
ये बिसरा दूँगी मैं विहंगिनी तेरी
तेरे उर नभ में उड जाउँगी नश्वर जग की धूमिल छाया में भ्रम
ये उत्पन्न किये तूने दिल के टुकडे को कितने अंधे आवरण दिए
तू असीम मैं सीमित फिर भी कैसे तुझमें समा जाउँ
विकल वेदना मेरी तुझको कैसे ह्दय में छुपा पाउँ दुख
महान वरदान तेरा उसमें ही आई हूँ करीब है
करूणामय तेरी करूणा सम्पन्न हो जाती मैं गरीब
जब भी दुःखकी आंधी चली हत ह्दय ये तेरे चरण गिरा
तेरी करणा का दीप जला सत्य को और भी पहचाना सुख में भी
था दीप प्रकाशित देख सकी न
फिर भी तुझे आज अंधेरे में पहचानूँ कुछ तो क्षमता मिली मुझे । 30.3.1978
Source : सुलेखा श्रीवास्तव

यह खबर निम्न श्रेणियों पर भी है: गीत-गजल
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