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समस्त पृथिवी पर एक दयानन्द ही पूर्ण ब्रह्मचारी

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12 Jun, 18 12:00
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समस्त पृथिवी पर एक दयानन्द ही पूर्ण ब्रह्मचारी
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श्रीमद्दयानन्द ज्यातिर्मठ आर्ष गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून के तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव के दूसरे दिन 2 जून, 2018 के सायंकालीन सत्र में आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान पं. वेदप्रकाश श्रोत्रिय का प्रभावशाली सम्बोधन हुआ। हम यहां उनका सम्बोधन प्रस्तुत कर रहे हैं।

अपने सम्बोधन के आरम्भ आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि विद्या ऐसी चीज है जिसे सारी दुनिया चाहती है। उन्होंने कहा कि सौभाग्यशाली मनुष्य वह होता है जिसे विद्या चाहती है। विद्वान वक्ता ने उन विद्वानों का वर्णन किया जो विद्या को चाहते थे। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत विद्या ने महर्षि दयानन्द का उनके जीवन के समस्त गुणों के कारण वरण किया था। आचार्य श्रोत्रिय जी ने कहा कि कि ऋषि दयानन्द ने अपनी विद्या के कारण समस्त विश्व को आलोकित किया था। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानन्द की विद्या का संसार के विद्वानों ने लोहा माना था। आचार्य जी ने अपनी न्यूजीलैण्ड यात्रा और वहां एक विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिये जाने का उल्लेख किया। विश्वविद्यालय के डीन ने श्रोत्रिय जी से उनकी योग्यता को जानने के लिए कुछ प्रश्न किये। इस पर श्रोत्रिय जी ने कहा कि भारत प्राचीन काल से सभी परा व अपरा विद्यायों का केन्द्र रहा है। श्रोत्रिय जी ने उन्हें कहा कि यदि तुम मेरी परीक्षा लेते हो तो इसका यह अर्थ है कि सूर्य पूर्व से नहीं पश्चिम में उदय होता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता। आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि प्राचीन भारत में हमारे ऋषि व विद्वान जिस मार्ग पर चलते थे उसी मार्ग पर सारा संसार चलता था। उन्होंने कहा कि सूर्य पूर्व दिशा से उदित नहीं होता अपितु सूर्य जिस दिशा में उदित होता है उस दिशा को ही पूर्व दिशा कहा जाता है। विद्वान आचार्य ने कहा कि वेद ज्ञान के सूर्य हैं। वेदों का उदय भी भारत में ही हुआ था। उनसे प्रश्न किया गया था कि ब्रह्माण्ड कुल कितने तत्वों से मिलकर बना है। आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने बताया कि उन्होंने उत्तर में कहा कि वेदों के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कुल 3,342 तत्वों से मिलकर हुई है।

आचार्य श्रोत्रिय जी ने कहा कि यदि समस्त ऋषियों के स्वरुप को देखना चाहते हैं तो आपको ऋषि दयानन्द के स्वरुप को देखना होगा। इससे आपको समस्त ऋषियों का स्वरुप विदित हो जायेगा। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानन्द के वेद गुरु और योग गुरु अलग अलग थे। ऋषि दयानन्द ने मथुरा में दण्डी गुरु स्वामी विरजानन्द जी ने संस्कृत का आर्ष व्याकरण पढ़ा था। स्वामी दयानन्द एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो बिना परम्परा के महर्षि बने थे। उनके पास ऋषि बनने के लिए न पूर्व जन्म के कर्म थे, न प्रारब्ध था और न उसके अनुरुप आचार्य आदि ही थे। दयानन्द जी अपने पुरुषार्थ से ऋषि बने इसलिए मैं दयानन्द जी को महर्षि दयानन्द कहूंगा।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने स्वामी दयानन्द के मथुरा में गुरु विरजानन्द जी से संस्कृत व्याकरण के अध्ययन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब प्रथम स्वामी दयानन्द गुरु विरजानन्द जी की कुटिया पर पहुंचे थे तब कुटिया के भीतर से विरजानन्द जी ने पूछा था, बाहर कौन है? इसका उत्तर स्वामी दयानन्द जी ने यह कहकर दिया था कि यदि मुझे यह पता होता कि मैं कौन हूं, तो मुझे आपके पास आने की आवश्यकता नहीं थी। श्रोत्रिय जी ने अलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि जिस दिन स्वामी विरजानन्द जी ने दयानन्द के लिए अपनी कुटिया का द्वार खोला था उस दिन यह द्वार कुटिया का नहीं वरन् भारत के सौभाग्य का द्वार खुला था। श्रोत्रिय जी ने कहा कि स्वामी दयानन्द ने अपने वेद और शास्त्रों के ज्ञान के प्रकाश से सारे संसार को प्रकाशित किया। विद्वान वक्ता ने कहा कि स्वामी दयानन्द ने लोगों की धमनियों वा जीवन में धर्म के यथार्थ स्वरूप का संचार किया था।

आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि दयानन्द के समय व उनसे पूर्व के सहस्रो शताब्दियों के काल में कोई योगी था, कोई विद्वान था, परन्तु ऋषि कोई नहीं था। उन्होंने कहा कि एक दयानन्द ही था इस समस्त पृथिवी पर जो पूर्ण ब्रह्मचारी, पूर्ण योगी और पूर्ण ऋषि था। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द ने वाममार्गियों द्वारा वेदों पर लगाई कालिमा को सदा के लिए धो दिया। उन्होंने कहा कि दयानन्द जी का नाम लेने हमें दुनिया सुरक्षित लगती है। श्रोत्रिय जी ने स्वामी दयानन्द जी के जीवन के अनेक पहलुओं का वर्णन किया। आचार्य श्रोत्रिय जी ने गुरुकुलों व वहां संस्कृत व्याकरण एवं वेद विद्या के अध्ययन-अध्यापन का उल्लेख किया। गुरुकुल पौंधा के आचार्य डा. धनंजय जी को सम्बोधित कर उन्होंने कहा कि धनंजय! वेद विद्या की सुरक्षा करना तेरा काम है। तुम मर जाना पर वेद विद्या की रक्षा से कभी समझौता मत करना। ऋषि दयानन्द के बताये वेद विद्या अध्ययन-अध्यापन के उपदेशों से ही तुम्हारा मार्ग प्रशस्त होना चाहिये। आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने आगे कहा कि जब समाज के लोग गुरुकुल के वेद विद्या से सम्पन्न ब्रह्मचारियों को देखेंगे तो वह कहेंगे कि माता-पिता की आवश्यकता तो जन्म देने के लिए है परन्तु गुरुकुल के आचार्य व उसकी कोख में ब्रह्मचारी की माता व पिता दोनों का समावेश है जो किसी सन्तान को वेद विद्या से आलोकित व प्रकाशित कर सकती है। आचार्य श्रोत्रिय जी ने कहा कि आंख वस्तु या पदार्थ का दर्शन कराती है। पिता अपने पुत्र पर स्नेह दिखाता है। ब्रह्मचारी की माता भी अपने पुत्र पर स्नेह व आशीर्वादों की वर्षा करती है। आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने आचार्य धंनजय जी को कहा कि तुम गुरुकुल में दयानन्द जी की शिक्षाओं के अनुरुप ब्रह्मचारियों का निर्माण करना। ऐसे आचार्य के पीछे चलकर हम धन्य हो जायेंगे।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने अलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि ऋषि दयानन्द के सामने सब उत्तमोत्तम विशेषण हाथ जोड़े खड़े हैं। दयानन्द जी अपने नाम के साथ कोई विशेषण नहीं लगाते। वह विशेषण कहते हैं कि दयानन्द हम तेरे साथ लग कर प्रकाशित हो जायेंगे, हमें अपने नाम के साथ लगा लो। श्रोत्रिय जी ने कहा कि दयानन्द जी ऐसे विलक्षण महापुरुष थे जो सभी एषणाओं से सर्वथा मुक्त थे। इन्हीं शब्दों के साथ पं. वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने अपने वक्तव्य को विराम दिया। इससे पूर्व आर्य भजनोपदेशक श्री रमेश चन्द्र स्नेही ने एक भजन प्रस्तुत किया था जिसके बोल थे ‘वेद पढ़ा जाये और हवन किया जाये ऐसे ही परिवार को स्वर्ग कहा जाये।’ ओ३म् शम्।

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