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‘ई८वरीय ज्ञान और सृ६ट के आरम्भ और बाद में उसकी आव८यकता’ -मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

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12 Sep, 17 09:29
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ई८वरीय ज्ञान की चर्चा से पूर्व यह जानना आव८यक है कि ई८वर क्या है वा ई८वर किसे कहते हैं। ई८वर एक सत्य-चित्त-आनन्द युक्त सत्ता का नाम है। यह सत्ता निराकार एवं सर्वव्यापक है। यह सर्वज्ञ है एवं इसी ने सत्व, रजस व तम गुणों वाली त्र्गिुणात्मक सूक्ष्म प्रकृति से इस संसार की रचना की है। ई८वर सर्वातिसूक्ष्म है। इसी कारण यह आंखों से नहीं ज्ञान युक्त बुद्धि से ही जाना जाता व दिखाई देता है। ई८वर से सूक्ष्म संसार में कुछ भी नहीं है। ई८वर का किसी भी बात में न आदि है और न अन्त। यह अनादि व अनन्त सत्ता है। इसके माता-पिता व भाई बन्धु भी कोई नहीं हैं। यह अनादि, नित्य व सनातन सत्ता है। अब ई८वरीय ज्ञान की चर्चा करते हैं। ई८वर चित्त वा चेतन स्वरूप है। चेतन का गुण ज्ञानवान या ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होना तथा बल व ७ाक्तियुक्त होना व पुरु६ाार्थ करना है। ई८वर में जो ज्ञान है उसे स्वाभाविक ज्ञान कह सकते हैं। उसके स्वभाव में अनादि काल से सर्वज्ञता है अर्थात् सभी वि६ायों का उसे पूर्ण ज्ञान है। स्वभाव से इतर नैमित्तिक ज्ञान होता है जो हम ज्ञानीजनों व पुस्तक आदि अथवा चिन्तन-मनन व प्रयोगों को करके सीखते हैं। ई८वर सर्वज्ञ है और उसका यह ज्ञान भी अनादि व नित्य है। उसी से ई८वर से इतर चेतन सत्ताओं, जीवात्माओं वा मनु६यों को ज्ञान प्राप्त होता है। ई८वर से ज्ञान प्राप्ति के दो स्रोत हैं जिनमे ंप्रथम ‘‘वेद’’ हैं। दूसरा स्रोत ई८वर की जीवात्मा के भीतर व बाहर उपस्थिति है अतः वह आत्मा में प्रेरणा द्वारा ज्ञान देता है। यह ज्ञान योगियों को ई८वर व आत्म साक्षात्कार के अवसर पर यथोचित मात्र में प्राप्त होता है। योगियों को यह ज्ञान समाधि अवस्था में प्राप्त होता है अर्थात् ई८वर साक्षात्कार समाधि अवस्था में होता है। यह ज्ञान निर्भ्रान्त अर्थात् सभी प्रकार के भ्रमों व भ्रान्तियों से रहित होता है। ई८वर से प्रथम जो ज्ञान ‘‘वेद’’ के रूप में मिलता है वह सृ६ट के आरम्भ में मिलता है। यह ज्ञान मिलना अत्यन्त आव८यक व अनिवार्य है। यदि ई८वर ज्ञान न दें तो आदि काल में मनु६यों को अपने कर्तव्य व अकर्तव्यों अर्थात् धर्म और अधर्म का बोध न होने से वह अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के कर्म करेगा जिससे ई८वर की कर्म-फल व्यवस्था बाधित होगी। इसका कारण यह है कि ई८वर जब तक बतायेगा नहीं कि धर्म व अधर्म अथवा कर्तव्य व अकर्तव्य क्या हैं? तब तक जीवात्मा को बोध नहीं होगा, और जिसका बोध नहीं कराया गया उसे दण्ड देने का अधिकार ई८वर को ७ाायद नहीं हो सकता। अतः सृ६ट के आरम्भ में मनु६यों को कर्तव्य व अकर्तव्य का बोध कराना ई८वर का दायित्व वा कर्तव्य है। वह ऐसा करता भी है ओर उसने सृ६ट आरम्भ में अमैथुनी सृ६ट में उत्पन्न अग्नि, वायु, आदि और अंगिरा नामी चार ऋ६ायों को उनकी आत्माओं के भीतर वेद ज्ञान को प्रकट व प्रेरित किया था और उन्हें भा६ाा के ज्ञान सहित वेद मन्त्रें के अर्थों को भी बताया व स्थापित किया था। यहीं से वेदोपदे८ा, वेदाध्ययन, पठन-पाठन, सन्ध्या-हवन व पंच महायज्ञ आदि परम्परायें ऋ६ायों ने प्रवृत्त की थीं जो आज भी न्यूनाधिक चल रही हैं। जो वेदों की परम्पराओं का पालन करते हैं वह इस जीवन में उन्नति व सुख भोगते हैं और मृत्यु के बाद परलोक में भी उन्नति वा मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

वेद सृ६ट व अध्यात्म अर्थात् परा व अपरा विद्याओं का पूर्ण ज्ञान है। इसमें कमी व त्र्ुटि किसी प्रकार की नहीं है। योगी व आत्मद८ाीर् ऋ६ा जो आ६ार् व्याकरण भी जानते हैं, वही वेदों के मन्त्रें के अर्थों व रहस्यों का द८ार्न करते हैं। इतर अल्प ज्ञानी व आचरणहीन ज्ञानियों को भी वेद मन्त्रें के यथार्थ अर्थ विदित नहीं होते। यह ऐसा ही है जैसे कि धूल पडे दर्पण में अपनी मुखाकृति साफ व स्वच्छ दिखाई नहीं देती। योगियों व ऋ६ायों का आत्मा वा हृदय स्वच्छ व पवित्र् होता है अतः वह ई८वर साक्षात्कार व आत्मद८ार्न सहित ई८वर से सत्य विद्याओं को प्राप्त करते हैं। सृ६ट के आरम्भ से महाभारत काल व उसके कुछ समय बाद तक हमारे दे८ा में बहुतायत में ऋ६ा व योगी होते आयें हैं जो दे८ा विदे८ा में वेद ज्ञान व तदाधारित धर्म का प्रचार करते थे। इसी कारण उनके समय में सारा संसार अविद्या से मुक्त था। समस्त संसार में एक ही वैदिक धर्म था। संसार के लोग उसी वैदिक धर्म का पालन करते थे। यही कारण है कि वेद की अनेक ८ाक्षायें पारसी, ईसाई व मुस्लिम मत में भी विद्यमान हैं। पारसी, अंग्रेजी, लैटिन, यूनानी व अरबी आदि भा६ााओं में संस्कृत के ७ाब्द पाये जाते हैं। यह इसी कारण से है।

वर्तमान समय से लगभग 5000 व६ाोर्ं से कुछ अधिक व६ार् पूर्व महाभारत का महायुद्ध इस दे८ा की धरती पर हुआ था। इसके विना८ाकारी परिणाम हुए। बडी संख्या में क्षत्र्यि व विद्वदजन वीरगति को प्राप्त हुए। ८ाक्षा, न्याय व अन्य सभी व्यवस्थायें कुप्रभावित हुईं जिससे दे८ा में मुख्यतः विद्या के क्षेत्र् में अन्धकार बढ गया। यह समय के साथ साथ बढता ही रहा। विदे८ाों में भी धर्म प्रचार बाधित हुआ जिससे वहां भी अज्ञानान्धकार फैल गया। इस अज्ञान ने अन्धवि८वासों, पाखण्ड, स्वार्थ, मिथ्या परम्पराओं, जन्मना जातिवाद, मूर्तिपूजा, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योति६ा, छुआछूत, ऊंच-नीच की भावना, निर्बलों पर अन्याय व उनके ७ाो६ाण को जन्म दिया जो बढता ही गया। इन अज्ञान, अविद्या व अन्धवि८वासों के कारण ही दे८ा गुलाम हुआ। पहले मुसलमानों ने गुलाम बनाया और बाद में अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति व ५ाडयन्त्र्कारी नीतियों से। इस अविद्यान्धकार वाले युग को मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। यह वह समय था जब सारी दुनियां में धर्म के क्षेत्र् में अन्धकार छाया हुआ था। भारत और विदे८ाों में भी कुछ व्यक्ति ऐसे हुए जिन्होंने अपने अपने क्षेत्रें में अपनी अपनी ज्ञान व बुद्धि के अनुसार एकाधिक मतों का प्रवर्तित किया। आज भी यह प्रचलन में हैं। सब मतों का अध्ययन करने पर पाया जाता है कि यह सब विज्ञान व सदाचरण की वेद की ८ाक्षाओं व सन्ध्या, हवन, पंचमहायज्ञ, मातृ-पितृ यज्ञ के विधान सहित भूगोल, गणित व विज्ञान आदि से दूर व दूरतम हैं।

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